Sunday, Dec 15, 2019
jharkhand assembly election 2019 22 deaths due to hunger

झारखंड चुनाव: क्या उठेगा गरीब की थाली में 'भात' का मुद्दा? 5 साल में भूख से 22 मौतें

  • Updated on 11/12/2019

नई दिल्ली/ कामिनी बिष्ट। विकास की आस लिए बिहार (Bihar) के दक्षिणी हिस्से से अलग हुआ झारखंड (Jharkhand) आज भी भुखमरी की जानलेना बीमारी से ग्रसित है।  लोहा, कोयला, माइका, बाक्साइट, फायर-क्ले, ग्रेफाइट जैसे खनिज पदार्थों की यहां प्रचुरता है। जमशेदपुर, रांची, बोकारो और धनबाद जैसे उद्योगों के लिए प्रसिद्ध स्थान भी हैं। फिर भी बीते 5 सालों में यहां से भूख 22 लोगों की मौत होने का दावा किया जाता है। यहां 30 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनावों के चलते हो सकता है कि गरीबी और भुखमरी से पस्त यहां की जनता के मन में उम्मीद की किरण जागी हो। इनके लिए न सही तो अपनी कुर्सी के लिए ही सही इस बार तो गरीब की थाली में भात का मुद्दा राजनीतिक पार्टियां उठाएंगी ही। 

लोकसभा चुनाव (Loksabha Election 2019) के समय ही लालू यादव की पार्टी राजद ने झारखंड में भुखमरी के खिलाफ मुहिम के लिए अलग से घोषणा पत्र जारी किया था। इसमें भूख के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए वादे किए गए थे। इतना ही नहीं अन्य राजनीतिक पार्टियों ने भी अपने अपने मेनिफेस्टो में कहीं न कहीं इस मुद्दे को स्थान दिया था। इससे एक बात तो स्पष्ट है कि राज्य में भुखमरी की समस्या से कोई पार्टी और सरकार अनभिज्ञ नहीं है। 

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भूख से 22 मौतों का दावा और सरकार का इनकार
फिर भी झारखंड प्रशासित रघुवरदास सरकार ये मानने को तैयार नहीं है कि राज्य में इस प्रकार की कोई भी समस्या है। हालांकि चर्चित सोशल एक्टिविस्ट के नेतृत्व में बनी फैक्ट फाइंडिंग टीम का दावा है कि झारखंड में पिछले 5 सालों में भूख के कारण कम से कम 22 मौतें हुई हैं। 

झारखंड के सिमडेगा ज़िले के कारीमाटी गांव में 11 साल की संतोषी की मौत झारखंड भूख से हुई थी। जिसकी चर्चा विधानसभा से लेकर संसद तक हुई। सरकार ने इस पर संज्ञान लेते हुए जांच भी की और जांच में पाया गया कि संतोषी की मौत भूख से नहीं बीमारी से हुई थी। इस प्रकार झारखंड में सरकार द्वारा भूख की समस्या को समाप्त कर दिया गया। 

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भात मांगने वावी संतोषी को पिलाई थी नमक वाली चाय
इस मामले में संतोषी की मां कोयली देवी का कहना है कि उसने कई दिनों से खाना नहीं खाया था। संतोषी को भात खाने का मन था और घर में चावल नहीं था। घर में केवल थोड़ी सी चायपत्ती और नमक था। कोयली देवी ने पानी में चायपत्ती और नमक मिलाकर संतोषी को दे दिया। वो चाय नहीं पी सकी और भूख से उसकी मौत हो गई। ये पहला किस्सा नहीं था, इससे पहले हजारीबाग जिले के इंद्रदेव महली की मौत भी भूख से हुई थी। ये सीएम रघुवर दास के कार्यकाल में भूख से होने वाली पहली मौत थी। यदि सरकार तभी से इस मुद्दे पर काम करती तो आगे हुई 21 मौतें शायद नहीं होती। 

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उठ सकता है चुनावों में ये मुद्दा
तेजी से विकास कर रहे भारत में भूख से मौत हो जाना शर्मनाक है। किसी भी राजनीतिक मुद्दे से क्या कम महत्व रखता है राष्ट्रपिता बापू के देश में भूख से किसी का मर जाना। यदि रखता तो शायद भूख से मौत होने के बाद भी सरकार जिम्मेदारी लेने से इनकार नहीं करती या इसको नकारने के स्थान पर इससे लड़ने का प्रयास तो किया जाता। 30 नवंबर से झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं, सत्ता तो सभी के लिए अहम और इसलिए हो सकता है कि इस विधानसभा चुनाव में भूख से मौत का मुद्दा जोर शोर से उठाया जाए और गरीब की थाली में भात आए।  

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