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OMG! इंडोनेशिया में हर 3 साल पर कब्रों से निकाली जाती हैं लाशें और फिर...

  • Updated on 7/20/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। इस दुनिया में कई तरह के समुदाय है जिनसे कई हजारों किस्म के लोग जुड़े हैं। यहां की भाषा से लेकर लोगों के रहन-सहन और उनके त्यौहार भी अलग तरह के होते हैं। ऐसा ही एक अजीब और डरा देने वाला त्यौहार मानते हैं इंडोनेशिया के लोग।

इंडोनेशिया का मा'नेने फेस्टिवल ऐसा ही एक फेस्टिवल है। जो अजीब होने के साथ ही काफी डरावना है लेकिन इसे मनाने वाले लोग इसे डरावना नहीं मानते। ये फेस्टिवल एक खास जनजाति के लोग मनाते हैं। इस फेस्टिवल का मकसद लाशों की साफ-सफाई होता है।

त्यौहार मनाने की वजह
दरअसल, इस जनजाति के लोगों का मानना है कि मौत भी एक पड़ाव है, जिसके बाद मृतक की दूसरी यात्रा शुरू हो जाती है और इसी यात्रा के लिए लाशों को तैयार किया जाता है और उनको सजाया जाता है।

ऐसे हुई थी शुरूआत
इस मा'नेने फेस्टिवल की शुरुआत लगभग 100 साल पहले की मानी जाती है। इस त्यौहार को शुरू करने के पीछे बरप्पू गांव की एक कहानी है जिसे वहां के बुजुर्ग सुनाते हैं। कहते हैं कि 100 साल पहले गांव में टोराजन जनजाति का एक शिकारी शिकार के लिए जंगल आया। इस शिकारी को जंगल के काफी अंदर आने के बाद एक लाश दिखाई दी।

शिकारी ने सड़ती-गलती लाश को अपने कपड़े पहनाए और उसका अंतिम संस्कार किया। इसके बाद से शिकारी की लाइफ बहुत अच्छी हो गई। इसी के बाद से इस जनजाति के लोग अपने पूर्वजों को सजाने की इसी प्रथा का पालन करते आ रहे हैं। लोगों का मानना है कि इस तरह से लाशों की आत्माएं खुश होती हैं और आशीर्वाद देती हैं।

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ऐसे मनाते है त्यौहार
इसकी शुरूआत किसी के मरने के साथ ही हो जाती है। लोग मरने वाले बुजुर्ग को दफनाते नहीं हैं बल्कि उन्हें लकड़ी के ताबूत में रख देते हैं और उनकी मौत को जश्न कीई तरह मनाते है। लोग मानते हैं कि वो अब नई यात्रा पर निकले हैं। इसलिए लंबे समय तक उनकी लाश को दफनाया नहीं जाता बल्कि उन्हें ताबूत में रखा जाता है।

फिर तीन साल बाद उन्हें निकाल कर नए कपड़े पहना कर त्यौहार मनाया जाता है, उनके साथ बैठ कर खाना खाया जाता है और फिर उन्हें वैसे ही सुला दिया जाता है। उनके उतरे हुए कपड़ों को उनके परिजन पहन लेते हैं। फिर काफी सालों बाद जब लाशों से हड्डियां निकलने लगती है तब उन्हें  जमीन में दफनाया जाता है।

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