Tuesday, Sep 25, 2018

औपचारिकता के भाव से मनाए जाने वाले हिंदी दिवस का फायदा किसे?

  • Updated on 9/14/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। अपनी तरक्की के हजारों साल से ज्यादा का समय बिता चुकी हिंदी भाषा को आज हिंदी दिवस के रुप में मनाया जाता है। लगातार अंग्रेजी भाषा के चलन और हिंदी की अनदेखी को रोकने के लिए हर साल 14 सितंबर को देशभर में हिंदी दिवस मनाया जाता है।

आज सुबह से ही स्कूलों, सरकारी संस्थानों और सोशल मीडिया पर हिंदी दिवस मनाया जा रहा है। हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है यह बात केवल उन लोगों को पता होगी जो हिंदी दिवस मना रहे हैं। 

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दरअसल, 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी, इसलिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति,वर्धा के अनुरोध पर 1953 से देश में 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रुप में मनाया जाता है।

इस दिवस के मौके पर भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली इस भाषा को लेकर सोशल मीडिया पर इस भाषा से जुड़ी जानकारियों और तारीफों की मानो बाढ़ सी आ जाती है। वहीं अगर हिन्दी दिवस को छोड़कर बाकी के दिनों पर नजर डाली जाए तो हिन्दी के सामने अंग्रेजी हमेशा तराजू में भारी पड़ती नजर आती है। 

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हिन्दी की जय जयकार के बीच इस बात को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि खुद इस भाषा को बोलने वाले लोगों के मन में इसे लेकर ‘अपराधबोध’ सा मंडराता रहता है। 

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हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी हिन्दी का दामन थामे रखने से हिन्दी की छवि को लेकर भारतीयों के मन में थोड़ी उदारता बनी रहती है। बावजूद इसके सिर्फ और सिर्फ हिन्दी बोलने वालों को कुछ अटपटे अनुभवों से गुजरना पड़ता है, जिसमें से एक है इंटरव्यू के समय आपके कम्युनिकेशन स्किल्स को परखना।

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कई दफा लोगों को नौकरी इसलिए नहीं मिल पाती क्योंकि आपकी इंग्लिश कमजोर होती है। ऐसे में यहां सवाल उठता है कि हिंदी दिवस मनाने का फायदा किसे है? 

हर साल कामकाज में हिन्दी को लाने के लिए उसे शत-प्रतिशत लागू करने की बात पूरे जोश-होश के साथ की जाती है। सभी लोग हिन्दी की दुर्दशा पर अपनी बात कहते है कि हमें यह करना है, वो करना है और हम ये करेगे। 14 सितंबर की शाम आते आते सुबह का सब कुछ कहां भूला दिया जाता है।

14 सितंबर को मनाया जाता है हिंदी दिवस

देश को आजादी हुए  71 साल हो गए, लेकिन यह हिन्दी दिवस उसी तरह मनाया जा रहा है जैसा की पहली बार मनाया गया होगा। सवाल ये है कि इस तरह के आयोजनों से क्या होगा? इससे हिन्दी का प्रचार-प्रसार होगा या दिल से आत्मसात करने का जज्बा लोगों के मन-मस्तिष्क में आएगा? 

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आज लोगों को अंग्रेजी से प्रेम इतना अटूट हो गया है कि ये अब बच्चों की शिक्षा का माध्यम बन गई है। अंग्रेजी भाषा को सीखने के चक्कर में स्कूल-कॉलेज में हिन्दी के पीरियड में भी अंदर आने के लिए अपने टीचर से अंग्रेजी में अनुग्रह करके पूछते है कि 'May I Come In Sir'

इस तरह देखा जाए, तो आम लोगों का अंग्रेजी के प्रति झुकाव होना स्वाभाविक है। कुछ हद तक यह उनकी मजबूरी भी है, क्योंकि शासकवर्ग की नीतियां अंग्रेजी को बढ़ावा देने वाली है, तो ऐसे में भला हिन्दी अपने अस्तित्व की रक्षा कैसे करेगी?

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बात एक दिवस को मनाने की नहीं है बल्कि आज जरूरत है कि हिन्दी और इससे जुड़ी संस्थाओं का व्यापक तरीके से प्रचार-प्रसार हो। इसके हल अंग्रेजी का विरोध करने या इसके वर्चस्व को समाप्त करने नहीं है।  

वहीं, दूसरी ओर हिन्दी को शासक वर्ग, पूजीपतियों, नौकरशाह, बाबू तबका और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हिन्दी विरोधी रवैयों को खत्म किया जाए और ये सख्त हिदायाद दे दी जाए कि हिन्दी के विकास के लिए क्षेत्रीयता की भावना से उठकर सभी भाषाओं के बीच समन्वय की भावना रखी जाएगी।

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