hindu litigant told supreme court babri masjid was built by demolishing ram temple

हिंदू वादकार ने SC से कहा - राम मंदिर को ध्वस्त करके बनाई गई थी बाबरी मस्जिद

  • Updated on 8/22/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। एक हिंदू वादकार ने गुरुवार को उच्चतम न्यायालय से कहा कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण राम मंदिर को ध्वस्त करके किया गया था और हिंदू समुदाय के लोग अपना कब्जा छोड़े बिना वहां पूजा करते रहे। उन्होंने विवादित स्थल पर पूजा करने का उनका अधिकार लागू किए जाने का अनुरोध किया है। मूल याचिकाकर्ताओं में शामिल गोपाल सिंह विशारद ने 1950 में निचली अदालत में मुकदमा दायर करके पूजा करने का अधिकार दिये जाने की मांग की थी। उनकी 1986 में मृत्यु हो गई थी और उनके पुत्र राजेंद्र सिंह अब उनका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। 

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प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने दशकों पुराने राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस मामले में 10 वें दिन भी दलीलें सुनीं। न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर भी इस पीठ में शामिल हैं।  वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने पीठ से कहा, ‘‘मस्जिद का निर्माण राम मंदिर को गिराकर किया गया था और इसके बावजूद हिंदू वहां पूजा करते रहे और अपना कब्जा नहीं छोड़ा--इसके अलावा मुस्लिमों का वहां कभी कब्जा नहीं था।’’ 

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कुमार ने पीठ से कहा, ‘‘मैं परासरण और वैद्यनाथन की दलीलों के संदर्भ में अपनी दलील रख रहा हूं कि यह जन्मस्थल अपने आप में एक दैवीय स्थल है और उपासक होने के नाते पूजा करना मेरा नागरिक अधिकार है जो छीना नहीं जाना चाहिए।’’      रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि मजिस्ट्रेट मार्कंडेय सिंह ने 29 दिसंबर 1949 को सांप्रदायिक अशांति के बाद दंड प्रक्रिया संहिता के तहत विवादित स्थल को जब्त करने की कार्यवाही शुरू की थी। 

मजिस्ट्रेट ने संपत्ति पर उनके दावे और प्रतिदावे के संबंध में हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों से जवाब मांगा था। दोनों पक्षों की तरफ से लोगों ने मजिस्ट्रेट के समक्ष 20 हलफनामे दायर किये थे और वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा भी हैं। पीठ ने कहा, ‘‘उन्हें साबित करने के लिये सिर्फ हलफनामा दायर करना पर्याप्त नहीं है। गवाहों को उन्हें साबित करने के लिये उपस्थित भी होना पड़ेगा--कोई भी अदालत यह नहीं कह सकती कि हलफनामों के तथ्य साबित हो गए हैं।’’ वकील ने कहा कि ये हलफनामे 1950 में दायर किये गए थे और इनमें मुकदमा काफी बाद में चला। 

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उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय ने हलफनामे को स्वीकार नहीं किया था क्योंकि गवाह जिरह के लिये उपलब्ध नहीं थे। उन्होंने कहा कि वे न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं और शीर्ष अदालत उन्हें स्वीकार कर सकती है क्योंकि मजिस्ट्रेट ने बयानों और गवाहों की पहचान का सत्यापन किया था। अब्दुल गनी नाम के एक व्यक्ति का हलफनामा पढ़ते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि उन्होंने कहा था कि बाबरी मस्जिद का निर्माण मंदिर को ध्वस्त करने के बाद किया गया था। वहां ङ्क्षहदू लगातार पूजा करते रहे और अपना कब्जा कभी नहीं छोड़ा। 

गनी ने यह भी कहा था कि जहां मुस्लिम जुमे पर ‘नमाज’ पढ़ते थे, वहीं हिंदू नियमित रूप से उस स्थल पर ‘पूजा’ करते थे और उस स्थल पर ‘नमाज’ पढऩा मुसलमानों के लिये शरिया के खिलाफ है। एक अन्य मुस्लिम वली मोहम्मद द्वारा 1950 में दायर हलफनामे का उल्लेख करते हुए वकील ने कहा कि उन्होंने गवाही दी थी कि अगर सरकार विवादित जमीन हिंदुओं को दे देती है तो मुस्लिमों को कोई आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि मस्जिद बनाने के लिये मंदिर को तोड़ा गया था और मुसलमान वहां 1935 से नमाज नहीं पढ़ रहे हैं। 

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कुमार के अपनी दलीलें पूरी करने के बाद निर्मोही अखाड़ा की ओर से सुशील कुमार जैन ने फिर से अपनी दलीलें शुरू कीं। जैन शुक्रवार को भी अपनी दलील रखेंगे। चार दीवानी मामलों में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 के आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में 14 याचिकाएं दायर की गई हैं। उच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि अयोध्या की 2.77 एकड़ भूमि को तीन पक्षों - सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच समान रूप से बांटा जाए। दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी थी जिसके बाद से लंबी कानूनी लड़ाई आरंभ हुई।      
 

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