honor of maharaja ranjit singh in pakistan

पाकिस्तान में महाराजा रणजीत सिंह का सम्मान

  • Updated on 7/1/2019

28 जून को जिन्ना द्वारा स्थापित पाकिस्तान (Pakistasn) के डान समाचार (Dawn News) पत्र में एक असामान्य रिपोर्ट प्रकाशित हुई : ‘लाहौर किले में माई जिंदा की हवेली में वीरवार की शाम को एक रंगारंग समारोह में सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा का अनावरण किया गया। कांस्य से बनी प्रतिमा 9 फुट ऊंची है, जिसमें शाही सिख महाराजा को पूरी तरह से सिख वेशभूषा में हाथ में तलवार पकड़े एक घोड़े पर बैठे दिखाया गया है।'रणजीत सिंह के शासन में जब पंजाबियों का उत्तरी भारत पर प्रभुत्व था और उन्हें एक नायक के तौर पर देखा जाता था, जो वह थे। उनकी सेनाओं ने काबुल तक चढ़ाई की और वह तथा टीपू सुल्तान उपमहाद्वीप में अंतिम असल स्वतंत्र शासक थे जब अंग्रेजों ने अन्य को पराजित कर दिया था।'

फाकिर खाना म्यूजियम (Faqir Khana Museum) के तत्वावधान में स्थानीय शिल्पकारों द्वारा बनाई गई प्रतिमा का उद्देश्य महाराजा की भावनाओं को प्रदॢशत करना है और इसका उनकी 180वीं पुण्यतिथि पर अनावरण किया गया। महाराजा रणजीत सिंह का 1839 में निधन हो गया था। अनावरण समारोह की विशेषता गतके का प्रदर्शन था, जिसमें युवाओं ने विभिन्न हथियारों के साथ हमला करने तथा हमला रोकने के विभिन्न कौशलों का प्रदर्शन किया, जिसमें तलवार की तरह मुड़ी छडिय़ां, कांटेदार बॉल तथा चेनें व अन्य हथियार शामिल थे।

इस प्रस्तुति ने दिखाया कि कैसे अच्छी तरह से प्रशिक्षित योद्धा अत्यंत खतरनाक कार्य कर सकते हैं जैसे कि इस कौशल के प्रदर्शन के दौरान छड़ी के साथ आसानी से किसी दूसरे के सिर पर रखे मिट्टी के बर्तन व नारियल तोडऩा, जबकि दो योद्धा आग के घेरे के भीतर लड़ रहे थे।’


शहीदों को श्रद्धांजलि
एक अन्य असामान्य रिपोर्ट 24 मार्च 2019 को प्रकाशित हुई थी कि: ‘भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव के मिले-जुले अनुयायियों ने शनिवार को इन तीनों के 88वें शहीदी दिवस के अवसर पर पाकिस्तान के लाहौर शहर के शादमान चौक में उन्हें श्रद्धांजलि भेंट की, वह स्थान, जो किसी समय उस जेल का एक हिस्सा था जहां उन्हें अंग्रेजों द्वारा 23 मार्च 1931 को फांसी पर लटका दिया गया था।

वह स्थान ‘भगत सिंह जिंदा है’ तथा ‘शहीद भगत सिंह तेरी सोच ते, पहरा देंगे ठोक के’ जैसे नारों से गूंज रहा था, जबकि महिलाओं तथा बच्चों सहित लाहौर के निवासियों ने अपने हाथों में मोमबत्तियां पकड़ कर शहीदों को श्रद्धांजलि दी।
इस कदम का नेतृत्व भगत सिंह मैमोरियल फाऊंडेशन ने किया, जिसका संचालन इम्तियाज राशिद कुरैशी कर रहे हैं, जिन्होंने शादमान चौक बदल कर ‘शहीद भगत सिंह चौक’ करने के लिए लाहौर हाईकोर्ट में एक याचिका भी दायर की है।’
प्रश्र यह है कि क्यों पाकिस्तान यह सोचता है कि ये व्यक्ति प्रतिष्ठित हैं जबकि भारत मजबूत मुस्लिम विरोधी दौर से गुजर रहा है। और इसका कारण यह भी है कि पाकिस्तान में भी ताकतवर पंजाबी समुदाय है। आधे से अधिक पाकिस्तान पंजाबी बोलने वाला है। पाकिस्तान के पांच बड़े शहरों में से चार-लाहौर, रावलपिंडी, गुजरांवाला तथा फैसलाबाद पंजाब में हैं। लगभग 80 प्रतिशत पाकिस्तानी सेना पंजाबी है।

पंजाब के असल नायक
रणजीत सिंह का सिख शासन भारतीय इतिहास में इकलौता समय था जब पंजाबियों का उत्तरी भारत पर प्रभुत्व था और रणजीत सिंह को एक नायक के तौर पर देखा जाता था, जो वह थे। रणजीत सिंह की सेनाओं ने काबुल तक चढ़ाई की और वह तथा टीपू सुल्तान उपमहाद्वीप में अंतिम असल स्वतंत्र शासक थे जब अंग्रेजों ने अन्य को पराजित कर दिया था। वह एक महान योद्धा थे और रणजीत सिंह के निधन के बाद ही अंग्रेज पंजाब पर विजय पाने में सफल हो सके। पाठकों के लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि क्यों कश्मीर पर शासन करने वाले जम्मू के डोगरा राजपूतों ने पंजाब में उनके साथ विश्वासघात किया। यह विश्वासघात न होता तो जम्मू तथा कश्मीर आज दो अलग राज्य होते। यह जानने के लिए कि पुरस्कार कितना बड़ा था, इस पर विचार करें: भारत में केवल 5 राजशाहियां इतनी बड़ी थीं कि उनके शासक 21 तोपों की सलामी ले सकते थे-मैसूर, हैदराबाद, बड़ौदा, ग्वालियर तथा जम्मू-कश्मीर।

अधिकतर भारतीय नहीं जानते कि औरंगजेब की मौत के बाद 18वीं शताब्दी के भारत का इतिहास एक हिन्दू राजा के दूसरे के खिलाफ हमलों से भरा पड़ा है। मराठों ने राजपूतों से इतना अधिक धन लूटा कि जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह के बेटे महाराजा ईश्वरी सिंह ने दिसम्बर 1750 में आत्महत्या कर ली। प्रतिशोध में 10 जनवरी को राजपूतों ने 4000 मराठा सैनिकों के कत्ल में 9 घंटे लगाए, जो शहर में विजेताओं के तौर पर दाखिल हुए थे। यह हमारी इतिहास की पुस्तकों में नहीं पढ़ाया जाता। इसकी जानकारी अधिकतर भारतीयों को असमंजस में डाल देगी क्योंकि हमारी समझ पर धार्मिक राष्ट्रवाद का रंग चढ़ा दिया गया है।

पाकिस्तान में समस्या नहीं
भारत में जिन्ना के चित्रों अथवा लगातार होने वाले अन्य विवादों के विपरीत पाकिस्तान में इन लोगों की प्रतिमाएं स्थापित करने को लेकर कोई समस्या नहीं है। भारतीय होने के नाते हम आशा नहीं करते कि हमारे नायकों को पाकिस्तान में कोई जगह दी जाए और इसी कारण मेरा कहना है कि ये रिपोटर््स हैरानीजनक दिखती हैं। मगर तथ्य यह है कि अधिकतर भारतीय पाकिस्तान के बारे में नहीं जानते तथा हमारी जानकारी सुनी-सुनाई है तथा अव्यवस्थित भारतीय मीडिया से आती है।                                                                                                                                         -आकार पटेल

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