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जलियांवाला बाग: एक घंटा 100 वर्षों पर भारी

  • Updated on 4/13/2019

कहते हैं कि हर कहानी के दो पहलू होते हैं और उनमें से एक ही सच हो सकता है। ऐसा ही कुछ जलियांवाला बाग जनसंहार के साथ भी है। 100 वर्ष पहले हुई इस भयावह त्रासदी में निदर्यता से मारे गए लोग13 अप्रैल को याद किए जाएंगे तो इस कहानी के ब्रिटिश पक्ष पर एक नजर डालना इसलिए जरूरी है ताकि भारतीयों की बहादुरी, अवज्ञा तथा डायर जैसे दुष्ट अंग्रेज जनरलों के हाथों उनके द्वारा सहे गए अत्याचारों को हम अच्छी तरह समझ सकें। 

माफी
यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में इतिहास के प्रोफैसर किम वैगनर ने हाल ही में सत्य को स्वीकार करने तथा सुलह करने की बात की है। उनकी दलील है कि 1997 में महारानी एलिजाबैथ तथा 2013 में डेविड कैमरून स्मारक पर गए थे परंतु दोनों ही मौकों पर माफी मांगने से परहेज किया गया।

हालांकि, दिसम्बर 2017 में लंदन के मेयर सादिक खान ने अमृतसर यात्रा के दौरान ब्रिटिश सरकार से आग्रह किया था कि अमृतसर तथा भारत के लोगों से इस जनसंहार के लिए आधिकारिक माफी मांगी जाए ताकि इसे भुला कर आगे बढ़ा जा सके। 

भारतीयों के लिए माफी सम्भवत
निजी रूप से अर्थपूर्ण होती परंतु यह कभी मांगी नहीं गई क्योंकि ब्रिटिश सरकार को लगता है कि इसका प्रतिकूल प्रभाव होगा और यह पुराने जख्मों को भरने की बजाय नए जख्म देने का काम करेगी। कहानी के ब्रिटिश पहलू पर आने से पहले जान लेते हैं कि ये पुराने जख्म क्या हैं? इसे भारतीय  पहलू से समझना उचित होगा।

बहादुर सिख अग्रेजों के लिए न केवल अफगानिस्तान तथा प्रथम विश्व युद्ध में लड़े, वे ब्रिटिश सेना की रीढ़ थे। बदले में ब्रिटिश अफसरों ने 1857, 1864 और फिर गदर आंदोलन के दौरान बार-बार उन्हें निदर्यता से कुचलने का कामकिया।

रॉलट एक्ट
अप्रैल, 1919 में गांधी जी ने रॉलट एक्ट का विरोध करने का फैसला किया, 6 अप्रैल को जब विरोध शुरू हुआ तब बॉम्बे के एक उर्दूू दैनिक ने लिखा, ‘वहां कोई हिन्दू, मुस्लिम, पारसी, खोजा, जैन या सिख नहीं था, उन सभी का एक ही धर्म था- आत्मसम्मान का धर्म।’ 

चाहे बॉम्बे हो, पटना, दिल्ली, ढाका, कराची, अमृतसर, मदरै, तंजौर - हर कोई गांधी जी की आवाज पर उठ खड़ा हुआ था और 8 अप्रैल को गांधी जी दिल्ली की ट्रेन पर सवार हुए जहां से वह पंजाब जाना चाहते थे। 9 अप्रैल को राम नवमी उत्सव में न केवल हिंदू बल्कि सिख तथा मसलमान भी शामिल हुए।

9 अप्रैल को दो प्रमुख स्थानीय नेताओं सत्यपाल तथा डा. सैफुद्दीन किचलु के निर्वासन के आदेश जारी कर दिए गए, इस बीच गांधी जी की गिरफ्तारी की खबर आई तो 10 अप्रैल को अमृतसर में सड़कों पर बड़ी संख्या में क्रोधित लोगों की भीड़ जमा हो गई।

ब्रिटिश बैंकों को आग के हवाले कर दिया गया और तीन बैंक मैनेजरों की हत्या कर दी गई। एक महिला मिशनरी को पीट कर मरने के लिए छोड़ दिया गया। हिंसा जारी रही जिसे काबू करने में पुलिस नाकाम रही और शहर में मार्शल लॉ लगा दिया गया। कलैक्टर ने चार्ज ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर को सौंप दिया जो गोरखा तथा पठान टुकडिय़ों के साथ वहां पहुंचाथा। 

मार्शल लॉ
पंजाब में मार्शल लॉ बेहद सख्त था, सैंसरशिप लगा दी गई, मंदिर, गुरुद्वारे, मस्जिदें बंद कर दी गईं। पानी-बिजली काट दी गई। चुने गए विद्रोहियों को सार्वजनिक दंड दिया गया और सबसे निर्दयी वह आदेश था जिसमें उस गली से गुजरने वाले सभी भारतीयों को रेंग कर जाने  को मजबूर किया गया जहां उक्त महिला मिशनरी पर हमला हुआ था। 

बैसाखी के दिन
13 अप्रैल को बैसाखी का दिन था और सुबह से ही सिख पंथ की स्थापना तथा नववर्ष मनाने के लिए स्वर्ण मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी थी। गुरुद्वारा जाने के बाद आराम करने तथा बतियाने के लिए वे निकट स्थित जलियांवाला बाग चले गए जहां एक मेला भी आयोजित था जबकि कुछ राजनीतिक कार्यकत्र्ता पार्क में भाषण दे रहे थे। 

इसी वक्त 6-7 एकड़ में फैले तथा सभी ओर से मकानों से घिरे इस सार्वजनिक स्थल पर जनरल डायर भी पहुंचा। वास्तव में कुछ मकानों की बाल्कनियां इस बाग की ओर ही थीं और बाग में प्रवेश का एक ही रास्ता था।

यहां उसका सामना 20 हजार  लोगों से हुआ। अपनी रैजीमैंटों जिनमें मुख्यत: सिख, गोरखा तथा बलूच थे (बलूचियों की अंग्रेजों से लड़ाई जारी थी इसलिए बलूच रैजीमैंट में सिख तथा राजपूत सिपाही थे) के वहां मोर्चा सम्भालने के 30 सैकेंड में ही बगैर किसी चेतावनी के उसने उन्हें सबसे अधिक भीड़ वाले हिस्से की ओर गोलियां दागने का आदेश दे दिया।

सारी 1650 गोलियां चल जाने के बाद ही फायरिंग रोकने का आदेश दियागया। सरकारी आंकड़े जहां मरने वालों की संख्या 379 बताते हैं वहीं स्वतंत्र  जांच में इनकी संख्या 1500 से 1700 के बीच बताई जाती है। इस त्रासदी का यह भारतीय पहलू है जो महीनों बाद सामने आया था क्योंकि शहर को पूरी तरह बंद कर दियागया था परंतु इसका अफसरों की निजी डायरियों तथा आधिकारिक रिकॉर्ड्स में दर्ज ब्रिटिश पहलू एकदम अलग है। 

ब्रिटिश अधिकारी की डायरियां
उस वक्त पंजाब के चीफ सैक्रेटरी जे.पी. थॉमसन की डायरी में इससे जुड़ी कुछ घटनाएं दर्ज हैं। 6 अप्रैल को उसने लिखा कि ‘किसी को नहीं पता कि रॉलट एक्ट क्या है’ तो एक पन्ने पर लिखा कि ‘शादियों तथा अंतिम यात्रा निकालने के लिए पुलिस की इजाजत जरूरी थी।’

उसने यह भी लिखा कि ‘जो भी पुलिस को सलाम नहीं करता उसे गिरफ्तार किया जा सकताथा।’  8 अप्रैल को उसने लिखा, ‘स्थिति गम्भीर है, गांधी और उनके सहयोगियों को पंजाब न आने के आदेश दिए गए हैं।’ फिर उसने ‘अमृतसर के जलने’ की बात की।

कुछ दिनों के अंतराल पर 14 अप्रैल को उसने लिखा, ‘गवर्नर हाऊस की पार्टी में अमृतसर खालसा कॉलेज के वॉटकिंग्स से मिला’ जिन्होंने कहा ‘सिपाहियों ने भागते हुए लोगों को खरगोशों की तरह मारा।’ साथ ही उसने लिखा था कि ‘इस घटना से आधिकारिक रूप से पल्ला झाड़ लेना चाहिए।’ ‘खूनी कांड,    200 से 300 बाग में मारे गए। इसका दीर्घकाल में नतीजा अच्छा निकलेगा।’ 

हालांकि, कई अफसर डायर के समर्थन में थे और उसने अपनी कार्रवाई को जायज ठहराते हुए कहा था, ‘अगर और सिपाही उपलब्ध होते तो और अधिक मौतें होतीं। जरूरत केवल भीड़ को तितर-बितर करने की नहीं थी बल्कि वहां मौजूद लोगों ही नहीं, पूरे पंजाब को एक सबक सिखाने की थी।

’ स्थिति सम्भालने के लिए डायर को 1920 में इस्तीफा देने को मजबूर किया गया। वास्तव में ब्रिटिश संसद में बहस के दौरान तत्कालीन युद्ध सचिव विंस्टन चॢचल ने इसे एक भयावह घटना बताते हुए कहा था कि ‘आधुनिक ब्रिटिश इतिहास में इसका कोई उदाहरण नहींहै।’

यह पहली बार नहीं
परंतु डायर की यह कार्रवाई ब्रिटिश इतिहास में कोई पहली बार नहीं हुई थी। उपनिवेशी सरकार के अफसरों के दिमाग में यह बात गहराई तक बैठी हुई थी कि मूल निवासी केवल हिंसा की भाषा समझतेहैं। 

1857 में पंजाब के 58 विद्रोहियों को तोप से उड़ाया गया था। उसी वर्ष जुलाई में जबरदस्ती रंगरूट बनाए गए 200 सिखों ने जब सेना से भागने की कोशिश की तो अमृतसर के कमिश्नर फ्रैड्रिक कूपर ने उन्हें ठोकरें मार कर कुएं में ङ्क्षफकवाया था। 1919 में दिल्ली में दमन के लिए ब्रिगेडियर जनरल ड्रेक ब्रोकमैन ने भी ऐसा ही किया था।

भीड़ पर फायरिंग पर उसने कहा था, ‘वह दिल्ली शहर के घटिया लोगों की भीड़ थी। मेरा मानना है कि अगर उन पर और फायरिंग होती तो उनका बड़ा भला हो जाता।’

तो डायर उसी नीति का पालन कर रहा था जो अंग्रेजों ने भारत के लिए बनाई थी परंतु जालियांवाला बाग ने 1922 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए जनता को एकजुट करने का काम किया जो अंहिसक संघर्ष की राह पर चली। इसी घटना ने चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह,  राजगुरु व सुखदेव जैसों को भी स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने के लिए भी प्ररित किया था।

वे 13 दिन...
30 मार्च 1919 :
महात्मा गांधी के नेतृत्व में सत्याग्रह असहयोग आंदोलन की नींव 24 फरवरी 1919 को रखी गई। 2 मार्च को आंदोलन का मैनीफैस्टो पेश किया गया जो उन दिनों अखबारों में भी प्रकाशित हुआ। इसी क्रम में 30 मार्च को देशव्यापी हड़ताल का आमंत्रण दिया गया।

इस दौरान सभी काम, हर दुकान, कार्यालय बंद करने को कहा गया। परन्तु यह हड़ताल 6 अप्रैल को बदल दी गई। 6 अप्रैल तिथि बदलने का समाचार सभी के पास न पहुंच सका तथा बहुत-सी जगहों पर हड़ताल 30 मार्च को हुई। अमृतसर में उस वक्त 25 से 30 हजार लोग एकत्र हुए।

2 अप्रैल 1919 : इस दिन पिछले दो दिनों से भी ज्यादा इक_ हुआ। जलियांवाले बाग में इस इक_ को स्वामी सत्या देव ने संबोधित किया तथा असहयोग सत्याग्रह आंदोलन बारे रोलेट कानून के विरोध में लोगों के समक्ष अपनी बात विस्तार से रखी।  

6 अप्रैल 1919 : इसको लेकर डी.सी. माइल्ज इरविंग ने 5 अप्रैल को बैठक बुलाई ताकि अमृतसर में किसी तरह भी हड़ताल को समर्थन न मिले। इस हड़ताल की अगुवाई स्थानीय नेता डा. सैफुद्दीन किचलू तथा डा. सत्यापाल ने की। 6 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल को भारी समर्थन मिला था। 

जब डायर मौत के किनारे पर था तब अमृतसर के नरसंहार के बारे में उसने कहा था कि बहुत से लोग जो अमृतसर की हालत जानते थे उनका विचार था कि मैंने सही किया, जबकि बहुत से लोगों का कहना था कि मैंने गलत किया। अब तो मैं सिर्फ मर जाना चाहता हूं ताकि मेरे जन्मदाता से पूछ सकूं कि जो भी मैंने किया वह सही था या गलत। ---आभा चोपड़ा

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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