Wednesday, Mar 20, 2019

जापान और चीन के बाद भारत ने भी बनाई मैग्लेव ट्रेन, स्पीड होगी 800 किमी प्रति घंटा

  • Updated on 2/25/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। बुलेट ट्रेन के साथ-साथ अब भारत को जल्द ही एक और ट्रेन का तोहफा मिलने वाला है। इस ट्रेन का नाम है 'मैग्लेव' ट्रेन जो कि हवा में उड़ने के लिए तैयार है। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में 'मैग्लेव' ट्रेन का सफल प्रदर्शन किया गया। ये शानदार सफलता मिली है राजा रामन्ना सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नॉलजी (RRCAT) के वैज्ञानिकों को जिन्होंने करीबन 10 साल की मेहनत के बाद इस ट्रेन का प्रोटोटाइप मॉडल बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है।

ये है इस ट्रेन की खासियत
'मैग्लेव' ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत है कि ये पटरियों पर नहीं दौड़ती बल्कि उससे थोड़ा ऊपर हवा में उड़ती है। इस ट्रेन के ऑपरेशन में सबसे मुख्य भूमिका मैग्नेटिक सिस्टम की होगी। इस ट्रेन की स्पीड 600 किलोमीटर प्रति घंटा है। राजा रामन्ना सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नॉलजी के मैग्नेटिक टेक्नॉलजी डिविजन के हेड और वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आर. एस. शिंदे बताते हैं कि भारत सरकार अगर चाहे तो इस ट्रेन की स्पीड 600 किलोमीटर से बढ़ाकर 800 किलोमीटर प्रति घंटे भी की जा सकती है।

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इस ट्रेन की एक और खासियत है कि ये ट्रेन पूरी तरह से ईको फ्रेंडली है क्योंकि इससे प्रदूषण नहीं फैलता है। ये ट्रेन किसी भी तरह के हादसे का शिकार नहीं हो सकती क्योंकि ट्रैक से फीसिकली ये टच में नहीं होगी। अगर ट्रेन में कोई खराबी आती है तो वो हमें पहले ही पता चल जाएगी जिससे हम उसे ठीक कर सकते हैं या फिर रोक सकते हैं।

इसके साथ ही इस ट्रेन को चलाने के लिए हम बिजली की जगह सोलर पैनल का इस्तेमाल कर सकते हैं जिसे इसके ऊपर लगाया जा सकता है।

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ऐसी ट्रेन बनाने वाला भारत तीसरा देश
'मैग्लेव' ट्रेन बनाने वाला भारत दुनिया का तीसरा देश है। इससे पहले ये ट्रेन जापान और चीन द्वारा बनाई गई है। भारत में इस टेक्नॉलिजी का किस तरह से इस्तेमाल किया जाएगा ये तो आने वाले समय में ही पता चलेगा। अगर इस प्रोजेक्ट पर और काम किया जाता है तो हो सकता है कि हम इसे चाइना और जापान से भी बेहतर बना दें।

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'मैग्लेव' ट्रेन 10 सालों की मेहनत : डॉ. आर एस शिन्दे
अपनी इस सफलता के बारे में बात करते हुए डॉ. शिन्दे बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट पर हम 10 सालों से काम कर रहे थे लेकिन पिछले 3 सालों से इस काम में तेजी आई। पूरी टीम की कड़ी मेहनत के बाद इस ट्रेन के प्रोटोटाइप को तैयार किया गया है। अगर सरकार द्वारा इसे अप्रूवल मिलता है तो हम इस ट्रेन को वास्तविक रूप देने के लिए तैयार हैं।

इस ट्रेन के फायदों के बारे में डॉ. शिन्दे कहते हैं भले ही अभी इस ट्रेन को शुरू करने में थोड़ा ज्यादा बजट आए लेकिन एक बार यह पूरा प्रोजेक्ट सही तरीके से सेट हो जाता है उसके बाद इसमें होने वाले खर्च काफी कम हो जाएंगे क्योंकि इंटरनेशनल मार्केट के मुकाबले भारत में रॉ मटेरियल काफी सस्ते हैं। यही वजह है कि हम चाहते थे कि चाइना या फिर जापान से इस टेक्नॉलिजी को खरीदने से अच्छा है कि हम इसे खुद अपने देश में बनाएं जो चीजें हमें दूसरे देशों से लेनी पड़ती है, अच्छा होगा कि वो चीजें हमारे देश में मैनुफैक्चर शुरू होने लगें। 

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'मैग्लेव' ट्रेन से भारत को होंगे कई फायदे : आरुष कुमार 
इस ट्रेन को बनाने में मैग्लेव द्वारा मैगनेट उपलब्ध करवाया गया है। इस प्रोजेक्ट के बारे में बात करते हुए मैग्लेव के सीईओ आरुष कुमार कहते हैं 'इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने में हमें बहुत खुशी हुई है। यह दूसरे देशों की टेक्नॉलिजी है जिसे स्वदेशी रूप से विकसित किया गया है। अगर इस ट्रेन को भारत में विकसित किया जाता है तो आने वाले समय में हमारे देश में रोजगार के अवसर कई गुना बढ़ जाएंगे।'

बुलंदियों पर रहा इस गांव का नाम
देश की इस पहली 'मैग्लेव' ट्रेन को बनाने में हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के सुंदरनगर उपमंडल की ग्राम पंचायत जैदेवी का नाम भी शामिल है। इसके पीछे वजह है यहां स्थित मैग्लेव फैक्ट्री जिसने इस ट्रेन को बनाने के लिए मैगनेट उपलब्ध किया। इस बारे में मैग्लेव फैक्ट्री के सीईओ आरुष कहते हैं प्रदेश का एक छोटा सा गांव आज सुर्खियों में है ये देखकर बहुत खुशी हो रही है। यह मुकाम हासिल करने में उनकी दस साल की मेहनत लगी है और यही मेहनत दुनिया को भारत का लोहा मनवाएगी।

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