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अपनी मौत के बारे में पहले से जानती थीं इंदिरा गांधी, आखिरी भाषण में कही थी ये बात

  • Updated on 10/31/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। 30 अक्टूबर 1984 में भुवनेश्वर में देश की आयरन लेडी इंदिरा गांधी ने अपने आखिरी भाषण में कहा था “मैं आज यहां हूं, कल शायद यहां न रहूं। मुझे चिंता नहीं। मेरा जीवन लंबा रहा है मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है। मैं अपनी आखिरी सांस तक ऐसा करती रहूंगी और जब मैं मरुंगी तो मेरे खून का एक एक कतरा भारत को मजबूत करने में लगेगा।“

इंदिरा गांधी महज एक नाम नहीं बल्कि ताकत का स्वरूप थी जिसके आगे अमेरिका भी सजदा करता था। दुबली पतली काया वाली इंदिरा के फौलादी इरादों की दुनिया कायल थी। एक अमीर घराने में इंदिरा का जन्म भले ही हुआ हो लेकिन उनकी जिंदगी हमेशा ही उतार चढ़ाव भरी रही। 

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इंदिरा की हत्या
आज की तारीख इतिहास में इंदिरा गांधी की हत्या के दिन के तौर पर दर्ज है। इंदिरा गांधी ने 1966 से 1977 के बीच लगातार तीन बार देश की बागडोर संभाली और उसके बाद 1980 में दोबारा इस पद पर पहुंचीं और 31 अक्टूबर 1984 को पद पर रहते हुए ही उनकी हत्या कर दी गई।

दर्द से रहा रिश्ता 
उन्होंने अपना बचपन बेहद ही तन्हाई और मायूसी के साथ जिया था। राजनीति उनकी जिंदगी पर हावी थी। घर की इकलौती बेटी होने के नाते उन्हें सबका प्यार मिलता था। इसके बावजूद उनका बचपन बेहद तन्हा था। उनके घर में जहां मां हमेशा बीमार रहती थी पिता नेहरू का देश में बड़ा नाम था। लेकिन इन सब के बीच इंदिरा अकेली थीं। इंदिरा के जन्म के तीन साल बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू महात्मा गांधी से मिले और आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। इस बात का जिक्र इंदिरा गांधी की फूफेरी बहन नयन तारा सहगल ने अपने किताब Indira Gandhi tryst with power में किया है। पिता के मिशन आजादी का असर इंदिरा पर भी पड़ा। इंदिरा ने आम बच्चों की तरह बचपन में खिलौनों से खेल नहीं खेला बल्कि बच्चों की वानर सेना बना ली जो क्रांतिकारियों की मदद किया करती थी। 

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मां को नहीं देख पाई थी इंदिरा
पंडित नेहरू को इंदिरा की पढ़ाई की चिंता रहती थी। जवाहरलाल नेहरू ने इंदिरा को पुणे के बार्डिंग स्कूल में भेज दिया इसके बाद इंदिरा पढ़ाई के लिए रबिंद्र नाथ टेगौर के शांति नेकितन चली गई। जवाहरलाल नेहरू कमला नेहरू को लेकर स्विट्जरलैंड ले गए। लेकिन 28 फरवरी 1936 को कमला नेहरू जिंदगी से हार गईं। अफसोस कि इंदिरा गांधी आखिरी बार अपनी मां कमला नेहरू का चेहरा तक नहीं देख पाई। इन्हीं परिस्थितियों ने उन्हें मजबूत बनाया। 

1937 में वो पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड चली गई। पिता और बेटी के बीच चिट्ठियों से बातचीत होने लगीं। इन चिट्ठियों से इंदिरा को भारत के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला और इन्ही चिट्ठियों ने तन से दुबली पतली इंदिरा को भीतर से लोहे की तरह मजबूत बनाया। 

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जब भड़क गए थे नेहरु 
1941 में इंदिरा भारत आ गई। जब इंदिरा गांधी लौटी तो उन्होंने पिता घर बसाने की बात कह दी, जिसे सुनकर पंडित नेहरु दंग रह गए थे। इंदिरा ने फिरोज गांधी से शादी करने की बात कही थी। फिरोज वहीं थे जिन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए थे। इंदिरा और फिरोज का प्यार लंदन में परवान चढ़ा था।

जेल में रहे थे फिरोज और इंदिरा 
पंडित नेहरू ने इंदिरा के फैसला पर बहुत नाराजगी जताई लेकिन काफी समझाने के बाद पंडित नेहरू ने कहा कि अगर महात्मा गांधी मान जाते है तो उन्हें कोई एतराज नहीं है। इंदिरा ने महात्मा गांधी से बात की और 26 मार्च 1942 में दोनों की शादी हो गई। दोनो शादी के बाद हनीमून के लिए कश्मीर गए वहां से आने के बाद उन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने नेनी जेल में डाल दिया और 13 महीने तक वो वहीं बंद रहे।

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लिए थे कठोर फैसले
19 नवंबर 1917 को इलाहाबाद में जन्मीं इंदिरा प्रियर्दिशनी गांधी आकर्षक व्यक्तित्व वाली मृदुभाषी महिला थीं और अपने कड़े से कड़े फैसलों को पूरी निर्भयता से लागू करने का हुनर जानती थीं। उन्होंने जून 1984 में अमृतसर में सिखों के पूजनीय स्थल स्वर्ण मंदिर से आतंकवादियों को बाहर निकालने के लिए सैन्य कार्रवाई को अंजाम दिया था। इसके अलावा 1975 में आपातकाल की घोषणा और उसके बाद के घटनाक्रम को भी उनके एक कठोर फैसले के तौर पर देखा जाता है।

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