करतारपुर साहिब गलियारा: राजनीति से बचा जाना चाहिए था

  • Updated on 11/30/2018

भारत  सरकार द्वारा प्रकट की गई पवित्र गुरुद्वारा करतारपुर साहिब तक मार्ग उपलब्ध करवाने की इच्छा तथा पाकिस्तान सरकार द्वारा अपने क्षेत्र में 4 किलोमीटर भीतर तक मार्ग उपलब्ध करवाने का प्रस्ताव दोनों पड़ोसियों के बीच रिश्तों में विश्वास बहाली के लिए एक उल्लेखनीय कदम है।

ऐसा दिखाई देता है कि दोनों देशों द्वारा कुछ ही घंटों के भीतर अपने-अपने निर्णयों की घोषणा करने से पहले पर्दे के पीछे की कूटनीति ने काफी जमीनी कार्य किया। हालांकि यह सिखों की बहुत लम्बे समय से चली आ रही मांग थी लेकिन गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व की पूर्व संध्या पर इस कदम को शुरू करने का श्रेय पाकिस्तान को जाता है। भारतीय सरकार ने भी अतीत में यह मुद्दा उठाया था लेकिन कभी भी इसके लिए दबाव नहीं बनाया था।

श्रेय लेने के लिए होड़ 
हालांकि दुर्भाग्य से इस मुद्दे को लेकर की गई राजनीति ने इस खुशी भरे अवसर को बिगाड़ दिया। इस कदम का श्रेय लेने के लिए होड़ अथवा अपने राजनीतिक विरोधियों की आलोचना करने ने राजनीतिज्ञों का असली चेहरा सामने ला दिया और यदि वे यह समझते हैं कि सामान्य नागरिक उनके खेल को नहीं देखते तो यह उनकी गलती होगी।

पहले क्रिकेटर से राजनेता बने और अब पंजाब के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू को पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री एवं उनके निजी मित्र इमरान खान द्वारा अपने शपथ ग्रहण समारोह पर बुलाए जाने को लेकर काफी हो-हल्ला मचा था। फिर सिद्धू तथा पाकिस्तानी सेना प्रमुख द्वारा अचानक डाली गई झप्पी, जब सेना प्रमुख ने सिद्धू को बताया कि गुरुद्वारा करतारपुर साहिब के लिए गलियारा उपलब्ध करवाने की योजना है, को एक बड़ा मुद्दा बना लिया गया था।

क्या होता, जब जनरल बाजवा उनके साथ झप्पी डालने की कोशिश कर रहे थे तो सिद्धू सीधे अकड़ कर खड़े रहते या अपनी पीठ फेर लेते? उनके प्रयास पर प्रतिक्रिया देकर सिद्धू ने किसी भी तरह से पाक सेना अध्यक्ष अथवा पाकिस्तान को उनके द्वारा किए गए सभी अपराधों से दोषमुक्त नहीं किया।

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह, जिनका सिद्धू के साथ बैर सर्वविदित है, ने भी सार्वजनिक तौर पर झप्पी का विरोध किया था, हालांकि उन्होंने सिद्धू को पाकिस्तान जाने की इजाजत दी थी।\

अकाली चाहते थे श्रेय लेना
अकाली, जो सिद्धू को बर्दाश्त नहीं कर सकते, बुरी तरह से उनके पीछे पड़ गए और यहां तक कि कुछ ने तो सिद्धू को राष्ट्रविरोधी तक कह दिया। वे सिद्धू को किसी भी तरह से श्रेय नहीं लेना दे सकते थे और इसके साथ ही वे खुद श्रेय लेना चाहते थे क्योंकि वे सिख पंथक समुदाय का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं।

स्पष्ट है कि उन्होंने केन्द्र में बैठे अपने गठबंधन सांझेदार पर यह मुद्दा अपने हाथ में लेने के लिए दबाव बनाया और एक ही समय पर इस बाबत घोषणा करने के लिए पर्दे के पीछे कूटनीतिक चैनल्स को सक्रिय कर दिया।

हालांकि करतारपुर साहिब गलियारा परियोजना के उद्घाटन अवसर पर एक बार फिर राजनीति खेली गई जिसका आयोजन सांझे तौर पर केन्द्र तथा पंजाब सरकार ने किया था।\

समारोह में केन्द्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल द्वारा 1984 में सिखों पर हमलों का मामला उठाने का पंजाब के एक मंत्री ने विरोध किया जिसका परिणाम एक गंदे झगड़े के रूप में निकला। कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने भी पाकिस्तान सरकार की ओर से सीमा के उस ओर आयोजित होने वाले समारोह के लिए मिले निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया था मगर सिद्धू को इसमें शामिल होने की इजाजत दे दी। इसी तरह विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने निमंत्रण को ठुकरा दिया था लेकिन अपने दो सिख सहयोगियों हरसिमरत कौर बादल तथा हरदीप सिंह पुरी को इसमें भाग लेने के लिए भेजा।

जनता सब समझती है
सार्वजनिक तौर पर इस तरह के राजनीतिक वैर-विरोध तथा श्रेय लेने के प्रयासों से बचा जाना चाहिए था। यदि राजनीतिज्ञ ये सोचते हैं कि आम जनता उनके इरादों को नहीं समझ पाती तो वे पूरी तरह से गलत हैं। भारतीय मतदाताओं ने समय-समय पर साबित किया है कि वे परिपक्व हैं और राजनीति को समझते हैं।

ये वहीं हैं जिन्होंने एक समय कांग्रेस को 400 से अधिक लोकसभा सीटें दीं तथा एक अन्य चुनाव में पार्टी को 44 सीटों तक नीचे ले आए। इसी जनता ने एक समय भाजपा को केवल दो सीटें दी थीं लेकिन एक अन्य चुनाव में इसे बहुमत दिलाया। पंजाब तथा अन्य राज्यों में भी मतदाताओं का निर्णय समय-समय पर लोगों की सोच को प्रतिङ्क्षबबित करता है।

जहां करतारपुर साहिब गलियारा के खुलने का श्रेय लेने के लिए ऊंचे दाव लगे हैं, जिसके लिए पंजाबियों, विशेषकर सिखों के प्रेम को समझा जा सकता है, वहीं यह परिपक्वता का संकेत होता यदि उस समय राजनीति से बचा जा सकता जब एक अन्य देश इसमें शामिल था।                                                                                                     ---विपिन पब्बी

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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