Saturday, Mar 23, 2019

सामाजिक बुराई को बखूबी बयां करती है तीन तलाक पर बनी फिल्म फिर उसी मोड़ पर...

  • Updated on 3/6/2019

नई दिल्ली/हुमरा असद। तलाक.... ये लफ्ज जब एक महिला की जिंदगी का हिस्सा बनता है तो जिंदगी के सारे ही गम उसके आगे कम नजर आते हैं। शादी जैसे पाक रिश्ते और दो प्यार करने वालों की जिंदगी में तबाही लाने के लिए एक शब्द काफी है। स्वर्गीय लेख टंडन के निर्देशन में बनी फिल्म फिर उसी मोड़ पर... तलाक जल्द ही रिलीज होने वाली है।

मोदी सरकार द्वारा तीन तलाक पर लाए बिल और समाज के ज्वलंत मुद्दे पर बनी ये फिल्म महिला दिवस यानि 8 मार्च जैसे खास मौके पर ये फिल्म रिलीज होने वाली है। आइये जानते हैं इस फिल्म के स्टार कास्ट कंवलजीत सिंह, कनिका बाजपेई, शिखा इतकान और म्यूजिक कंपोजर त्रिनेत्र बाजपेई से हुई खास बात चीत...

1982 में आई तीन तलाक पर आधारित फिल्म 'निकाह' से कितनी अगल है फिल्म 'फिर उसी मोड़ पर'? 

त्रिनेत्र बाजपेई का कहना है कि दोनों फिल्म नजरिया और कंटेट से बिल्कुल अलग है। 'निकाह' में तीन तलाक को इमोशन तरीके से दिखाया गया है और ये फिल्म में डरामैटिक तरीके से तीन तलाक के हर पहलुओं को दिखाया गया है। तीन तलाक 22 इस्लामिक देशों में बैन है और भारत में ये बैन नहीं है। इसके जरिए मुस्लिम महिलाओं को इस्तेमाल किया जाता है। इस फिल्म के जरिए समाज की इसी कुरीति को दिखाया है। 

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फिल्म का एक डायलॉग है तीन तलाक को उलेमाओं की देन कहता है कुरान की नहीं। इस पर आपका क्या मनना है? 

कनिका बाजपेई ने कहा कि शरियत में इस तरह तीन तलाक का बिल्कुल जिक्र नहीं है। बल्कि इसमें महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का दर्जा दिया गया है। फोन और लेटर के जरिए तलाक का देना पुरुष समाज की देन है। कोई भी धर्म महिलाओं के खिलाफ परिस्थिति पैदा नहीं करता। शरियत के जरिए तलाक का अक तरीका बताया गया है। जिसमें इस तरह के तीन तलाक का जिक्र नहीं है। ये समाज की कुरीति है।

एक खूबसूरत कहानी के जरिए सामाजिक कुरीति और तलाक और तलाकशुदा महिला तबाह होती जिंदगी को बखूबी बयां करती है लेख टंडन की 'फिर उसी मोड़ पर.... तलाक'

धार्मिक पहलू और सामाजिक कुरीति, दोनों में से कौन से पक्ष को दर्शाती है ये फिल्म?

फिल्म में तीन तलाक की शिकार हुई शिखा इतकान कहती हैं कि तलाक एक महिला से जुड़ा मुद्दा है, जो किसी भी धर्म के लोगों के लिए बहुत दुख पहुंचाने वाली चीज है। इसके जरिए तीन तलाक के उस पहलू को उठाया गया है जो शरियत में नहीं बताया गया बल्कि ये एक समाज की देन है। फिल्म महिला की जिंदगी के उस फेस के चारों तरफ धूमती है जो उसे तलाक के बाद झेलनी पड़ती है। 

महिला से जुड़े मुद्दे वाली इस फिल्म को क्या हम नारीवाद से जोड़ सकते हैं?

जाने माने कंवलजीत सिंह का कहना है कि लेख जी की ये बहुत खूबसूरत कहानी है ये कोई लेक्चर है। तलाक से औरत पर ज्यादा असर पड़ता है लेकिन मेरा मानना है कि इसमें सबसे ज्यादा बच्चों पर असर पड़ता है। पर बच्चों पर असर पड़ता है या नहीं ये आप फिल्म में देखेंगे।

मौजूदा सरकार का तीन तलाक बिल महिलाओं के लिए कितना सही साबित हो सकता है?

इस सवाल पर कनिका बाजपेई ने कहा कि ये बिल पास होता भी है तो पुरुष को सजा हो जाएगी, वो जेल चला जाएगा और महिला अकेली सब कुछ सहने के लिए रह जाएगी। तो बिल कुछ ऐसा हो दोनों के लिए सही साबित हो और औरतों को तकलीफ का सामना न करना पड़े। ये फिल्म यही कहती है कि तीन तलाक न हो। ये फिल्म बिल का समर्थन करती है पर बिल प्रैक्टिकल होना चाहिए।

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