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Exclusive: कांग्रेस उद्योगों का तो फायदा चाहती है, पर किसानों का नहीं

  • Updated on 9/28/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। कृषि में नए बदलावों को लेकर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर (Prakash Javdekar) से पंजाब केसरी/नवोदय टाइम्स ने विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं उनके साक्षात्कार के प्रमुख अंश :

सवाल: कांग्रेस पार्टी का दावा है कि ये विधेयक किसान विरोधी हैं। आपका क्या कहना है? 
जवाब: आज भी कांग्रेस दावा करती है कि डॉ. मनमोहन सिंह ने उद्योगों के उदारीकरण में अहम भूमिका निभाई। वे उद्योगों के उदारीकरण को तो सराहते हैं, लेकिन जब वही उदारीकरण किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए किया जाता है, तो वे इसमें बाधा डालने और झूठ फैलाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ते हैं।  कांग्रेस पार्टी चाहती है कि उद्योगों को तो फायदा हो, लेकिन किसानों को नहीं।  अतीत के कांग्रेस घोषणा पत्रों को देखें। कांग्रेस ने अपने ‘घोषणा पत्र 2019’ में उल्लेख किया कि वह कृषि उपज मंडी समिति के अधिनियम को निरस्त कर देगी और निर्यात एवं अंतर-राज्य व्यापार सहित कृषि उपज के व्यापार को सभी पाबंदियों से मुक्त कर देगी।  इसी घोषणा पत्र में कांग्रेस ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के स्थान पर एक ऐसा अनुकूल कानून बनाने का वादा किया, जिसे केवल आपात स्थितियों में ही लागू किया जा सकेगा। वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि कांग्रेस शासित राज्यों को फलों और सब्जियों को ए.पी.एम.सी. अधिनियम से हटा देना चाहिए।  कांग्रेस शासित राज्यों कर्नाटक, असम, हिमाचल प्रदेश, मेघालय और हरियाणा ने इस दिशा में कदम उठाकर फलों और सब्जियों को इस अधिनियम से हटा दिया। अब, उसी पार्टी को उन्हीं कदमों से समस्या है जो उसने स्वयं भी उठाए होते। या तो वे अपने घोषणा पत्र में झूठ बोल रहे थे या अब झूठ बोल रहे हैं कि ये कदम किसान विरोधी हैं।

सवाल: आपने आवश्यक वस्तु अधिनियम (ई.सी.ए.) में संशोधन क्यों किया?
जवाब: ई.सी.ए. से कुछ उत्पादों को अलग करने से वास्तव में उन पर कृत्रिम रूप से मूल्य निर्धारण बाधा लागू नहीं होती है। इससे सामान्य परिस्थितियों में वास्तविक कीमत के बारे में पता लगाने में सहूलियत मिलेगी। कृषि क्षेत्र को निवेश की आवश्यकता होती है और जहां अस्थिरता होती है, वहां निवेश का प्रवाह नहीं हो सकता।  नियामकीय परिदृश्य में स्थायित्व लाने के लिए ई.सी.ए. में संशोधन किया गया है, जिससे किसान फसल पैदा कर सकें और सरकार के बिना दखल के उसे बेच सकें। अब, उचित मूल्य खोज की व्यवस्था लागू होने के साथ ही कुछ फसलों के लिए एम.एस.पी. की सुरक्षा भी मिलेगी। किसानों के लिए व्यापक विकल्प हैं।

सवाल: पंजाब जैसे उत्पादक राज्यों में किसानों से आप क्या कहना चाहेंगे जो इस बिल का विरोध कर रहे हैं?
जवाब: सबसे पहले तो हम पंजाब सहित पूरे देश के किसानों को बताना चाहेंगे कि वे ऐसे स्वार्थी तत्वों से गुमराह न हों, जो 70 वर्षों तक उनका शोषण करते रहे हैं। ये सब सुधार अल्पकाल और दीर्घकाल में किसानों को बहुत लाभ प्रदान करते हैं। जहां एम.एस.पी. का सेफ्टी नैट बना हुआ है, वहीं किसान संभावित रूप से अधिक उपभोक्ताओं को सीधे बेच सकते हैं।  ये किसानों से मौजूदा विकल्पों में से किसी को भी दूर नहीं करता है, बल्कि उनके सामने मौजूद विकल्पों में और ज्यादा विकल्प जोड़ता है। असल बात तो यह है कि पंजाब जैसे महान कृषि राज्य को इससे अत्यधिक लाभ होगा। ज्यादा निजी निवेश, ज्यादा तकनीक और ज्यादा बाजार ङ्क्षलकेज के साथ वह पंजाब जिसके किसानों की फसल पूरे भारत में मांगी जाती है, कई और फसलों में भारत की निर्यात ताकत बन सकता है।

सवाल: कृषि उत्पादन विपणन समिति (ए.पी.एम.सी.) प्रणाली व्यवस्था लंबे समय तक सही काम करती आई है फिर आप इसे खत्म क्यों करना चाहते हैं?
जवाब: यह एक गलत धारणा है कि हम ए.पी.एम.सी. प्रणाली को समाप्त कर रहे हैं। नई व्यवस्था पूरी तरह से ए.पी.एम.सी. के दायरे से बाहर है। इससे पहले, कमोबेश ए.पी.एम.सी. ही एक रास्ता था जिसके माध्यम से किसान अपनी उपज बेच सकते थे। अब, हम उनके लिए उपज बेचने का दूसरा रास्ता भी खोल रहे हैं।  ये विधेयक किसी भी तरह से ‘ए.पी.एम.सी. अधिनियम’ जो राज्यों का कानून है, का अतिक्रमण नहीं करता है। यह पूरी तरह से राज्यों का विशेषाधिकार होगा कि वे ए.पी.एम.सी. प्रणाली के साथ क्या करें। 

सवाल: कृषि विधेयक खेती क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोल देंगे। ऐसे में किसानों के अधिकारों की रक्षा सरकार कैसे सुनिश्चित करेगी?
जवाब: तीनों कृषि विधेयक लाने के पीछे का सबसे बड़ा मकसद किसानों का कल्याण करना है। सरकार सुधारों के सुरक्षात्मक तंत्र के माध्यम से हर स्तर पर अन्नदाताओं के साथ खड़ी होने जा रही है। इनमें से एक विधेयक ‘फार्मर्स (एम्पावरमैंट एंड प्रोटैक्शन) एग्रीमैंट ऑफ प्राइस एश्योरैंस एंड फार्म सॢवसेज बिल, 2020’ में किसानों और निजी कंपनियों के बीच सीधा संबंध स्थापित करने की व्यवस्था की गई है। हालांकि इसमें सीमांत और बड़े किसानों के लिए आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था का पूरा ध्यान रखा गया है। उदाहरण के लिए फसल के जोखिम की स्थिति यानी अगर मौसम की गड़बड़ी के कारण फसल नष्ट हो जाती है, तो ऐसे में संबंधित निजी पक्ष आंशिक या पूर्ण रूप से इस नुक्सान को वहन करेगा। इस तरह के कानून के अभाव में अब तक ऐसा पूरा जोखिम अकेले ऐसे किसानों को उठाना पड़ता था जिनकी पूरी की पूरी फसल कभी-कभी बेमौसम बारिश के कारण नष्ट हो जाती थी। यह विधेयक किसी भी तरह की वसूली के लिए किसानों की भूमि की बिक्री करने, उसे पट्टे पर देने या बंधक लगाने से रोकता है। साथ ही, हमने यह सुनिश्चित किया है कि अनुबंध निजी संस्था के लिए बाध्यकारी होगा लेकिन वह किसान के लिए बाध्यकारी नहीं होगा। यदि किसान ने कोई अग्रिम रकम नहीं ली है अथवा कोई भुगतान हासिल नहीं किया है तो वह अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के बावजूद किसी भी समय और बिना किसी जुर्माने के उसे रद्द कर सकता है।  यदि किसान ने कोई अग्रिम रकम ली है अथवा भुगतान हासिल किया है तो भी वह मूल रकम वापस करते हुए किसी भी समय अनुबंध को समाप्त कर सकता है जिस पर उसे कोई ब्याज नहीं देना पड़ेगा। हालांकि, कोई निजी उपक्रम अनुबंध को एकतरफा रद्द नहीं कर सकता है और इसके लिए उसे उस रकम का भुगतान करना होगा जिसके लिए उसने अनुबंध में सहमति दी है। इस प्रकार, सभी परिस्थितियों में किसानों के हितों की रक्षा की गई है।

सवाल: इन विधेयकों की क्या आवश्यकता थी और इनसे क्या होगा?
जवाब:
भारत के एक स्वतंत्र देश होने के बावजूद वर्षों तक किसानों पर जकडऩ बरकरार रही। हालांकि अन्य सभी उत्पादकों ने अपने उत्पाद को अपनी मर्जी से कहीं भी और उपयुक्त कीमत पर बेचने के अधिकार का फायदा उठाया लेकिन भारतीय किसानों के हाथ बंधे रहे। ये कृषि विधेयक किसानों की जंजीरों को तोडऩे और उन्हें बिचौलियों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए लाए गए हैं। हमारी पूरी राजनीतिक पूंजी को दाव पर लगाने के पीछे यह अपने आप में एक बहुत बड़ी प्रेरणा है कि किसानों के साथ भी अन्य उत्पादकों जैसा व्यवहार सुनिश्चित किया जाए। ये सुधार भारत के कृषि बाजार की विकास क्षमता बेहतर करने, किसानों को सदियों के शोषण से मुक्त कराने और उनकी आय को दोगुना करने के लिए निर्धारित हैं।

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