Monday, Jan 21, 2019

संविधान की मूल भावना के खिलाफ सवर्ण आरक्षण का प्रस्ताव, तीन सवालों से समझें पूरा मामला

  • Updated on 1/7/2019

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल।  केंद्रीय कैबिनेट ने सवर्ण जातियों के आर्थिक रुप से कमजोर लोगों को सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।  कैबिनेट ने फैसला लिया है कि ये आरक्षण  आर्थिक रुप से कमजोर सवर्ण समाज के लोगों को दिया जाएगा। इसके लिए सरकार संविधान में संशोधन करेगी। हालांकि इस प्रस्ताव को संविधान की मूल भावना के खिलाफ माना जा रहा है। इस प्रस्ताव को लेकर मुख्य रुप से तीन सवाल किए जा रहे है। 

सवर्ण प्रतिनिधित्व का सवाल 
असल में संविधान में आरक्षण का जो प्रावधान किया गया है वो वस उन जातियों और वर्गों के लिए है जो सामाजिक रुप से पिछड़ी हैं और जिनका सरकारी नौकरियों, राजनीति, शिक्षा जैसी प्रमुख जगहों पर समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है। इस आधार पर देखा जाए तो दलित-पिछड़े वर्गों के मुकाबले सवर्ण आरक्षण तार्किक नहीं ठहरता। इसकी वजह यह है कि इन सभी जगहों पर सवर्णों का उचित  प्रतिनिधित्व दिखता है।

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स्वर्ण समुदाय का सर्वे 
स्वर्ण आरक्षण के रास्ते में एक दूसरी सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि देश में सवर्णों के सामाजिक-आर्थिक स्तर या उनकी संख्या को लेकर अभी तक कोई सर्वे नहीं कराया गया है। जातिगत जनगणना का काम शुरू तो हुआ था, लेकिन उसे बीच में ही बंद कर दिया गया। इसलिए आखिर सवर्णों को आरक्षण तार्किक नहीं ठहरता।

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किस आधार पर मिलता है आरक्षण 
संविधान में आरक्षण देने के पीछे सोच यह है कि उन तबकों को समाज की मुख्य धारा में लाया जाए तो सामाजिक रूप से उपेक्षा या पिछड़ेपन का शिकार है। आरक्षण देने का अधिकार जाति या वर्ग को इसलिए बनाया गया क्योंकि देश में कई जातियों-वर्गों के लोग सामाजिक रुप से भेदभाव, उपेक्षा का शिकार रहे हैं। इन जातियों तको मुख्य धारा में लाने के लिए आरक्षण दिया गया। आरक्षण असल में गरीबों दूर करने का औजार नहीं बल्कि सामाजिक भेदभाव दूर करने का साधन है। 

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