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गृहस्थ जीवन छोड़ महादेवी ने क्यों नहीं लिया संन्यास! जानें 'आधुनिक मीरा' के जीवन के रोचक किस्से

  • Updated on 9/11/2019

नई दिल्ली/ कामिनी बिष्ट। हिंदी साहित्य को एक नए आयाम तक पहुंचाने वाली कवयित्री महादेवी वर्मा का नाम साहित्य के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। करुणा की अभिव्यक्ति के लिए नये और सहज शब्दों का प्रयोग कर महादेवी की रचनाओं ने हर दिल को छुआ। उनके गीत और उनकी कविताएं आज भी प्रासंगिक हैं। चाहे गद्य हो या पद्य उन्होंने अपनी हर रचना में जीवन मूल्यों को ऊपर उठाते हुए समाज की सोच को विकसित करने का प्रयास किया।

सरल, सहज करुणामयी होने के साथ ही महादेवी बेबाकी से अपनी बात समाज के आगे रखना भी जानती थी। भारत के पुरुष प्रधान समाज में महादेवी ने देश भर की महिलाओं को उनके अधिकारों के लिए लड़ना सिखाया। 26 मार्च 1907 रंगों के त्यौहार होली के दिन महादेवी का जन्म हुआ। उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद के कायस्थ परिवार में 200 साल की प्रतीक्षा के बाद लड़की का जन्म होने से उनका पूरा परिवार खुशी से झूम उठा। पुत्री को देवी मान कर उनके पिता गोविंद प्रसाद वर्मा ने उनको महादेवी नाम दिया। महादेवी के पिता भागलपुर के एक कॉलेज में प्राध्यापक थे और उनकी माता हेमरानी देवी एक गृहणी थीं।

7 साल की आयु में हुआ था विवाह

महादेवी का विवाह 7 साल की उम्र में साल 1914 में डॉक्टर स्वरूप नारायण वर्मा से हुआ। पढ़ाई पूरी करने तक वो अपने पिता के घर पर ही रहीं। 17 साल की आयु में वो पति के पास गई, लेकिन जैसे गृहस्थ जीवन उनके लिए था ही नहीं। वो गृहस्थ आश्रम छोड़ आई और सन्यासी जीवन जीने का निर्णय लिया। रंगों के त्यौहार के दिन जन्मी महादेवी ने जीवन पर्यन्त एक ही रंग को पहना, वो सफेद रंग था। उनकी हर रचना में एकाकी पीड़ा झलकती है। उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है।

पंथ होने दो अपरिचित प्राण होने दो अकेला
हास का मधुदूत भेजो,
रोष की भूभंगिमा पतझार को चाहे सहेजो
ले मिलेगा उर अचंचल
वेदना जल स्वप्न शतदल
जान लो वह मिलन एकाकी, विरह में है दुकेला
पंथ होने दो अपरिचित...

हिंदी साहित्य की अद्भुद प्रतिभा महादेवी वर्मा उन चंद लेखकों में से हैं जिन्होंने कविता के साथ-साथ चित्रों के माध्यम से अपनी सृजनात्मका का परिचय देते हुए कला को जीवंत रूप प्रदान किया। महादेवी की यामा और दूसरी कई पुस्तकों में उनके खुद के उकेरे हुए कई चित्र हैं। निजी जीवन में महादेवी महात्मा बुद्ध से बहुत प्रभावित रही। बुद्ध का सूत्र ‘जीवन दुख का मूल है’ हमेशा उनकी कविताओं में प्रतिबिंबित होता दिखा। एक बार महादेवी एक पूर्णकालिक भिक्षुणी बनने का संकल्प लेकर एक संत के द्वार पर चली गई थी, लेकिन सत्य की खोज में उन्हें वहां कुछ ऐसा अनुभव हुआ कि उन्होंने वो मार्ग को छोड़ कर दूसरा पथ तलाशना शुरू कर दिया।

'संत भी नहीं थे स्त्री पुरुष के भेद से ऊपर'
कहा जाता है कि जब वो संत के द्वार पर गई तो संत ने उनसे पर्दा कर बात करने को कहा। महादेवी ने जब कारण पूछा तो उन्हें बताया गया कि स्त्रियों से संत पर्दा करके ही बात करते हैं। तब उन्होंने प्रश्न किया कि जब एक योगी भी स्त्री-पुरुष के भेद से ऊपर नहीं उठ सकता, तो मेरी समस्या का समाधान यहां नहीं मिलेगा। मैं गलत स्थान पर आ गई। इसके बाद महादेवी ने किसी भी आश्रम से दीक्षा नहीं ली। लेकिन बुद्ध, गांधी और रविंद्र नाथ ठाकुर का प्रभाव उनके जीवन में हमेशा रहा।

जीवन को सार्थक बनाने की राह तलाशती महादेवी महात्मा गांधी के पास जा पहुंची। गांधी ने उनको सलाह दी कि आप साहित्य के क्षेत्र में काम कर समाज को जीवन मूल्यों का पाठ पढ़ाकर भी जीवन को सार्थक बना सकती हैं। गांधी जी की इस सलाह को उन्होंने अपने जीवन का सूत्र बना लिया। उन्होंने अपना पूरा जीवन साहित्य को समर्पित कर दिया और हिंदी साहित्य को अपनी अद्भुद रचनाओं के फूलों से सुसज्जित कर दिया।

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