सियासी रंग में रंगी गौमाता की कैसे हुई वाइल्ड कार्ड एंट्री, जानिए क्या है पूरी कहानी!

  • Updated on 2/9/2019

नई दिल्ली/श्वेता यादव। गाय के नाम पर सियासत नई नहीं है। इससे पहले भी पार्टियां गाय को चुनावी मुद्दे से लेकर घोषणा पत्रों तक की शोभा बनाती रही हैं। यही नहीं बल्कि गौहत्या के नाम पर भी सियासी में रंग में रंग घोलने का काम किया है। 'गाय हमारी माता है', इससे हर कोई वास्ता रखता होगा लेकिन पिछले कुछ सालों से गाय माता ना सिर्फ माता बल्कि सियासी पोस्टरों, ऐजेंडे और चुनावी वादों की पहली पक्ति में जगह पाती दिखती हैं। पिछले कुछ सालों से गाय के नाम पर जो सियासत खेली जा रही है, आएये उस पर एक नजर डालते हैं।

कहां से हुई गाय माता की सियासी वापसी 'वाइल्ड कार्ड एंट्री'?

पीएम मोदी के 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान गौमांस पर पाबंदी ना लगाने के लिए कांग्रेस पर आरोप लगाया। साथ ही 'गाय माता राजनीति' में बरसों से ठहरे हुए पानी में कंकड़ डालने का काम किया। लंबे समय से सियासत से दूर गाय माता अब पहली पंक्ति में आकर खड़ी हो गईं और इसी के साथ गोरक्षकों का दल हर गली हर नुक्कड़ पर दिखाई देने लगा। 

पीएम मोदी ने प्रचार के दौरान हरित क्रांति के बरक्स 'पिंक रेव्यूशन' की बात करी। अब सड़क पर भूखी, लाचार गाय से ज्यादा दिल कत्लखानों तक जाती गायों के लिए पसीजा और इसी के साथ गाय के सेवा में हजारों की संख्या में लोग गौतस्करी और गौहत्या के नाम पर मारकाट करने लगे। ये गौहत्या, मॉब लिचिंग की नाम से सामने आई। बाद में खुद पीएम मोदी ने मंच से बयान देकर मॉब लिंचिग पर चिंता जताई।

गांधी परिवार को दे सकते हैं क्रेडिट

आपको बता दें कि गाय के नाम पर सियासत करने का क्रेडिट गांधी परिवार और कांग्रेस को दे सकते हैं। कांग्रेस ही वो पहली सरकार थी जिसने 1955 में देश में गौहत्या पर पाबंदी लगाई थी। जहां कांग्रेस के एक तबके ने गोहत्या पर देशव्यापी पाबंदी की बात कही जिसपर इंदिरा ने सीधे स्वरों में विरोध किया था। 1966 में विरोध और तेज हुआ तो इंदिरा ने समीति बनाई जिसने देश में गौहत्या पर पाबंदी लगाने से इंकार कर दिया। 

अब एक बार फिर गौहत्या के नाम पर देश की राजनीति पिछले कुछ सालों में गरमाई और सियासी भूचाल सा आ गया। एक हिंदुत्ववादी एजेंडे के तहत गौमाता की रक्षा का प्रण लिया गया। लेकिन अब की सियासत कुछ और हो गई है।

गाय के नाम पर होने लगी है मार्केटिंग

इस बार मैदान में बीजेपी का एजेंडा ही नहीं कांग्रेस का सॉफ्ट हिंदुत्व भी हिंदू वोट बैंक को रिझाने के लिए मैदान में उतर गया। जहां एक तरफ धीरे से ही सही राहुल गांधी अपने हिंदू धर्म और गोत्र की दुहाई देते दिखे तो वहीं पार्टी अपने घोषणा पत्र में गौमूत्र की मार्केटिंग, हर पंचायत में गौशाला खुलवाने, घायल गायों के इलाज की व्यवस्था कराने से लेकर उनके अंतिम संस्कार के इंतजाम तक करने का वादा अपने चुनावी घोषणापत्र में कर डाला। 

इसका असर ये हुआ कि हिंदू वोटों का एक और तरफ से धुव्रीकरण शुरु हुआ। मध्य प्रदेश के हालिया चुनाव इसी की बानगी हैं। जहां पूरे प्रदेश में दोनों ही पार्टियां गाय माता से संवेदना दिखाते हुए गौमाता की असली लाचारी का आरोप एक दूसरे पर लगाती नजर आई। 

गाय माता और खूब सारी घोषणाएं

असर ये हुआ कि कांग्रेस सत्ता में आई और अब हाल ये है कि गौमाता के नाम पर सीएम कमलनाथ बड़ी-बड़ी योजनाओं के साथ सामने आए और कहा कि राज्य में अगले चार महीनों के भीतर एक हजार गोशालाएं बनाने, गायों के कल्याण के लिए फंड जुटाने के लिए लक्जरी कारों और दूसरी महंगी चीजें खरीदेन पर टैक्स लगाने पर विचार कर रही है। 

वहीं बीते दिनों यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बजट में बेसहारा गायों के लिए कान्हा गौशाला एवं बेसहारा पशु आश्रय योजना के नाम पर 98 करोड़ 50 लाख रुपये की व्यवस्था की है।

तो इसतरह से जब भी भाजपा गौहत्या के नाम पर आवाज बुलंद करती है तो कांग्रेस भी 24 राज्यों में गौहत्या पर पाबंदी लगाने में मदद करने, 1955 में गौहत्या पर पाबंदी लगाने जैसे अफसाने गिनाने लगती है। 

क्या सियासी जानवर हो गई हैं गाय माता?

हिंदू पौराणिक मान्याताओं को सियासत के भीतर लाकर उसे रंग चढ़ाने का काम पहली बार नहीं हो रहा है। इसकी शुरुआत खुद कांग्रेस ने की थी। कहते हैं कि 1969 में जब कांग्रेस दो हिस्सों में बंटी तो इंदिरा गांधी की अगुवाई वाले गुट ने गाय और उसका दूध पीते बछड़े को अपना नया चुनाव चिन्ह बनाया। वहीं सियासत में गाय के बरक्स इफ्तार पार्टी का चलन कांग्रेस ही लेकर आई तो बाद में फैशन बन गया। कहा जाता है कि राजीव गांधी ने ही बाबरी मस्जिद के फसाद की नींव रखी। 

अब हाल ये है कि दोनों ही देश की बड़ी पार्टियां गौमाता का ज्रिक किए बगैर रह नहीं सकती और दोनों में ही हिंदूवादी होने की होड़ सी लग गई है। बहरहाल चुनावी साल में चुनावों के लिए कुछ ही महीने बचें हैं और गाय माता पर अभी और सियासत देखनी बाकी है। गाय माता का कितना भला होगा ये तो पता नहीं लेकिन गाय माता 'सियासी जानवर' साबित हो गई हैं। 

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