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how bjp believes in maharashtra will become a government

महाराष्ट्र में बीजेपी को कैसे है भरोसा बन जाएगी सरकार!

  • Updated on 11/14/2019

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर। महाराष्ट्र (Maharashtra) में अचानक से सरकार बनाने की कोशिशें धीमी हो गई है। शिवसेना (Shivsena) किसी भी सूरत में कांग्रेस (Congress) और एनसीपी (ncp) के करीब जाना चाहती है। लेकिन यह पवार पावर ही है जो शिवसेना को सबसे असमंजस स्थिति में डाल दिया है। राज्य की राजनीति को करीब से समझने वाले जानकार की मानें तो भले ही बाल ठाकरे (Bal Thackeray) से शरद पवार का रिश्ता खट्टा-मिट्ठा हो लेकिन कभी-भी वैचारिक दूरी को पाटने की कोशिश भी नहीं हुई थी।

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शिवसेना के तेवर से कांग्रेस हैं आशंकित

ऐसे में शिवसेना ने जिस शर्त पर बीजेपी को चुनाव पूर्व गठबंधन करने के बाद भी ठेंगा दिखा दिया उससे शरद पवार भी कम आशंकित नहीं है। तभी तो वे बार-बार अपनी पार्टी एनसीपी और कांग्रेस के स्वाभाविक सहयोगी होने और गठबंधन धर्म निभाने की दुहाई देते रहते है उससे तो लगता है कि उन्हें ही सबसे ज्यादा शिवसेना के तेवर को झेलन पड़ सकता है। 

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शरद पवार ने बार-बार गठबंधन धर्म की याद दिलाई
यह कहते हुए शरद पवार ने उद्धव ठाकरे को जो गठबंधन धर्म की नसीहत दी है, पता नहीं शिवसेना जैसी पार्टी कितना ग्रहण करेगी। शरद पवार ने बार-बार यह कहा है कि उनकी पार्टी अपनी सहयोगी कांग्रेस के साथ मिलकर ही किसी भी निर्णायक निर्णय पर पहुंचेगी। शरद पवार ने बार- बार गठबंधन का नया साथी बनने से पहले गठबंधन धर्म को बीच मंझधार में नहीं छोड़ने का भी वायदा लेना चाहते है। ऐसा तो नहीं हो सकता है कि आप एक तरफ कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाते है, लेकिन अगर कल किसी मुद्दे पर असहमति हो गई तो सरकार को गिराने से भी परहेज नहीं होगा। यानी आप दोनों हाथ में लड्डू चाहते है। जिससे ही शरद पवार को शिवसेना के किसी भी बातों पर यकीन आसानी से नहीं हो पा रहा है।
 

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बीजेपी लगा सकती है विरोधी दलों में सेंध
लेकिन इन सबके बीच बीजेपी ने जिस तरह से राष्ट्रपति शासन लगाने पर टिप्पणी दी है उससे भी शरद पवार की चिंता बढ़ गई है। यह किसी के भी समझ के परे है कि जब शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाने पर बातचीत अंतिम दौर में पहुंच गया है तो ऐसे में बीजेपी कैसे दावा करती है कि सरकार बनाने के लिये वो भी तैयार है। इसका मतलब भी साफ है कि बीजेपी या तो विरोधी दलों के एकजुटता में सेंध लगाएगी या शिवसेना के साथ सभी मतभेदों को सुलझाते हुए सरकार गठन के फॉर्मूला B पर आगे बढ़ सकती है।

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शिवसेना का सच्चाई से हुआ सामना
शिवसेना को भी पता है कि राज्य में सरकार बनाने के बाद भी बिना मोदी सरकार के सहयोग का राज्य का विकास नहीं कर सकता है। इसलिये जब बीजेपी अपना सुर नरम करे तो कोई आश्चर्य नहीं कि शिवसेना दौड़े-दौड़े बीजेपी को स्वाभाविक गठबंधन बताते हुए सरकार बनाने पर भी राजी हो सकती है। क्योंकि दोनों दल अपने एजेंडे के भी काफी करीब है। उद्धव को जिस तरह से कांग्रेस और एनसीपी ने हांफने को मजबूर कर दिया है तो हो सकता है कि नए शर्तों के साथ बीजेपी के साथ सरकार बना लें। क्योंकि कांग्रेस और एनसीपी के साथ विधवा- विलाप करने से ज्यादा अच्छा है कि बीजेपी के साथ फिर सरकार बनाने पर फिर से शिवसेना विचार कर सकती है। कारण राजनीति तो यू-टर्न का दूसरा नाम है।

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