Sunday, Mar 24, 2019

भारत में ‘देश भक्ति की वापसी’

  • Updated on 3/15/2019

ऐसा कभी हुआ नहीं कि भारतीय वायुसेना ने अधिकृत ट्विटर पर अपने वायुवीर अभिनंदन वर्धमान की प्रशस्ति में लिखी कविता प्रसारित की हो लेकिन सिर्फ ऐसा हुआ ही नहीं, देश के मीडिया ने उसे मान्य किया, उसकी खबर छापी।

यूं तो देशभक्ति का जज्बा हमेशा विद्यमान रहा ही है-जब कभी विदेशी हमलों, दासता के खिलाफ आवाज उठी, वह इसी वर्ग में मानी गई पर सत्य और ऐसा कटु सत्य भी है कि सामान्यत: दरबार में हाजिरी लगाने वाले रायबहादुर और रायसाहब भी ऐश और विलास करते रहे, जबकि भगत सिंह फांसियों पर चढ़ते रहे।

करारा जवाब देना भी देशभक्ति
आज माहौल में फर्क है। देशभक्ति सिर्फ सरहद पर सीमा की रक्षा में प्राण देना मात्र नहीं, दुश्मन के घर में घुसकर आतंकी अड्डे तबाह करना मात्र नहीं बल्कि मीडिया के विभिन्न अवतारों में राष्ट्रीय विश्वास पर हो रहे हमलों का करारा जवाब देना भी बना है। पहली बार सैकुलर कहे जाने वाले उस वर्ग को मुंह छुपाए रक्षात्मक होना पड़ रहा है जो 7 दशकों से देश के बौद्धिक आकाश में एकछत्र राज और प्रभुत्व जमाए हुए था। यह स्थिति कदाचित औरंगजेब के अवसान और शिवाजी के उदय से ज्यादा समझी जा सकती है।

देश की बहुसंख्यक जनता हिन्दू है-इसी कारण सभी मतों, सम्प्रदायों को समान अधिकार, अवसर और हिन्दुओं पर क्रुद्ध होने, उनके मजाक उड़ाने के भी अधिकार प्राप्त हैं। पूरे देश में 2 लाख से ज्यादा कश्मीरी मुसलमान छात्र-छात्राएं या तो गृह मंत्रालय से छात्रवृत्ति पाकर या अपने खर्च पर पढऩे विभिन्न नगरों में जाते हैं। इसके अलावा इनमें शाल, कश्मीरी हस्तकला के व्यापारी, निजी व सरकारी, दूरदर्शन मीडिया में कार्यरत कश्मीरी संवाददाता भी हैं। 

एक दुर्भाग्यजनक घटना लखनऊ में होती है तो उसे सैकुलर मीडिया ‘कश्मीरियों पर हमला’ कह कर पूरे देश पर थोप देता है पर पूरे देश में वे सुरक्षित और निर्भय काम करते आ रहे हैं-इसकी कोई चर्चा नहीं। मैं स्वयं देहरादून में कश्मीरी मुस्लिम छात्राओं से मिला, उन्हें हर सुरक्षा पुलिस ने दी।

इसका कोई अर्थ ही नहीं माना गया। नफरत और हिन्दू द्वेष को जिन्होंने सैकुलरवाद की परिभाषा बना दिया था, वे देशभक्ति की इस आक्रामकता और हर हाल में जीतने की उद्यमता के सामने ठिठक गए हैं, पर हारे अभी भी नहीं हैं।

राफेल विमानों का मामला
राफेल विमानों का मामला ऐसा ही एक अन्य उदाहरण है। वे सब जो विभिन्न आॢथक अपराधों, घोटालों में अभियुक्त बने हैं या अदालती और जांच एजैंसियों के घेरे में हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई, आज क्यों लामबंद हो गए? अपुष्ट आधार पर शक पैदा कर वे भारतीय सैन्य बल का मनोबल बढ़ा रहे हैं या भारत के शत्रुओं का? पर आमतौर पर उन्हें जो शाब्दिक प्रहार झेलने पड़े इसके वे अब तक आदी नहीं थे।

हिन्दुओं को अपमानित कर देश वैसे ही नहीं चलाया जा सकता जैसे किसी भी जाति या मतावलम्बी को तिरस्कृत कर संविधान बचाया नहीं जा सकता। विभिन्न दलों व क्षेत्रों में हिन्दू मानस भारत की शक्ति है कमजोरी नहीं। पर आज तक हिन्दू संवेदनाओं का अपमान प्रगतिशीलता का मानक बना हुआ था-अब खबरें बनती हैं कि पहली बार इस देश के प्रधानमंत्री ने कुंभ में डुबकी लगाई या काशी विश्वनाथ धाम का भूमि पूजन किया।

अमरीकी जनता को पता चलता है कि भारत से एक ऐसा प्रधानमंत्री भी आया है जो व्हाइट हाऊस के शानदार डिनर में नवरात्रों का व्रत होने के कारण केवल पानी पीता रहा और न्यूयार्क, लंदन, जेद्दा, दुबई से शंघाई तक भारत की भाषा में बोला।

जिन कश्मीरी मुसलमानों ने वहां के हिन्दुओं को जो इन सब मुस्लिमों के साथ पूर्वज सांझे करते हैं-निकाले जाते समय सन्नाटा ओढ़े रखा, वे आशा करते हैं शेष देश में हिन्दू उनके साथ प्रेम और आत्मीयता का व्यवहार करेंगे। वैसा तो होता ही है पर क्या आज तक एक भी कश्मीरी मुस्लिम या दिल्ली के सैकुलर पत्रकार ने 5 लाख हिन्दुओं के कश्मीर से बलात् एवं बर्बरता से किए गए निष्क्रमण का विरोध किया और मुस्लिम जेहादियों को कटघरे में खड़ा किया?

देशभक्ति अब हिन्दू उदय के साथ जुड़कर अधिक प्रभावशाली हो गई है। अब चर्च के आर्क बिशप, विभिन्न सम्प्रदायों के इस्लामी मौलाना टुकड़ा-टुकड़ा एकता का तिलिस्म पैदा कर रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि अब तक हिन्दुओं के धर्मान्तरण और उन पर जनसांख्यिकीय दबाव बनाने के उनके षड्यंत्रों का रास्ता बंद होता जा रहा है।

संविधान की सर्वोच्चता, राष्ट्र में हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई के नारे का धरातल पर सच होना केवल तब तक संभव है जब तक भारत में हिन्दू बहुसंख्यक हैं। जिस दिन हिन्दू अल्पसंख्यक होने की तरफ मुड़ गया, भारत अभारत हो जाएगा।

यह कहना, सुनना बेतुका बताने वाले भी 1947 के नरसंहार, मीरपुर और बहावलपुर में हिन्दुओं पर हुए हमलों की पाश्विकता स्मरण नहीं करना चाहते। वे सब और धनाढ्य सुरक्षित बिलों में वैसे ही सुरक्षित हैं जैसे अंग्रेजों के वक्त रायसाहब हुआ करते थे।

भारत के प्रति वैश्विक नजरिया बदला
पिछले दिनों एक प्रमुख देश के वरिष्ठ राजदूत के साथ सायंकालीन रिसैप्शन में बातें हुईं। वे बोले पहली बार भारत के प्रति देखने का वैश्विक नजरिया बदला है। एक ऐसा क्षण था जब पोखरण-2 हुआ, पर पाकिस्तान के भीतर घुस कर हजार-हजार किलो के बम गिराकर लौट आना, यह किसी को भी भारत के लिए अविश्वसनीय लगता है क्योंकि अब तक भारत एक दब्बू, युद्ध के बाद भी हानिकारक समझौते करने वालों, भ्रष्ट और विलासी राजनेताओं का देश माना जाता रहा।

देशभक्ति भारत का धर्म है। यहां गुरु तेग बहादुर साहब ‘हिन्द की चादर’ कहाए गए-सिखों या पंजाब की नहीं। शिवाजी के नाम पर तमिलनाडु में लोग अपना नाम रखते हैं। विवेकानंद जब धर्म पर बोलते हैं तो भारत उनके हर वाक्य में अभिव्यक्त होता है। लोग गर्व से अपने बच्चों का नाम भारत रखते हैं। यह किसी अन्य देश में नहीं होता।

देशभक्ति अब लोकतंत्र के वर्तमान उत्सव का भी मुख्य बिन्दू बनी है तो यह शुभ है। पहली बार देश में हर राजनेता हर दल से स्वयं को बेहतर हिन्दू, बेहतर देशभक्त बता रहा है। जय हो!                                                         ---तरुण विजय

 डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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