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himachal pradesh get rid of caste discrimination in mdm

'जातीय भेदभाव' से हिमाचल को कब मिलेगी मुक्ति

  • Updated on 1/15/2020

राज्य हिमाचल प्रदेश की कई परम्पराएं और रिवायतें जहां देश-दुनिया में इसका सिर ऊंचा करती हैं, वहीं आज आजादी के इतने बरसों बाद भी यह राज्य अभी तक जातीय भेदभाव और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों को पूर्ण रूप से खत्म नहीं कर पाया है। पिछले दिनों अनुसूचित जाति और जनजातीय आरक्षण विधेयक को पारित करने के लिए बुलाए गए विधानसभा के विशेष सत्र में यह बात उठी है। इस विषय को उठाया भी खुद सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के मंत्री डॉ. राजीव सैजल ने है।

जाहिर है कि उन्होंने विधानसभा के अंदर स्पष्ट कह दिया कि उन्हें और नाचन के विधायक विनोद कुमार को मंडी जिले के एक मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। डॉ. राजीव सैजल और विनोद कुमार दोनों अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों से चुनकर विधानसभा पहुंचे हैं। डॉ. राजीव सैजल के जिम्मे तो समाज में फैली ऐसी कुरीतियों को दूर कर अनुसूचित जाति व जनजातीय और अन्य पिछड़ा वर्ग के उत्थान का जिम्मा है लेकिन उन्होंने सदन के अंदर एक साल पहले हुई घटना का जिक्र कर हिमाचल प्रदेश पर पिछड़ेपन को उजागर किया है।

राज्य के मंत्री के साथ हुई इस घटना पर महामहिम राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने दुख जताते हुए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से हिमाचल के लोगों में जागरूकता लाने की मुहिम छेड़ने को कहा है। पुराने हिमाचल के हिस्से रहे कुछ जिलों में यह सामाजिक कुरीति आज तक भी कायम है। अनुसूचित जाति के लोगों का कहीं मंदिरों में प्रवेश वर्जित है तो कहीं स्कूलों में इस वर्ग के विद्यार्थियों को भी छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई का इस आधुनिक युग में सामना करना पड़ रहा है। लेकिन जब संबंधित विभाग का जिम्मा उठाने वाला राज्य का मंत्री ही इस बुराई को दूर करने की बजाय एक साल बाद विधानसभा में अपने साथ हुई घटना का जिक्र करेगा तो जाहिर है कि हिमाचल प्रदेश से यह सामाजिक बुराई पूरी तरह से खत्म करना काफी मुश्किल है।

हिमाचल प्रदेश विधानसभा में कुल 68 में से 17 सीटें अनुसूचित जाति और 3 जनजातीय वर्ग के लिए आरक्षित हैं। फिर भी राज्य के कुछ हिस्सों में यह जातीय भेदभाव की बुराई कायम है। राज्य में जातीय भेदभाव और छुआछूत जैसे अपराधों के आंकड़े देखें तो नवंबर 2019 तक करीब 167 मामले दर्ज हुए हैं। पिछले सालों की तुलना में ऐसे मामलों में काफी वृद्धि देखने को मिल रही है। हैरानी की बात है कि ऐसे मामलों की संख्या मुख्यमंत्री के गृह जिला मंडी में ज्यादा है। 

मिड-डे मील का खाना नहीं खाते कई विद्यार्थी
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी मिड-डे मील योजना भी हिमाचल प्रदेश में जातीय दंश झेल रही है। इस योजना का उद्देश्य स्कूली बच्चों को दोपहर का भोजन उपलब्ध करवाना है और करीब 15000 स्कूलों में यह योजना लागू भी है। पिछले कुछ सालों में सरकार के ध्यान में ऐसे मामले आते रहे हैं कि सामान्य जाति के बच्चों ने अनुसूचित जाति व जनजातीय बच्चों के साथ बैठकर मिड-डे मील खाने से इंकार कर दिया। कई स्कूलों में तो सामान्य वर्ग के बच्चों को अलग से भोजन भी परोसा जाता रहा है। यहां तक कि मिड-डे मील पकाने वालों की नियुक्ति में भी कुछेक क्षेत्रों में जाति की मैरिट देखी गई है। यही नहीं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा जब परीक्षा पर चर्चा का आयोजन किया गया तो कुल्लू जिला के एक स्कूल में अनुसूचित जाति से संबंधित बच्चों को पशुशाला में अलग से बिठाया गया।

शिक्षा के मंदिर में अपना भविष्य संवारने आने वाले नन्हे बच्चों को इस जातिवाद के दंश से बचाने को आज तक कोई भी सरकार सामने नहीं आ पाई है, जबकि भाजपा हो या फिर कांग्रेस दोनों हर चुनाव में इस वर्ग के वोट बैंक को भुनाने की कोशिश करते आए हैं। शिमला जिला के नेरवा में एक अनुसूचित जाति के युवक को पीट-पीट कर इसलिए मार दिया जाता है कि उसने सामान्य जाति के युवकों की गाड़ी को पास नहीं दिया। सिरमौर में इसी वर्ग के आर.टी.आई. एक्टीविस्ट केदार सिंह जिंदान की हत्या हो जाती है लेकिन फिर भी सरकार चुप रहती है। यही नहीं, कुल्लू जिला में राज्य परिवहन निगम की बस के ड्राइवर व कंडक्टर को हजारों रुपए का जुर्माना लगा दिया जाता है क्योंकि उन्होंने अनुसूचित जाति से संबंधित होने पर गांव में किसी सामान्य जाति वाले के घर में पांव रख दिया। कुछ ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिनमें अनुसूचित जाति से संबंधित सरकारी कर्मचारियों को जातिवाद से ग्रसित गांव वालों ने मकान आदि किराए पर देने से इंकार कर दिया। 

पिछली पीढ़ी अभी भी जातिगत भेदभाव को अपने सिर पर ढो रही 
आज सबके हाथ में मोबाइल है और इंटरनैट ने पूरे विश्व की दूरियां खत्म कर दी हैं। देश का नौजवान अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रहा है लेकिन पिछली पीढ़ी अभी भी जातिगत भेदभाव को अपने सिर पर ढो रही है। प्रदेश के एक कोने में कहीं सुच्ची धाम बनती है तो कहीं खुमली पंचायतें आज भी अनुसूचित जाति के लोगों को संविधान में मिले समानता के अधिकार से वंचित कर रही हैं। हिमाचल प्रदेश की साक्षरता दर 82.80 प्रतिशत है। यह केरल के बाद पूरे देश में दूसरे नंबर पर है, लेकिन कुछेक जिलों में आज भी मंदिरों के कपाट इस वर्ग के लिए नहीं खुलते। पी.ए.पी.एन. नामक एक एन.जी.ओ. ने हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिला में जातीय भेदभाव पर एक विशेष अध्ययन किया है जिसमें खुमली पंचायतों में सामान्य जाति के लोगों का वर्चस्व और इनमें आज तक भी अनुसूचित जाति वर्ग की भागीदारी न होने की बात कही गई है।

राज्य के कुछ और भागों में भी स्थानीय कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए इस तरह से कुछ पुराने माडल आज तक चल रहे हैं जिनमें अनुसूचित जाति से संबंधित लोगों को कई तरह की सजा सुनाई जाती है। अगर गांव के कुएं या बावड़ी से अनुसूचित जाति वाले ने गलती से पानी भर लिया या फिर ऐसे स्थान में प्रवेश कर लिया जहां उनका आना वॢजत है तो उसे पूरे गांव को बकरे की धाम (भोजन) खिलाने का हुक्म दे दिया जाता है। चुनाव आते हैं तो लोटा-नमक कर इस वर्ग को सौगंध देकर दबंग लोग अपने स्वार्थ की पूॢत भी कर लेते हैं। कुल मिलाकर आज के दौर में भी जारी इन जातीय भेदभाव से बंधी प्रथाओं में अनुसूचित जाति और जनजातीय वर्ग के लोग प्रताडि़त हो रहे हैं। 

-डॉ. राजीव पत्थरिया

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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