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लॉकडाउन ने रोका कदम, गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों को कैसे मिलेगी नियमित दवा 

  • Updated on 3/29/2020

नई दिल्ली/ अंकुर शुक्ला। कोरोना वायरस (coronavirus) से मुकाबले और लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए लॉकडाउन (Lockdown) ही एक मात्र सुरक्षित विकल्प है। लॉकडाउन का पालन करने के लिए लोगों को प्रेरित करने और सहयोग की अपील करने का सिलसिला भी जारी है। ज्यादातर लोग लॉकडाउन का निर्देशों के मुताबिक पालन भी कर रहे हैं लेकिन इस स्थिति में कैंसर और एचआईवी से जूझ रहे गंभीर रोगों से प्रभावित मरीजों की मुसीबत भी बढ़ गई है।

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ओपीडी के समय में कर दी गई है कटौती  
ज्यादातर अस्पतालों में ओपीडी के समय में कटौती कर दी गई है। वहीं एम्स जैसे संस्थान ने तो संक्रमण की आशंका देखते हुए ओपीडी को बंद करने का फैसला किया है। सनद रहे कि सरकारी अस्पतालों में उपचार कराने आने वाले ज्याजातर मरीज आर्थिक रुप से कमजोर और बाहरी रा'यों से हैं। लॉकडाउन होने के कारण अब उन्हें रोजना सेवन करने वाली दवाइयां कहां से मिलेगी? यह समस्या बनकर सामने आ गई है। जिस मरीज का दिल्ली एम्स, सफदरजंग और आरएमएल अस्पताल से उपचार चल रहा है, क्या उसे स्थानीय स्तर पर किसी सरकारी अस्पतालों से वह दवाइयां मिल पाएगी, जिसे डॉक्टरों ने बिना डोज मिस किए रोज सेवन करने के परामर्श दिए हैं। 

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एचआईवी मरीज को नहीं मिल रही थी दवा, एम्स के डॉक्टर ने की मदद 
एचआईवी/एड्स और कैंसर जैसे जानलेवा रोग से जूझ रहे मरीजों के परेशानी की बानगी समझनी हो तो इस वाकिए से आसानी से समझा जा सकता है। एम्स के जेरियाट्रिक विभाग में कार्यरत डॉ. विजय गुर्जर को एक शख्स का फोन आया। उन्होंने कहा कि उनके पिता जी एचआईवी से पीडि़त हैं और उनकी दवाई खत्म होने वाली है। आसपास के कमिस्ट की दुकानों में वह दवा उपलब्ध नहीं है और लॉक डाउन में सार्वजनिक परिवहन और मेट्रों आदि बंद होने की वजह से वह अस्पताल नहीं आ पा रहे हैं, उनके पास अपना वाहन भी नहीं है।

एचआईवी पीडि़तों को रोजाना डोज लेना होता है अनिवार्य 
ऐसे में यह डर है कि दवा नहीं मिलने के कारण उनके पिता का डोज न मिस हो जाए। यहां बता दें कि एचआईवी पीडि़तों को रोजाना निर्धारित डोज लेने अनिवार्य होता है। यह सुनकर डॉक्टर विजय ने तत्काल अस्पताल के अन्य डॉक्टरों से संपर्क साधा और जरूरी जानकारी प्राप्त की। उन्होंने फोन करने वाले शख्स को बताया कि एम्स के ऑर्ट क्लीनिक में दवाइयां उपलब्ध है, बस उन्हें किसी तरह अस्पताल तक आना होगा और दवाई ले जानी होगी। जानकारी के मुताबिक मरीज किस वाहन से अस्पताल आकर दवा ले उसके सामने यह भारी चुनौती के तौर पर बनी हुई है। ठीक इसी तरह अमृतर के एक शख्स ने उन्हें फोन किया कि उनके पिता का उपचार एम्स के जेरियाट्रिक विभाग से चल रहा है। दवा खत्म होने वाली है। स्थानीय स्तर पर निजी और सरकारी अस्पताल में उन्हें दवाइयां नहीं मिल पा रही है, ऐसे में वह क्या करें? 

इस तरह हो सकती है परेशानी दूर  
विशेषज्ञों के मुताबिक लॉक डाउन के कारण ऐसे मरीजों को परेशानी होना स्वभाविक है क्योंकि जिस अस्पताल में उनका पंजीकरण किया गया है और जहां से उपचार किया जा रहा है। अमूमन 'यादातर दवाइयां वहीं से दी जाती है। कैंसर और एचआईवी जैसी दवाइयां तो 'यादातर अस्पतालों से ही दी जाती है। कैमिस्ट शॉप पर या तो इनकी दवाएं उपलब्ध नहीं होती या फिर उनकी कीमत इतनी अधिक होती है कि एक आम मरीज उसे खरीदने में सक्षम ही नहीं है।

हलांकि , कुछ सरकारी अस्पतालों में ओपीडी सेवा समय की कटौती कर तो जारी है लेकिन वहां पहुंचा कैसे जाए यह मुख्य समस्या है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह एक ऐसी व्यवस्था विकसित करे, जिसके तहत लॉकडाउन की स्थिति में स्थानीय स्तर पर ही कैंसर, एचआईवी/एड्स की जरूरी दवाएं मरीजों को सरकारी या निजी अस्पताल से दिया जा सके। निजी अस्पतालों से जिन मरीजों को दवाएं अगर लेते हैं तो ऐसे मरीजों को सरकार उसकी कीमत या तो अस्पताल को चुका सकती है या मरीज को रिइंबर्स भी किया जा सकता है।
 

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