Sunday, Feb 28, 2021
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हैदराबाद के निजाम संपत्ति मामले में भारत की हुई जीत, जानें क्या है पूरा मामला

  • Updated on 10/3/2019

नई दिल्ली/ प्रियंका शर्मा। ब्रिटेन की अदालत ने हैदराबाद के आखरी निजाम (Nizam of Hyderabad) की संपत्ति को लेकर भारत के पक्ष में फैसला सुनाया है। 70 सालों से ब्रिटिश बैंक (British Bank) अकाउंट में जमा 3.5 करोड़ पाउंड यानि 306 करोड़ पर ब्रिटेन की अदालत ने पाकिस्तान (Pakistan) के दावे को खारिज कर दिया और इसमें फैसला भारत और निजाम के उत्तराधिकारियों के हक में आया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि 306 करोड़ की संपत्ति पर भारत और निजाम के उत्तराधिकारियों का हक है।

इस मामले में मशहूर वकील हरीश साल्वे (Harish Salve) की ये बड़ी जीत मानी जा रही है इससे पहले पाकिस्तान के साथ कुलभूषण जाधव (Kulbhushan Jadhav) मामले में भी इनकी जीत हुई थी। और इन दोनों मामले में खावर कुरैशी (khawar Qureshi) पाकिस्तान की ओर से वकिल थे। इस मामले में भारत का दावा मान्य हुआ। और भारत की जीत हुई।

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संपत्ति के हकदार हैं भारत और निजाम के उत्तराधिकारी
दरअसल भारत की हैदराबाद रियासत के 7वें और आखिरी निजाम मीर उस्माल अली खान सिद्दीकी के वित्त मंत्री की तरफ से लंदन स्थित पाकिस्तानी उच्चायुक्त के बैंक खाते में जमा करवाई गई रकम पर पाकिस्तान अपना दावा कर रहा था। इस फैसले में जस्टिस मार्कस स्मिथ ने 140 पेज के फैसले में कहा कि 71 साल से पहले जो रकम जमा करवाई गई थी उस पर भारत और निजाम के वारिस मोकर्रम जाह, मोफर्रख जाह का अधिकार है। अब इस संपत्ति को भारत और निजाम के वारिसों में बांटा जाएगा। बताया जा रहा है कि संपत्ति बटवारे को लेकर दोनों के बीच समझौता हो चुका है।

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7 दशक पूराना है मामला
ये मामला 1948 का है जब 7वें निजाम के दरबार में वित्त मंत्री रहे नवाब मोइन नवाज जंग ने 10 लाख पाउंड की रकम ब्रिटेन में पाकिस्तान के तत्तकालिन उच्चायुक्त हबीब इब्राहिम रहमतुल्लाह के लंदन स्थित बैंक खाते में जमा करायी थी। ये प्रक्रिया तब हुई थी। जब हैदराबाद की रियासत का विलय भारत में हो रहा था। 

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1948 तक हैदराबाद निजाम रियासत था
15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ था तब हैदराबाद समेत कई रियासते इससे दूर थे। हैदराबाद 17 सितंबर 1948 तक निजाम शासन के तहत उनकी रियासत बना रहा था। इसके बाद ऑपरेशन पोलो नाम के सैन्य अभियान के जरिए इस रियासत का विलय भारत में कर दिया गया। उस वक्त हैदराबाद आसफ जाह वंश के सातवें बंशज नवाब मीर उस्मान अली खान सिद्दीकी का रियासत हुआ करता था। कहा जाता है कि उस दौर में वो दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति थे। बताया जाता है कि पैसे को सुरक्षित करने के लिए उस समय निजाम के वित्त मंत्री ने 10 लाख पाउंड लंदन में पाकिस्तान के हाई कमिश्नर के बैंक खाते में ट्रांसफर कर दिया था। 1948 में ट्रांसफर किया गया पैसा बाद में सातवें निजाम के उत्तराधिकारियों और पाकिस्तान के बीच कानूनी जंग का कारण बना।

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रहमतुल्लाह ने पैसे वापिस देने से इनकार कर दिया था
पैसे ट्रांसफर होने की जानकारी जब हैदराबाद के सातवें निजाम को हुआ तो उन्होंने पाकिस्तान से कहा कि उन्हें वो पैसा जल्द लौटा दें। लेकिन रहमतुल्लाह ने पैसे वापिस देने से इनकार कर दिया और कहा कि अब ये पाकिस्तान की संपत्ति बन गई है। इसके बाद 1954 में सातवें निजाम और पाकिस्तान के बीच एक कानूनी जंग शुरू हुई और निजाम ने पैसे वापस लेने के लिए यूके के हाई कोर्ट का रुख किया। जिसमें फैसला पाकिस्तान के पक्ष में चला गया जिसके बाद निजाम कोर्ट्स ऑफ अपील में गए और वहां निजाम की जीत हुई।

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1955 में पाकिस्तान के पक्ष में फैसला रहा
इसके बाद 19 जुलाई 1955 में पाकिस्तान ने यूके के उच्चतम न्यायालय हाउस ऑफ लार्ड्स में अपिल की। जिसमें पाकिस्तान का कहना था कि निजाम पाकिस्तान पर मुकदमा नहीं कर सकात है क्योंकि ये एक संप्रभु राष्ट्र है। हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने पाकिस्तान के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि निजाम पाकिस्तान पर किसी तरह का मुकदमा नहीं कर सकते और इसी के साथ 10 लाख पाउंड की विवादित राशि को फ्रीज कर दिया गया और तब से वे पैसा नैटवेस्ट बैंक के पास है। जो 7 दशकों में बढ़ते हुए 35 लाख पाउंड यानि 306 रूपये हो गया।

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पाकिस्तान ने केस बंद करने की मांग की थी
1967 में हैदराबाद के सातवें निजाम की मौत हो गई और इस मामले की आगे कि लड़ाई उनके उत्तराधिकारियों ने आगे बढ़ाया। साल 2013 में सातवें निजाम के पोते युवराज मुकर्रम जाह-आठवें का प्रतिनिधित्व करने वाली लॉ संस्था विदर्स वर्ल्डवाइड लॉ फर्म के पॉल हेविट्ट इसमें शामिल हुई जब पाकिस्तानी उच्चायुक्त ने पाकिस्तान के लिए पैसे निकालने की उम्मीद में बैंक के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू की। जिसके बाद बैंक ने इस मामले सुनवाई की, और कहा कि इस रकम पर दो अन्य दावेदार निजाम के उत्तराधिकारी और भारत भी है। पाकिस्तान ने केस बंद करने की मांग की लेकिन भारत ने दलिल दी कि ऐसा करना न्याय के हितों के खिलाफ है और केश दुवारा शुरू हुआ जिसमें फैसला निजाम के उत्तराधिकारियों और भारत के पक्ष में रहा।


 

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