Friday, Jun 21, 2019

INTERVIEW 2: बदल चुकी है देश की राजनीति- अमित शाह

  • Updated on 5/14/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। 9 अगस्त-2014 को जब पार्टी ने मुझे अध्यक्ष बनाया तो पहली राष्ट्रीय परिषद में मैंने कहा था कि नॉर्थ-ईस्ट में विस्तार करना है। मुझे खुशी है कि नॉर्थ-ईस्ट में भाजपा का काम बढ़ा है। बंगाल, उड़ीसा में हमारा काम बढ़ा है। केरल, तमिलनाडु के अंदर भी अपनी नींव डाल पाए हैं। आंध्र के अंदर थोड़ा कमजोर हैं। भाजपा का विस्तार हम हर राज्य में तेजी से कर रहे हैं। झारखंड, हरियाणा, महाराष्ट्र में पूर्ण बहुमत की सरकारें बनाईं। असम, त्रिपुरा, मणिपुर में पहली बार हमारा मुख्यमंत्री बना। मैं मानता हूं कि 5 साल में मोदी जी के नेतृत्व में पार्टी बहुत विस्तृत हुई है।

राष्ट्रवाद का मुद्दा तेजी से उठा है। दूसरा, आप पॉलिटिक्स और परफॉर्मैंस की बात करते हैं। बैलेंस कैसे करते हैं?

बैलेंस करने की जरूरत ही नहीं है। दोनों के बीच अंतरविरोध है ही नहीं। कोई देश अपने आप को सुरक्षित करे और कोई अपने आप को डिवैल्प करे, दोनों में कहां कोई कंट्राडिक्शन है। आजादी के बाद पहली बार नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक, देश की रक्षा नीति अलग से स्पष्ट हुई। अब तक हमारी डिफैंस पॉलिसी विदेश नीति में मर्ज कर दी गई थी। पहली बार डिफैंस पॉलिसी का एक अलग अस्तित्व आया है और डिफैंस पॉलिसी की प्रॉयरिटी विदेश नीति पर प्रस्तावित है, यह बड़ा परिवर्तन हुआ है।

आगे डिफैंस पॉलिसी पहली प्रमुखता रहेगी?

जी, स्वाभाविक रूप से। जब तक भारतीय जनता पार्टी की सरकारें रहेंगी, आप मानकर चलिए कि देश की सुरक्षा टॉप मोस्ट प्रियॉरिटी में रहेगी।

पंजाब में आम आदमी पार्टी ने गत चुनाव में कुछ गलत लोगों से मदद ली। अभी भी उनकी पार्टी चुनाव लड़ रही है, इसे कैसे देखते हैं?

देखिए, राजनीति के अंदर वैचारिक आंदोलन के रूप में काम करना एक बात है और आम आदमी पार्टी तात्कालिक माहौल में खड़ी हुई है। जनता में एक गुस्सा खड़ा हुआ था। इसको भुनाकर पद प्राप्त कर लेना अलग बात है। मुझे लगता है कि अरविंद केजरीवाल ने अन्ना आंदोलन में जो गुस्सा जनता में पैदा हुआ था, उसे भुनाने का काम किया है मगर जब पार्टी चलाने के लिए आइडियोलॉजी नहीं होती है तो बाद में पार्टी को अलग-अलग प्रकार के ऐसे मिंस को पकडऩा पड़ता है। केजरीवाल यही हैं।

प्रियंका गांधी के उतरने से क्या फर्क पड़ेगा?

पहले आप इस भ्रांति से निकल जाओ कि वह पहली बार गई हैं। वह पिछले तीन लोकसभा चुनावों से जाती रही हैं। कांग्रेस हर बार इनकी नई एंट्री कराती है। 2024 के अगले लोकसभा चुनाव में भी वह इनकी रि-एंट्री कराएगी।

गांधी परिवार और मोदी जी के बीच निजी स्तर पर हमले शुरू हो गए हैं?

देखिए, हमने गांधी परिवार पर कोई आरोप नहीं लगाए हैं, मगर उनकी सरकार के समय में करप्शन हुआ है तो क्या उसका इश्यू भी हम न उठाएं। वो किस प्रकार की डैमोक्रेसी चाहते हैं और क्या काऊ-काऊ कर रहे हैं मीडिया में।

कौन हैं ये जी, क्यों उनके खिलाफ सवाल नहीं खड़े करने चाहिए। आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को दुर्योधन कहते हैं, यह पर्सनल अटैक है।

राफेल को लेकर राहुल गांधी एवं विपक्ष बीच-बीच में अटैक करता है। इसका चुनाव में कुछ असर पड़ेगा?

देखिए, कोई भी आरोप चुनाव पर असर तब डालता है जब उसके पीछे तथ्य हो और जिन पर आरोप लगा है, उनका चरित्र किस प्रकार का है। इसमें दोनों चीजें नदारद हैं। राफेल के आरोप के समर्थन में राहुल गांधी कोई डाटा नहीं दे रहे हैं। डेढ़ साल से कह रहा हूं कि जितना भी डाटा है, आप चले जाओ सुप्रीम कोर्ट में। सुप्रीम कोर्ट को असिस्ट करो सत्य निकालने के लिए, मगर वो हिम्मत उनमें नहीं है। दूसरा, नरेंद्र मोदी का चरित्र निष्कलंक, पारदर्शी है। प्रामाणिक चरित्र है। इन पर ऐसे आरोप चिपकाना बड़ी सरल बात है।

कांग्रेस की न्याय योजना क्या है, इसका क्या असर पड़ेगा?

न्याय पर कोई टिप्पणी करना नहीं चाहता। भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार ने जितनी भी योजनाएं बनाई हैं, वो वोट बैंक जैनरेशन की योजनाएं नहीं हैं, न वोटर को कंसल्टैंट करने की योजना है। वह हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देना चाहती है। हर नागरिक को संविधान ने अच्छा जीवन जीने का हक दिया है। मेरा मानना है कि देश में 50 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनके जीवन स्तर को उठाने के लिए अब तक सही तरीके से काम नहीं हुआ था। नरेंद्र मोदी सरकार ने देश के 50 करोड़ लोगों के जीवन स्तर को उठाने के लिए साइंटिफिक तरीके से काम किया है।

उज्जवला स्कीम में रीफिलिंग की समस्या है?

जी, सही बात है। हमारे सर्वे में भी आया है। रीफिलिंग की समस्या इसलिए आई है कि उनके पास पूरा पैसा नहीं है। रोज कमाकर रोज खाने वाले लोग हैं। इसको देखते हुए अब 5 किलो वाले गैस सिलैंडर भी बना लिए हैं। एक साल के अंदर उज्जवला के जितने लाभार्थी हैं, उन्हें 5 किलो का सिलैंडर देंगे। इससे वह कम रुपया देकर सिलैंडर ले पाएंगे। लकड़ी और कंडों की लागत गैस से ज्यादा है। इसका भी साइंटिफिक इनालिसिस करने के बाद ही योजना को जमीन पर उतारा है।

योजनाओं से महिला सशक्तिकरण हुआ है तो राजनीतिक फायदा भी मिलेगा?

जरूर होगा, मगर मकसद वोट बैंक पॉलिटिक्स नहीं है। यदि गरीब लोग सोचते हैं कि 70 साल बाद कोई सरकार आई है जिसने उनके बारे में सोचा है, देश का पहला प्रधानमंत्री आया है जो उनके लिए सोचता है तो हमें वोट जरूर देगा और क्लेम भी करेंगे, मांगने भी जाएंगे परंतु योजनाओं का उद्देश्य उनके जीवन स्तर को उठाना है। रुपया देते तो वोट बैंक की पॉलिटिक्स होती। हमने चीजें दी हैं, जो जीवन शैली को बदल देंगी।

2014 से 2019 के बीच भाजपा का अच्छा विस्तार हुआ है?

जहां-जहां बूथ बना है, वहां सफलता मिली है। 10 हजार से ज्यादा फुलटाइमर 2 साल से बूथ बनाने का काम किए। वेतन भी नहीं लेते, पार्टी के लिए निकले हैं। पार्टी ऐसे नहीं बढ़ी है। कठोर परिश्रम वर्करों ने किया है। मोदी जी की प्रचंड लोकप्रियता को मत में परिवर्तित करने में सफल होंगे।

कई पार्टियों के नेताओं ने भाजपा ज्वाइन की है, जबकि कई राज्यों में ज्यादा आपकी सरकारें हैं?

16 में से 13 सरकारें भाजपा की ही हैं। तीन गठबंधन की सरकारें हैं। देखिए, जितने भी लोगों ने भाजपा को ज्वाइन किया है, वह चुनाव के पहले किया है। इस्तीफा देकर किया है, बाद में चुनाव में गए हैं। पब्लिक के मैंडेट के साथ छल नहीं किया। फिर से वो मैंडेट लेने के लिए गए और लिया मगर राजनीतिक समीकरण इस तरह का हो जिसमें एक आइडियोलॉजी नई उभरकर आए। जैसे नॉर्थ- ईस्ट में हमारी आइडियोलॉजी अब नई उभर कर आ रही है। किसी राजनीतिक कार्यकर्ता को लगता है कि यह आइडियोलॉजी मेरी से बेहतर है तो उसको डैमोक्रेसी में नई आइडियोलॉजी ज्वाइन करने का अधिकार है। मैं मानता हूं कि चुनाव से पहले राइट है। हमने ये सारे जुड़ाव जो कराए हैं, चुनाव से पहले कराए हैं।

भाजपा में जो नए लोग आ रहे हैं, उससे कल्चरल बदलाव होगा या नहीं?

भाजपा का हाजमा बहुत मजबूत है। वह भाजपा को नहीं बदल सकते, बल्कि भाजपा के साथ रहकर उनकी सोच को बदलने में हम कामयाब होंगे, ऐसा हमें लगता है।

2019 में राजनीतिक माहौल पूरा नकारात्मक हो गया है, असली मुद्दे गायब हो गए हैं?

मैं मानता हूं कि यह मीडिया तक सीमित है। वोटर मुद्दों के आधार पर ही वोट डाल रहा है। कोई वक्ता 40 मिनट का भाषण देता है, उसमें से 2 मिनट कुछ बोलेगा तो मीडिया सुर्खियां बनाता है और बार-बार टी.आर.पी. के कारण दिखाता है। 39 मिनट का भाषण कोई मायने नहीं रखता मगर वोटर के लिए अपने मुद्दे हैं और मुद्दों पर चुनाव हो रहा है। मुद्दों पर ही भाजपा बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है।

जी.एस.टी. और नोटबंदी को लेकर लोगों में नाराजगी है, क्या असर पड़ेगा?

नहीं...ऐसा नहीं है। जी.एस.टी. दुनिया का सबसे बड़ा बिक्रीकर सुधार है। 16 टैक्सों को मिलकर एक बनाया गया है। जब इतना बड़ा रिफॉर्म होगा तो शुरूआती दिक्कतें तो आएंगी ही मगर व्यापारियों व ग्राहकों के साथ संवाद किया है, ट्रेडर्स, होलसेलर्स और मैन्युफैक्चर्स के साथ भी किया।

जबसे जी.एस. टी. लगा है, तब से अब तक प्रॉसीजर में सुधार किए हैं, सिस्टम में भी सुधार किया है, कानून भी बदला है और टैक्स की दरें भी धीरे-धीरे कम की हैं। एक भी फैसला विपक्ष की सहमति के बगैर नहीं लिया है। एक भी फैसले में वोटिंग तक नहीं हुई। विपक्ष बाहर गब्बर सिंह टैक्स कहता है और अंदर समर्थन देता है। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष से पूछना चाहता हूं कि अगर जी.एस.टी. ठीक नहीं है तो आपके वित्तमंत्री अंदर क्या कर रहे थे।

रोजगार के आंकड़ों को सरकार छिपाती है, ऐसा आरोप लगता है?

देश को रोजगार को देखने का नजरिया बदलना होगा। 125 करोड़ आबादी के देश में स्थायी नौकरी नहीं दे सकते हैं। अब कोई 3 करोड़, 5 करोड़ एवं 8 करोड़ के यूरोपियन देशों का आंकड़ा लेकर नापना चाहेगा तो संभव नहीं है। मेरा मानना है कि भारत को जो समझते हैं, उन्हें रोजगार के क्षेत्र में नए विजन की जरूरत है, जो नरेंद्र मोदी ने दिया है। हमने मुद्रा बैंक योजना, स्किल डिवैल्पमैंट और स्टार्टअप के माध्यम से स्वरोजगार को बढ़ावा दिया। इस देश की रोजगार की समस्या को अलग तरीके से सोचकर ही हल किया जा सकता है।

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