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is godse still alive in gandhi''''''''''''''''s country

ज्वलंत मुद्दाः क्या राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के देश में 'गोडसे' अभी भी जिंदा है?

  • Updated on 12/6/2019

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर। यह संयोग ही हैं कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने मरते समय अंतिम शब्द जो बोला- वो 'हे राम' रहा, वहीं उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे (Nathuram Godse) के नाम में भी राम शब्द जुटा हुआ था। राम जो सत्य के प्रतीक हैं, समाज के लिये आदर्श हैं, बलशाली हैं। जिस भारतवर्ष में कण-कण में राम बसा हुआ है उस की धरती पर एक युगद्रष्टा की हत्या हो जाती है तो देश ही नहीं पूरा विश्व सन्न हो जाता है। ऐसा लगता है कि समय थम गया हो। फिर लोगों में जो आक्रोश फैलता है उसकी लपटें तो दूर तक जाती है। 

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राम और गांधी की धरती पर फैला वैमन्यसता का वातावरण

उस समय लोग यह समझ नहीं पा रहे थे कि राम और गांधी की धरती पर वैमन्यसता का ऐसा वातावरण बनेगा। अंग्रेजों के 200 साल के शासनकाल में भी इतनी भयावहता राष्ट्र ने नहीं महसूस किया होगा जितना गांधी की हत्या के दिन 30 जनवरी 1948 को देश ने महसूस किया। जिस दिन लाखों लोग सड़क पर उतर आए। जिस दिन धर्म और जाति की सभी दीवारें टूट गई। क्या हिंदू क्या मुस्लिम सभी एक- दूसरे को ढांढस वैसे ही दे रहे थे कि जैसे उनके घर का सबसे बड़े- बुजुर्ग ने आज विदा ले लिया हो। कुछ दिनों के लिये तो बंटवारें का दर्द भी लोग भूल गए। भूखा-प्यासा देश गोडसे को फांसी के तख्ते पर झूलते हुए देखना सिर्फ चाहता था। फिर वो दिन 8 नवंबर 1949 की वो घड़ी भी आ गई जब गोडसे को फांसी दे दी गई।

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गोडसे के समर्थन में आज भी उठते हैं आवाज

लेकिन गोडसे को फांसी दिये 70 साल बीत गए लेकिन आज भी उनके समर्थन में आवाज उठते रहते हैं। वो भी देश के सम्मानित सांसद जब गोडसे को देश भक्त कहते हैं तो हमारे देश के पीएम कहते है कि वे मन से कभी प्रज्ञा को उसके बयान को लेकर माफ नहीं करेंगे। फिर से गोडसे पर बहस उस समय जिंदा हो जाता है जब लोकसभा में फिर से प्रज्ञा अपनी सफाई देते-देते कुछ न बोलकर भी विपक्षी पार्टियों के निशाने पर आ जाती है। गोडसे अपने पीछे बहुत सवाल छोड़ चला है।   

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गांधी को खत्म करके रामराज्य की परिकल्पना सही नहीं

सवाल उठता है कि क्या उस समय नाथूराम गोडसे जिस हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना कर रहे थे उसमें वे राष्ट्रपिता को सबसे बड़ा बाधक मानते थे या उनकी सोच ही थी कि देश में रामराज्य स्थापित करना हो तो सबसे पहले गांधी को खत्म करना होगा। आखिर गोडसे उस समय क्यों इतने उतावले हो चले कि गांधी की लाश से चलकर वे देश को मिली आजादी को भी उस समय फीका कर दिया। हालांकि यह सच है कि जब देश को आजादी मिली तो बंटवारे का दर्द भी झेलना पड़ा।  

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कभी गोडसे थे गांधी के समर्थक

नाथू राम गोडसे एक 38 साल का युवा जो कभी महात्मा गांधी का समर्थक रहा उसने ही उन्हें मौत की नींद इसलिये सुला दिया क्योंकि उसे लगा कि यह व्यक्ति जिस पर पूरा अविभाजित भारतवर्ष फिदा है, एक आवाज पर उठ खड़ा होता है- यदि भूख हड़ताल पर बैठ जाए तो भारत सरकार को पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने के लिये मजबूर कर देता है। क्या गोडसे यह मानता था कि गांधी जो अपने जिद से किसी को झुका देता है और बंटवारे के लिये भी दोषी है इसका रहना आजाद भारत के लिये खतरनाक है। 

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जिन्ना थे असल बंटवारे के जिम्मेदार

अगर गोडसे ने इस सोच से ही गांधी की हत्या कर दी कि यह व्यक्ति जिद्दी है और बंटवारे के लिये भी उतने ही दोषी है जितना जिन्ना है तो आखिर क्यों नहीं उसने पहली गोली जिन्ना को मारी, यह भी सवाल उठना चाहिये। जिन्ना तो असल विलन था बंटवारे का जिसने भारत के 2 टुकड़े कर दिये। गांधी तो फिर भी यह कहते थे कि बंटवारे के लिए उनकी लाश से होकर गुजरना होगा। लेकिन उन्होंने बंटवारे का समर्थन कभी नहीं किया। उन्हें लगा होगा कि अगर पाकिस्तान नहीं बना तो देश में सांप्रदायिक हिंसा भड़क सकती है। हालांकि यह सत्य है कि महात्मा गांधी का जीवन एक दर्शन से कम नहीं हैं, एक ऐसा व्यक्ति जो दक्षिण अफ्रीका से भारत आकर अंग्रेजों से लोहा लेने से पहले अपने वेशभूषा पश्चिमी से बदलकर ठेठ देसी अंदाज में बदल लेता है।

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फिर जो उन्होंने जो किया वो इतिहास के पन्नें में स्वर्णाक्षरों में शामिल हो जाता है। एक ऐसे महान व्यक्ति की उस गोडसे ने हत्या कर दी जो अपने- आप को देशभक्त और राष्ट्रभक्त कहता है और अपने- आप को राष्ट्रपिता की हत्या करने के लिये मजबूर बताता है। लेकिन कभी-भी एक देशभक्त को सही ठहराया नहीं जा सकता है कि वो किसी देश के सबसे लोकप्रिय नेता और आजादी को दिलानें में अग्रणनीय भूमिका निभाई हो उसे इसलिये मार दिया जाए कि उसने महज पाकिस्तान के लिये कुछ नैतिक समर्थन दिया हो। गोडसे का यह तर्क भी सही नहीं है कि वह बंटवारे की त्रासदी को झेल रहे हिंदू परिवारों की लाशों को देखकर भावुक हो गया और गांधी को मारने के लिये विवश हो गया। कारण हिंदू के अलावा मुस्लिम और सिख यहां तक कि सभी धर्मों के लोगों ने बंटवारे के दर्द को उतना ही झेला जितना एक विशेष धर्म के लोगों ने।      
 

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