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‘फायदेमंद’ रहेगी जम्मू- कश्मीर ‘भूमि सुधार अधिसूचना’

  • Updated on 11/4/2020

केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर में भूमि सुधार को लेकर 26 अक्तूबर को जारी की गई अधिसूचना पर श्रीनगर से लेकर नई दिल्ली तक काफी हाय-तौबा मची है। दरअसल, इस अधिसूचना के केवल एक प्रावधान पर ही चर्चा हो रही है, जबकि इसके माध्यम से राजस्व मामलों में पारदर्शिता लाने, किसानों के हित सुरक्षित करने, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने, पेचदगियों को समाप्त करने संबंधी प्रावधानों पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। हालांकि, इन प्रावधानों से केंद्रशासित प्रदेश में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा मिलने, निवेश के लिए वातावरण तैयार होने, औद्योगिक  क्षेत्र में विकास और रोजगार सृजन के नए अवसर पैदा होने की प्रबल संभावना है।

नि:संदेह, वर्ष 1927 में महाराजा हरि सिंह द्वारा लागू किए गए स्टेट सब्जैक्ट अधिनियम के 93 वर्ष बाद जिस प्रावधान के तहत भारत के किसी भी राज्य के नागरिक को जम्मू- कश्मीर में मकान अथवा जमीन खरीदने का अधिकार मिला, वह वर्तमान अधिसूचना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रावधान है और इस पर चर्चा होना स्वाभाविक भी है, लेकिन यह सब अचानक नहीं हुआ है।

5 अगस्त को राज्यसभा और 6 अगस्त 2019 को लोकसभा ने जब जम्मू- कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के विवादित प्रावधानों और अनुच्छेद 35-ए को निरस्त करने संबंधी प्रस्ताव पारित किया था, इस प्रावधान का आना तो तभी निश्चित हो गया था, अन्यथा 370 और 35-ए को हटाने का मकसद अधूरा ही रहता।
केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी द्वारा यह बात पहले ही स्पष्ट कर दी गई थी कि अनुच्छेद 370 और 35-ए हटाने के पीछे उसका मकसद देश के हर नागरिक को जम्मू- कश्मीर में जमीन खरीदने एवं नौकरी करने का अधिकार दिलाना है। ऐसे में, इस प्रावधान के माध्यम से केंद्र सरकार ने अपने पूर्व घोषित वायदे को पूरा करने को ही मूर्त रूप दिया है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जम्मू- कश्मीर की जो राजनीतिक पार्टियां अथवा संगठन अनुच्छेद 370 एवं 35-ए हटाने के पक्षधर रहे थे, वे भी इस अधिसूचना का विरोध कर रहे हैं।

विपक्षी दलों का यह आरोप है कि केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के लोगों के भूमि एवं रोजगार अधिकारों को सुरक्षित करने वाले पुराने प्रावधानों को निरस्त करके उनके अधिकारों पर डाका डाला है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि जमीन बेचना अथवा न बेचना किसी भी व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार है। 

कश्मीर की एक युवती सईद ताहिरा गिलानी के शब्दों में कहें तो ‘यदि आप जमीन बेचना चाहते हैं तो आप बेच सकते हैं और यदि नहीं बेचना चाहते तो कोई भी आपको इसके लिए विवश नहीं कर सकता। कोई भी कानून आपसे यह अधिकार नहीं छीन सकता। दरअसल, यह हाय-तौबा 5 अगस्त 2019 को अपना ब्रैड, बटर, टॉफी और दूध छिनने से हताश राजनीतिक परिवारों की कुंठा का परिणाम है।’

जहां तक जमीन खरीदने के प्रावधान से जम्मू- कश्मीर के मूल निवासियों को नफा- नुक्सान होने का सवाल है तो इससे जहां बाहर के लोगों के लिए केंद्र शासित प्रदेश के दरवाजे खुले हैं, वहीं निवेश को प्रोत्साहन मिलने, पर्यटन को बढ़ावा मिलने, कृषि तकनीक से उत्पादन बढऩे एवं औद्योगिक गतिविधियों में वृद्धि से  केंद्र शासित प्रदेश में विकास होने से रोजगार के नए अवसरों के सृजन का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है।

इस अधिसूचना के तहत केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर में राजस्व नियमों में सुधार के कई अन्य प्रावधान भी लागू किए हैं, जिसमें किसानों के हितों की रक्षा करना भी शामिल है। जम्मू- कश्मीर में इन सुधारों का लंबे समय से इंतजार किया जा रहा था, क्योंकि पुराने कानून आधुनिक कृषि उद्योग और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए प्रमुख बाधा बने हुए थे, जबकि नए कानून केंद्र शासित प्रदेश के लोगों को सशक्त बनाएंगे।

कश्मीरी चिंतक सतीश विमल के अनुसार पुराने कानूनों में जम्मू- कश्मीर के ज्यादातर हलवाहों (किराए पर खेती करने वाले लोगों) को ‘किसान’ के रूप में मान्यता नहीं दी गई थी जिससे उन्हें बैंक ऋण,  संस्थागत इनपुट और सरकारी लाभों तक पहुंच से वंचित कर दिया गया था। अब नई अधिसूचना में इन वास्तविक किसानों के अधिकारों को संरक्षित किया गया है और ‘किसान’ की परिभाषा को भी एकदम स्पष्ट कर दिया गया है, ताकि सरकार की किसान कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सही लाभाॢथयों तक पहुंच सके।

नई अधिसूचना में विरोधाभासी प्रावधानों के चलते दुविधा उत्पन्न करने वाले ‘जम्मू-कश्मीर अन्य संक्रामक अधिनियम’, ‘जम्मू- कश्मीर वृहद् भू-सम्पदा उत्सादन अधिनियम’, ‘जम्मू-कश्मीर सामान्य भूमि (विनियमन) अधिनियम’, ‘जम्मू-कश्मीर ध्रति समेकन अधिनियम’, ‘जम्मू-कश्मीर बाढ़ मैदानी क्षेत्र (विनियमन एवं विकास) अधिनियम’, ‘जम्मू-कश्मीर भूमि सुधार योजनाएं अधिनियम’, ‘जम्मू-कश्मीर कृषि जोतों का विखंडन, निवारण अधिनियम’, ‘जम्मू-कश्मीर भूमि रूपांतरण एवं बागान हस्तांतरण पर प्रतिबंध अधिनियम’, ‘जम्मू-कश्मीर रायट ऑफ प्रायर परचेज एक्ट’, ‘जम्मू- कश्मीर किराएदारी (बेदखली संबंधी कार्रवाई पर रोक) अधिनियम’, ‘जम्मू- कश्मीर भूमि उपयोग अधिनियम’ और ‘जम्मू- कश्मीर अंडरग्राऊंड पब्लिक यूटीलिटीज एक्ट जैसे दर्जन भर पुराने कानूनों और कई कानूनों की करीब दो दर्जन अनावश्यक धाराओं को समाप्त कर दिया गया है। इस प्रकार, जम्मू-कश्मीर में भूमि सुधार को लेकर केंद्र सरकार द्वारा जारी नई अधिसूचना आम लोगों के लिए नुक्सानदायक कम और फायदेमंद ज्यादा नजर आती है। 

बलराम सैनी- 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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