Wednesday, Jan 19, 2022
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जय शाह मानहानि मामले में मीडिया पर जमकर बरसा सुप्रीम कोर्ट

  • Updated on 3/15/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह द्वारा न्यूज पोर्टल द वायर और उसके पत्रकारों के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि की शिकायत पर 12 अप्रैल तक कार्यवाही नहीं करने के लिए गुजरात की एक निचली अदालत को निर्देश दिया। इसके साथ ही न्यायालय ने मीडिया, विशेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया, को किसी भी व्यक्ति के खिलाफ जो मन में आया उसे पेश करने पर झिड़की भी लगाई। 

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बेहद खिन्न नजर आ रहे चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने मीडिया, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक चैनलों और न्यूज पोर्टल को फटकार लगाई और सवाल किया, 'क्या कोई सरकारी/सार्वजनिक दायरे में उपलब्ध किसी चीज को दुबारा पेश कर सकता है और उसमें कुछ अपमानजनक जोड़ सकता है। क्या इस तरह के संकेत बचाव के लिए हैं या स्वतंत्रता के लिए।'

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जस्टिस मिश्रा ने कहा, 'क्या वे जो मन में आएगा वह लिख सकते हैं? जो वे लिखते हैं, वह कभी कभी कोर्ट की गंभीर अवमानना की तरह होता है। क्या ऐसी होती पत्रकारिता है? इलेक्ट्रानिक मीडिया को ज्यादा जिम्मेदार होना चाहिए। मैं चैनलों के नाम नहीं लेना, लेकिन कुछ लोग सोचते हैं कि वे पोप के सिंहासन पर बैठे हैं और फैसले सुना रहे हैं। उन्हें और ज्यादा जिम्मेदार होना चाहिए और उन्हें इसका अहसास होना चाहिए।'

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प्रधान न्यायाधीश के साथ जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ भी इस खंडपीठ में शामिल थे। पीठ ने शाह और उन अन्य सह याचिकाकर्ता को नोटिस जारी किए, जिन्होंने न्यूज पोर्टल और लेखिका रोहिणी सिंह सहित उसके पत्रकारों के खिलाफ मानहानि की शिकायत दायर की थी। पीठ ने उन्हें 2 हफ्ते के अंदर जवाब देने का निर्देश दिया है।   

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पीठ ने कहा, 'इस बीच, शिकायतकर्ता (जय शाह) के वकील मजिस्ट्रेट को शीर्ष कोर्ट में लंबित मामलों के बारे में अवगत करायेंगे। हम जानते हैं कि मजिस्ट्रेट इसका संज्ञान लेंगे और 12 अप्रैल तक इस मामले में आगे कार्यवाही नहीं करेंगे।' इससे पहले, सुनवाई शुरू होते ही पोर्टल और पत्रकारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि इस लेख में रिकार्ड से हासिल विस्तृत विवरण है, जो सार्वजनिक दायरे में है। 

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उन्होंने कहा कि इसी तरह से पत्रकारिता का गला घोंटा जा रहा है। एक पत्रकार को यह पूछने का अधिकार नहीं है कि किस तरह से फायदा 80 करोड़ रुपये तक हो गया। साथ ही उन्होंने कहा कि पत्रकारिता किस तरह पनपेगी। पीठ ने कहा कि इसमें दो मुद्दे हैं- क्या लेख में अतिरिक्त जोड़े गए तथ्य मानहानिकारक हैं या नहीं और क्या उन संपादकों को, जो लेख का हिस्सा नहीं हैं, पक्षकार नहीं बनाया जाना चाहिए। 

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दूसरी ओर, शाह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने सिब्बल का प्रतिवाद करते हुए कहा कि वे कहते हैं कि तथ्य सार्वजनिक दायरे में हैं, लेकिन क्या इस सूचना को ‘चुनकर’  और उसमे कुछ और जोड़कर इस्तेमाल करने की इजाजत दी जा सकती है। यह ‘अपमानजनक’  रिपोर्टिंग हैं। 
 

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