Wednesday, Mar 20, 2019

कश्मीर के बाद अब जम्मू में तनाव पैदा करने की साजिश

  • Updated on 3/11/2019

पिछले तीन दशक से आतंकवाद का दंश सहने के बाद जम्मू-कश्मीर का कश्मीर संभाग बेशक तनावग्रस्त रहा हो लेकिन जम्मू संभाग अपेक्षाकृत बेहद शांत क्षेत्र रहा है। जम्मू के 10 जिलों में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समेत तमाम धर्मों और जातियों के लोग बहुत सद्भावनापूर्वक रहते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जम्मू संभाग में साम्प्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ कर तनाव पैदा करने की साजिश हो रही है। 

14 फरवरी को हुए पुलवामा फिदायीन हमले के बाद जम्मू में हुईं कुछ घटनाओं को ही एक सूत्र में पिरो कर देखा जाए तो क्षेत्र में शांति भंग करके तनाव पैदा करने, साम्प्रदायिक सद्भाव को बिगाडऩे और विकास की गति को बाधित करने का बड़ा प्रयास हुआ है।

भूस्खलन से जम्मू-श्रीनगर नैशनल हाईवे बाधित होने पर जम्मू में फंसे कश्मीरियों द्वारा राष्ट्रविरोधी नारेबाजी किए जाने पर कालेज छात्रों से उनकी झड़प होना, फिर पुलिस-प्रशासन का भी जम्मू के कालेज छात्रों पर ही गुस्सा निकालना, पुलवामा हमले की प्रतिक्रियास्वरूप जम्मू में हिंसा होना, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारों से तनाव की आग में घी डालना, इसके बाद शहर में कफ्र्यू लगाया जाना एवं मोबाइल इंटरनैट को बाधित करना, फिर अपनी नाकामी छिपाने के लिए प्रशासन द्वारा हालात सामान्य हो जाने के बावजूद कफ्र्यू को जारी रखना, जम्मू बस स्टैंड पर हुआ हमला, जम्मू एयरपोर्ट के पास संदिग्ध बमनुमा बैटरी का मिलना आदि क्षेत्र के शांतिपूर्ण वातावरण को खराब करने की साजिश की ओर ही इशारा करते हैं। 

तनाव की आयु कभी लम्बी नहीं रही
ऐसा नहीं है कि जम्मू में पहले कभी तनाव पैदा नहीं हुआ लेकिन इस तनाव की आयु कभी ज्यादा लम्बी नहीं रही। आजादी के बाद प्रजा परिषद एवं भारतीय जनसंघ द्वारा अलगाववाद के खिलाफ छेड़े गए जनांदोलन को दबाने के लिए भी बल का प्रयोग हुआ था। इसके बाद पड़ोसी क्षेत्र होने के कारण पंजाब के आतंकवाद की आग की कुछ लपटें जम्मू तक भी पहुंचीं लेकिन जल्द ही जम्मू का माहौल सामान्य हो गया। 

फिर 1989 में जब कश्मीर घाटी में आतंकवाद का दौर शुरू हुआ तो जम्मू संभाग के पुंछ, राजौरी, डोडा, किश्तवाड़, रामबन एवं रियासी आदि जिले भी इसकी चपेट में आए लेकिन समय के साथ इन तमाम जिलों में आतंकवाद एवं अलगाववाद की जड़ें खोखली होती चली गईं। सैयद अली शाह गिलानी, शब्बीर शाह, हाशिम कुरैशी और यासीन मलिक सरीखे कई शीर्ष अलगाववादी नेताओं ने जम्मू क्षेत्र में अपनी जड़ें फैलाने की कोशिश की लेकिन जम्मू वासियों के उग्र विरोध के चलते उन्हें बैरंग लौटना पड़ा।  

आतंकी हमले
इस दौरान आतंकवादियों ने जम्मू के विभिन्न भागों में कई हमले करके माहौल खराब करने की कोशिश की लेकिन उनका मुख्य निशाना सेना, अद्र्धसैनिक बल और पुलिस ही रहे। इस कड़ी में 17 नवम्बर 2001 को रामबन में हुए एक आतंकी हमले में 10 जवान शहीद  और 4 आतंकवादी ढेर हुए थे।

14 मई 2002 को 3 आतंकियों ने जम्मू शहर के बाहरी क्षेत्र कालूचक्क में सैन्य शिविर पर हमला करके जवानों के 36 परिजनों को मार डाला, मुठभेड़ में तीन आतंकी भी मारे गए। 

28 जून 2003 को जम्मू शहर के बाहरी क्षेत्र सुंजवां में सैन्य शिविर पर हमला करके 12 जवानों को शहीद कर दिया गया, मुठभेड़ में 2 आतंकवादी भी ढेर हुए। 22 जुलाई को अखनूर में हुए आतंकी हमले में ब्रिगेडियर समेत 8 सैनिक शहीद हुए। फिर 29 नवम्बर 2016 को नगरोटा सैन्य शिविर पर हमला करके 7 जवानों को शहीद कर दिया गया, मुठभेड़ में 3 आतंकी भी मारे गए। इसके अलावा आतंकवादियों ने जम्मू संभाग के साम्बा, हीरानगर, राजबाग में भी सैन्य शिविरों और पुलिस थानों को निशाना बनाया। 

जम्मू संभाग के पुंछ एवं राजौरी जिलों से सटी नियंत्रण रेखा और जम्मू, कठुआ एवं साम्बा जिलों से सटी भारत-पाक अंतर्राष्ट्रीय सीमा को आतंकी पाकिस्तान से भारत में घुसपैठ के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं। हाल ही में घुसपैठ करके आए ऐसे ही 4 आतंकवादियों को सुंदरबनी, 3 आतंकवादियों को झज्जर कोटली, 1 आतंकवादी को थन्ना मंडी और कुछ को डोडा, किश्तवाड़ एवं रामबन जिलों में हुई मुठभेड़ों में मार गिराया गया। ऊधमपुर के कुद में  केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के काफिले पर हमला करने वाले आतंकी को जिंदा भी पकड़ा गया था।

2008 में श्री अमरनाथ भूमि विवाद को लेकर छिड़े जनांदोलन में 62 दिन तक तनाव के कारण जम्मू को काफी नुक्सान झेलना पड़ा। फिर कभी किश्तवाड़ में हुए साम्प्रदायिक तनाव के कारण जम्मू में भी कफ्र्यू लगाना पड़ा तो कभी राजौरी में धार्मिक झांकी पर पत्थरबाजी के कारण तनाव की स्थिति में कफ्र्यू लगाना पड़ा लेकिन साम्प्रदायिक तनाव का यह दौर लम्बा नहीं चल पाया। 

जम्मू का मुस्लिम समुदाय शुरू से ही देशभक्त रहा है। विशेषकर गुज्जर-बकरवाल समुदाय ने तो भारतीय सेना के कंधे से कंधा मिलाकर काफी काम किया है लेकिन कश्मीर में फैली कट्टरवादी वहाबी विचारधारा का जहर पिछले कुछ समय से जम्मू संभाग में भी फैलाने का प्रयास किया जा रहा है, जिसका असर दिखने भी लगा है। कठुआ जिले के रसाना प्रकरण के बाद साम्प्रदायिक बिखराव का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह रुकने का नाम नहीं ले रहा है।   

सरकार से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं
कश्मीर में आतंकवाद के कारण पिछले तीन दशकों में बहुत से मुस्लिम परिवारों ने जम्मू का रुख किया और अवैध कब्जे करके भी रहना शुरू कर दिया। गुलाम नबी आजाद के नेतृत्व वाली कांग्रेस-नैशनल कांफ्रैंस सरकार ने रोशनी योजना के तहत इन अवैध कब्जों को नियमित करना शुरू कर दिया।

फिर महबूबा सरकार ने भेदभावपूर्ण आदिवासी नीति लागू करके न केवल आदिवासी, खानाबदोश समुदाय के अवैध कब्जों को वैध करने का प्रयास किया, बल्कि जम्मू संभाग में हिन्दू-मुस्लिम समुदाय में बनी खाई को और चौड़ा भी कर दिया। इसकी प्रतिक्रियास्वरूप जम्मू में बिगड़ रहे जनसांख्यिकीय अनुपात का मुद्दा उठा और पहले से चल रही बंगलादेशी एवं बर्मा से अवैध तौर पर भारत में घुसे रोहिंग्या सलमानों को निष्कासित करने की मांग ने जोर पकड़ा लेकिन इन मामलों में सरकार से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली। 

जम्मू में बन रही परिस्थितियों को लेकर जनसामान्य में आक्रोश है। कभी जम्मू शहर तो कभी संभाग के अन्य क्षेत्रों में देशविरोधी गतिविधियों की सूचना अक्सर मिल जाती है। निस्संदेह, जम्मू संभाग में शांति एवं साम्प्रदायिक सद्भाव को बिगाडऩे की बड़ी साजिश चल रही है। ऐसे में राज्य प्रशासन एवं सुरक्षा व खुफिया एजैंसियों को समय रहते प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।                                                                                                             ---बलराम सैनी

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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