Friday, May 14, 2021
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Kejriwal is exploring possibilities in national politics face a direct competition ALBSNT

सफरनामा: राष्ट्रीय राजनीति में संभावना तलाश रहे केजरीवाल! मोदी-योगी से सीधी टक्कर

  • Updated on 12/27/2020

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर। अरविंद केजरीवाल जब दिल्ली के विधानसभा चुनाव में हेट्रिक लगा दिया तो अचानक से राष्ट्रीय राजनीति में लगातार हाशिये पर रहने को मजबूर विपक्षी पार्टियों को ऑक्सीजन मिला। हो भी क्यों न- नरेंद्र मोदी के रुप में बीजेपी को ऐसा तुरुप का पत्ता है जो पिछले दो लोकसभा चुनाव से पार्टी को अपने दम पर केंद्र की सरकार में ले आने में सफल रहे है। साल 2014 के बाद से लगातार विपक्ष सिकुड़ता जा रहा है।

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केजरीवाल ने मोदी-शाह को दी मात

ऐसे में अरविंद केजरीवाल ने जब दिल्ली में मोदी-शाह को नाक के नीचे मात दी तो विपक्षी पार्टी मुस्करा गए। इसमें कोई दो राय नहीं कि अरविंद केजरीवाल ने लगातार तीन बार दिल्ली में सीएम पद संभालकर अपना लोहा मनवा ही लिया है। अन्ना आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल ने 2011 में ही राष्ट्रीय मुद्दों पर तत्कालीन मनमोहन सरकार को घेरने की सफल कोशिश की थी। 

Arvind Kejriwal

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अन्ना आंदोलन के तपिश से निकले हैं आप मुखिया

कारण अरविंद केजरीवाल जिस मुद्दों को उठाकर 2011 में मनमोहन सरकार की चूल्हें हिला दी, वो आसान नहीं था। दरअसल राष्ट्रीय मुद्दे भ्रष्टाचार पर ही अन्ना एंड केजरीवाल टीम को देश भर से भरपूर समर्थन मिला। ऐसे में जब 2013 में मनमोहन सिंह सरकार कमजोर हो रही थी, बीजेपी भी उथल-पुथल से गुजर रही थी। खासकरके बीजेपी के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी के बीच पीएम पद को लेकर आर-पार चल रही थी, केजरीवाल एक मजबूत विकल्प के लिये ही नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से ताल ठोंक दिये।

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मोदी के खिलाफ लड़े थे वाराणसी चुनाव

लेकिन केजरीवाल ओंधे मुंह गिरे और उनकी करारी हार वाराणसी में हुई। शायद उन्हें और आप पार्टी को महसूस होने लगा कि राष्ट्रीय राजनीति में फिलहाल नरेंद्र मोदी का विकल्प बनना आसान नहीं है। इसलिये उन्होंने पूरी तरह दिल्ली पर अपनी राजनीति केंद्रित कर दी। जिसका फायदा उन्हें लगातार मिला। दिल्ली की जनता ने केजरीवाल को सर आंखों पर रखा है। 

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आप पार्टी को देशव्यापी खड़े करने होंगे संगठन

वहीं सवाल उठता है कि राजधानी में शानदार जीत हासिल करने के बाद क्या अब दिल्ली से आगे की राह देखेंगे अरविद केजरीवाल? अंदरखाने से आप पार्टी इसके लिये खुद को तैयार कर रही है। आप पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल बखूबी जानते है कि यदि नरेंद्र मोदी को चुनौती देना है तो उत्तरप्रदेश में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतना जरुरी है। लेकिन केजरीवाल दोहरी चुनौती का सामना कर रहे है। एक तरफ दिल्ली में नरेंद्र मोदी अंगद की तरह जमे हुए है तो उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ का जलवा है। और जब तक बीजेपी के इन द्वय स्टार नेता का करिश्मा कम नहीं होगा तबतक राहुल गांधी,अरविंद केजरीवाल समेत तमाम विपक्षी दलों के नेता के लिये पीएम बनना आसान नहीं है। 

AAP Workers in Ramlila Maidan

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मोदी का विकल्प बनना आसान नहीं...

वहीं अरविंद केजरीवाल के सामने आप पार्टी का देशव्यापी संगठन भी तैयार करना होगा। इसके लिये वर्षों मेहनत करने पड़ेंगे। उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में मोदी का विकल्प बनने के लिये एक तो विपक्ष में अपनी स्वीकार्यता बढ़ानी होगी। जो फिलहाल दूर की कौड़ी लगती है। दूसरा दिल्ली में सीएम पद सिसोदिया को सौंपकर देश भर में मेहनत करनी होगी। इसके लिये शायद ही अरविंद केजरीवाल तैयार हो। ऐसे में जब विपक्ष केजरीवाल का नेतृत्व स्वीकार नहीं करेंगे और खुद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता का मोह नहीं त्याग करेंगे तो पीएम पद की हसरतें पालना भी मुंगेरी लाल के हसीन सपने जैसा ही होगा।

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दिल्ली में सत्ता विरोधी लहर पर सवार थे केजरीवाल 

भले ही केजरीवाल को दिल्ली में सत्ता हासिल करने के लिये काफी मशक्कत नहीं करनी पड़ी। हालांकि छोटे से शहर दिल्ली में संगठन तैयार नहीं होने के वाबजूद लहर पर सवार केजरीवाल सत्ता हासिल तो कर लिये। लेकिन देश की राजनीति में खुद को झोंकने के साथ-साथ उन्हें मजबूत संगठन आप पार्टी का तैयार करना ही होगा। दूसरा मोदी मॉडल से वे पीएम पद के लिये छलांग नहीं लगा सकते। कारण नरेंद्र मोदी के पास बीजेपी और आरएसएस का मजबूत संगठन मिला। जिस पर सवार जब नरेंद्र मोदी हुए तो पीएम पद पर पहुंच गए। लेकिन केजरीवाल को यहीं अंतर को पाटना आसान नहीं है।

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पहले भी क्षेत्रिय क्षत्रपों ने किया करिश्मा

तीसरा पक्ष जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि राज्य में पहले भी क्षेत्रिय पार्टियों के मुखिया ने बेहतर प्रदर्शन किया और सत्ता में लगातार वापसी की है- लेकिन वे भी अभी तक पीएम वेटिंग ही है। ऐसे में अरविंद केजरीवाल के लिये राष्ट्रीय राजनीति में जगह बनाना आसान नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि केजरीवाल को खारिज कर दिया जाए। निश्चित रुप से अरविंद केजरीवाल विपक्ष में एक करिश्माई नेतृत्व है,जिसकी अनदेखी बीजेपी भी नहीं कर सकती।    

 

 

    

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