उत्तराखंड में होली गायन की अनूठी परंपरा, कुमाऊं क्षेत्र में पौष से शुरू हो जाती है होली बैठक

  • Updated on 2/28/2018

देहरादून/वीरेंद्र डंगवाल ‘पार्थ’। बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में भारत में रंगों का त्यौहार होली मनाया जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन संगीत के बीच एक दूसरे पर उल्लास और उमंग के साथ रंग फेंका जाता है। होली मनाए जाने को लेकर कई किवदंतियां प्रचलित हैं। सभी में बुराई का अंत और सच्चाई की जीत होती है।

त्यौहार जिस तरह भी शुरू हुआ हो, लेकिन यह सत्य है कि होली सनातन धर्म का प्राचीन त्यौहार है। भारत में ईसा मसीह के जन्म से कई सदियों पहले से यह त्यौहार मनाया जा रहा है। होली का वर्णन जैमिनि के पूर्व मीमांसा सूत्र और कथक ग्रहय सूत्र में भी है। प्राचीन भारत के मंदिरों की दीवारों पर भी होली खेलते हुए चित्र बने हैं। खास यह है कि होली एक दिन का त्यौहार नहीं है, इसे कई राज्यों में तीन दिन तक मनाया जाता है।

उत्तराखंड की बात करें, तो राज्य के कुमाऊं क्षेत्र में होली खेलने और गाने की विशिष्ट परंपरा रही है। होली दो तरह से गाई जाती है- बैठकी होली और खड़ी होली। बैठकी होली रात-रात भर चलती हैं। पौष मास के प्रथम रविवार से बैठकी होली का गायन शुरू हो जाता है। वसंत पंचमी से होली की बैठकों में तेजी आने लगती है। इसके बाद महाशिवरात्रि से तो घर-घर में बैठकी होली का आयोजन शुरू हो जाता है।

अष्टमी को देवी मंदिर में होली गाई जाती है। संध्या के पश्चात जैसे-जैसे रात गहराने लगती है। तब पुरुष होली गायन की बैठक शुरू करते हैं। बैठक में राग के आधार पर ही गायन किया जाता है। सायंकालीन राग से बैठक का मान रखा जाता है। सुबह भैरवी राग गाकर बैठक समाप्त की जाती है। होली गायन में वसंत पंचमी से प्राकृतिक वर्णन के गीतों की प्रमुखता रहती है।

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सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है। रंग एकादशी को दिन-रात होली का खुमार रहता है। इस दिन चीर (कपड़ा) बांधी जाती है। घर-घर जाकर चीर एकत्रित कर उसे एक पेड़ की टहनी पर लटका लिया जाता है। फिर उसे एक स्थान में गाड़ दिया जाता है। पूर्णिमा के दिन चीर दहन और अगले दिन छरडी होती है।

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उस दिन घर-घर जाकर एक-दूसरे के लिए आशीष गीत गाए जाते हैं। इसके बाद द्वितीया को होली टीका मनाया जाता है। होली टीका के साथ त्यौहार पूर्ण होता है। इस दिन देवर-भाभी, जीजा-साली और ननद-भाभी एक-दूसरे को टीका उपहार देते हैं। इस बार दो मार्च को होली के बाद तीन मार्च को होली टीका होगा।

होली के गीत

-सिद्धि को दाता विघ्न विनाशन, होरी खेले गिरिजा नंदन, गौरी को नंदन मूसा को वाहन होली खेले (होली गायन की शुरूआत गणेश स्तुति से)

-आयो नवल वसंत सखि ऋतुराज कहाये, होरी होरी सखि, पुष्प कली सब फूलण लागी फूल ही फूल सुहाये

-जै हरि जै शिव गंग भगीरथि पाप कटे तेरे दर्शन से, भगीरथ राजा कारण प्रकट अवनी पर आई (शिव मंदिर में होली गायन)

-अम्बा के भवन में विरोज होली, गणपति गौरा खेलन आए, रिद्धि-सिद्धि संग होली, ब्रहमा-विष्णु खेलन आए सरस्वती-लक्ष्मी संग होली (अष्टमी को देवी मंदिर में होली गायन)

-म्यरो रंगिलों देवर घर एै रौ छौ, सासु हूं साडी, ससुर हुणि जामा मैं हुणि घाघर लै रौ छौ, भौजी हुं चूडि, ब्वारि हुं बिछवा, मैं हुणि कंगन लै रौ छौ

-केसरी रंग लागो भिगावन को सांवरी रंग लागो (राग धमार में)

होली गायन

-चंद्र बदनी खोलों द्वार तिहारे मन मोहन ठाडे है, द्वार होली खेलण को (राग काफी)

-कैसी करत बरजोरी कान्हा मोरी बैंया मरोरी, सगरि चुनर मोर रंग भिगोरी और कपोवन रोर, देखा सखि मोरी यूं गत कीन्हीं खेलत खेलत होरी (राग भैरवी)

-आज अलबेली चली छमा छमा चली, वो तो अपने पिया को मनाने चली

ब्रहमानंद की होली

ब्रहमानंद की होली गाने का विशेष प्रचलन कुमांऊ में रहा। लेकिन, अब मात्र पुराने लोगों को ही ब्रहमानंद की होली याद है और वह गाते हैं। उनकी होली गीतों की पुस्तक भी अब नहीं मिलती। वहीं, नई पीढ़ी ने होली गायन में फिल्मी गीत की शामिल कर लिए हैं।

पुराने लोग बताते हैं कि ब्रहमानंद की होली गायन का अलग उल्लास होता था। उनका एक होली गीत इस तरह है कि का सुख सोहै रंग महल में, का संग खेलें होली लाला, तुम संग सोहै रंग महल में, हम संग खेलो होली लाला।

कवियत्री एवं लेखिका भारती पांडे कहती हैं कि ब्रज के बाद कुमाऊं की होली को विशिष्ट माना जाता है। कुमांऊ में होली गायन का इतिहास लगभग दो सौ साल पुराना है। चंद राजाओं के समय से होली गायन का उल्लेख मिलता है। होली में रामायण व महाभारत के विभिन्न प्रसंग गाए जाते हैं।

देवी-देवताओं के गीत, प्रकृति का वर्णन करते गीत, प्रेमगीत आदि से खूब रंग जमता है। पुरुष और महिलाएं अलग-अलग होली की बैठक करते हैं। अब तो सामूहिक बैठकें भी होती हैं। होली गायन कुमांऊनी संस्कृति की विशिष्ट पहचान है।
 

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