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दलबदल : ‘गद्दी और गद्दारी’ साथ-साथ नहीं चलनी चाहिए

  • Updated on 7/30/2019

इस बरसात के मौसम में पार्टियों (Party) में विभाजन की बरसात हो रही है। कोई नहीं जानता कि कौन किसके साथ सो रहा है, कौन किसके बिस्तर से किसके बिस्तर पर कूद रहा है क्योंकि दोस्त और दुश्मन सब एक बन गए हैं और इसका कारण यह है कि सत्ता में आने के लिए निर्वाचित विधायकों (Elected legislators) को लुभाना और उन्हें स्वीकार करना सबसे आसान रणनीति बन गई है तथा इन कृत्रिम समीकरणों से हमें यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि साध्य साधन को उचित ठहराता है। आज दलबदल आम बात बन गई है। 

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पिछले सप्ताह यह कांग्रेस (Congress) और जद (JD) (एस) के 15 विधायकों की खरीद-फरोख्त का गवाह बना है जिसके चलते कुमारस्वामी (H. D. Kumaraswamy) सरकार का पतन हुआ तो येद्दियुरप्पा (B.S. Yeddyurappa) की भाजपा सरकार (BJP government) सत्ता में आई। यह अलग बात है कि उसके बाद भी विधानसभा (Vidhansabha) अध्यक्ष ने इन विधायकों को अयोग्य ठहरा दिया है और उनके अयोग्य ठहराने के कारण वे अब इस विधानसभा के शेष कार्यकाल तक चुनाव नहीं लड़ सकते या किसी भी पद को धारण नहीं कर सकते। 

10वीं अनुसूची में गंभीर खामी
क्या आप इस घटनाक्रम से चौंक गए हैं, आहत हुए हैं? बिल्कुल नहीं। पिछले एक माह में हमने देखा है कि राज्यसभा में तेदेपा के 4 सदस्य भाजपा में शामिल हो गए और गोवा में कांग्रेस के 15 सदस्य भाजपा के साथ जुड़ गए और उसके बाद 3 विधायकों को तो आनन-फानन में मंत्री बना दिया गया और ये सब कानून के अनुसार हुआ क्योंकि यह दलबदल रोधी कानून की दो तिहाई सीमा को पूरा करता है। ये दोनों उदाहरण बताते हैं कि 10वीं अनुसूची में गंभीर खामी है जिसके अंतर्गत एक तिहाई सदस्यों को विधायी दल में विभाजन की अनुमति दी गई है और उन पर अयोग्यता का तमगा भी नहीं लगता है। 
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मूल कांग्रेस या तेदेपा में विभाजन नहीं हुआ है, न ही इसकी विधायी पार्टी या संसदीय पार्टी में विभाजन हुआ है। तो फिर 10 विधायक या 4 सांसद किस तरह विलय कर सकते हैं? तेदेपा की संसदीय पार्टी में 9 सांसद हैं जिनमें से 3 लोकसभा में और 6 राज्यसभा में हैं और इसलिए अयोग्यता से बचने के लिए दो-तिहाई सदस्यों के लिए 6 सांसद चाहिएं और इसलिए यदि केवल 4 सदस्यों ने दलबदल किया है तो उन्हें अयोग्य घोषित नहीं किया जाना चाहिए और इसे विलय नहीं माना जाना चाहिए। 
2017 में भाजपा अरुणाचल प्रदेश में तब सत्ता में आई जब मुख्यमंत्री खांडू ने दलबदल किया और यही स्थिति मणिपुर, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड (Uttrakhand), गुजरात और महाराष्ट्र में देखने को मिल रही है, जहां पर अनेक सदस्य दलबदल कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल के दो विधायक और 60 पार्षद मई के अंत में भाजपा में शामिल हुए किन्तु जून में कुछ सदस्यों ने घर वापसी की। ममता ने इसे लोकतंत्र की हत्या बताया किन्तु उन्होंने स्वयं भी माकपा से दलबदल करवाया था। 

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निर्णय लेने में विलम्ब
एक नई स्थिति देखने को मिल रही है जहां पर अध्यक्ष दलबदल के मामलों में निर्णय लेने में विलम्ब कर रहे हैं। तेलंगाना में कांग्रेस के 18 विधायकों में से 12 विधायक तेलंगाना राष्ट्र समिति में शामिल हो गए और उनमें से 2 को मंत्री भी बना दिया गया क्योंकि अध्यक्ष ने उनके दलबदल के मामलों में निर्णय में विलम्ब किया। दलबदल की राजनीति में मंत्री पद का वितरण एक आसान उपाय है। इसी तरह 2014 से 2019 के बीच वाई.एस.आर. कांग्रेस के 23 विधायक तेदेपा में शामिल हुए किन्तु उनमें से किसी को भी अयोग्य घोषित नहीं किया गया और इसके चलते भ्रष्टाचार पर अंकुश लगने की बजाय भ्रष्टाचार बढ़ जाता है। 

वस्तुत: सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त के लिए सभी राजनीतिक दल दोषी हैं। उदाहरण के लिए भगौड़ा विजय माल्या भाजपा, कांग्रेस, जद (एस) सभी का प्रिय रहा है और इन सबने उसे कर्नाटक से राज्यसभा में निर्दलीय सदस्य बनाया। 2002 में कांग्रेस और जद (एस) ने और 2010 में भाजपा और जद (एस) ने उसका समर्थन किया। प्रश्न उठता है कि क्या दलबदल एक संवैधानिक पाप है? वर्ष 2017 में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रावत के मामले में उच्चतम न्यायालय ने ऐसी ही टिप्पणी की थी कि अपवित्र धोखाधड़ी को विलय या बड़े पैमाने पर दलबदल का नाम दिया जा रहा है और इन सदस्यों को संवैधानिक रूप से स्वीकार भी किया जाता है और इसका विचारधारा, नैतिकता और नैतिक मूल्यों से कोई संबंध नहीं होता है। 
संविधान में दलबदल निषेध है किन्तु राजनीतिक मजबूरियों, सुविधा और अवसरवादिता की राजनीति के चलते दलबदल होता है। ऐसे विधायकों को धमकी दी जाती है, धन बल से लुभाया जाता है या बाहुबल से डराया जाता है। कल तक ऐसी बातें चुनाव पूर्व दिखाई देती थीं किन्तु अब ये सांठगांठ की राजनीतिक रणनीति बन गई हैं। अध्यक्ष भी अपनी राजनीतिक विचारधारा के शिकार बन रहे हैं, जिसके चलते उनके संवैधानिक पद पर आंच आ रही है। अध्यक्ष की पार्टी के हित के विरुद्ध शिकायतों पर कार्रवाई नहीं की जाती या उनकी सुनवाई में विलम्ब किया जाता है। दलबदल रोधी कानून में अध्यक्ष द्वारा विलम्ब या कार्रवाई न करने के बारे में कोई प्रावधान नहीं है और दलबदल का दंड तब मिलता है जब दलबदल करने वाला विधायक सरकार को अस्थिर कर देता है। 

जानबूझ कर किया जाने वाला षड्यंत्र
इससे प्रश्न उठता है कि क्या कानून के अनुसार दलबदल एक जानबूझ कर किया जाने वाला षड्यंत्र है, जिसके चलते हेरा-फेरी द्वारा दलबदल कराया जाता है? न्यायालय तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब अध्यक्ष अपना निर्णय देता है। अनेक मामलों में न्यायालय ने दलबदल की याचिकाओं पर अत्यधिक विलम्ब से ङ्क्षचता व्यक्त की है और ऐसी याचिकाओं का निर्णय अक्सर सदन के कार्यकाल के अंत में किया जाता है। इसलिए ऐसे वातावरण में, जहां पर राजनीतिक दलों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है, विभाजन और दलबदल नियम बन गया है और जिसके चलते विधायक खरीदना चुनाव लडऩे से अधिक आसान हो गया है और ऐसा विक्रेता विधायक उस पार्टी में शामिल हो जाता है जो उसे सबसे ऊंची कीमत देती है और इस क्रम में वह किंगमेकर बन जाता है। 

इसलिए समय आ गया है कि दलबदल रोधी कानून में खामियों को दूर किया जाए क्योंकि इससे हमारे लोकतंत्र की आधारशिला प्रभावित हो रही है और इस दिशा में पहला कदम किसी सांसद या विधायक के त्यागपत्र के बारे में निर्णय करने के लिए अध्यक्ष हेतु समय सीमा निर्धारित की जाए, 10वीं अनुसूची में संशोधन किया जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि विभाजन मूल पार्टी में होगा या विधायी दल में। पार्टी संगठन में विभाजन की शर्त एक निवारक उपाय के रूप में कार्य कर सकती है। यदि कोई उम्मीदवार चुनाव से पहले अपनी पार्टी छोड़ देता है और दूसरी पार्टी में शामिल हो जाता है तो क्या निर्वाचित होने पर वह अयोग्य घोषित किया जा सकता है? 

कानून में दलबदल पर निषेध नहीं है किन्तु दलबदल करने पर विधायक अयोग्य घोषित हो जाता है। ऐसे विधायकों को 10 साल के लिए चुनाव लडऩे की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि दलबदल से जनादेश खंडित होता है। आज यदि किसी दलबदलू को मंत्री या लाभकारी पद नहीं दिया जाता है तो उसे नकद या अन्य पुरस्कार दिए जाते हैं। इसके अलावा निर्दलीय विधायक दलबदल रोधी कानून के दायरे से बाहर है। 

यह सच है कि केन्द्र में अधिक निर्दलीय सांसद नहीं हैं और न ही वे सत्ता संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं किन्तु राज्यों में अनेक बागी विधायक निर्दलीय के रूप में चुनाव जीतते हैं और अनेक क्षेत्रीय पार्टियों के उदय के चलते अल्पमत और बहुमत का अंतर बहुत कम रह गया है, इसलिए सरकार बनाने में निर्दलीय विधायकों की भूमिका निर्णायक हो जाती है। इसलिए इस पर भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए कि यदि वह निर्वाचित होने के बाद किसी पार्टी के साथ गठबंधन करता है और यदि बाद में वह पाला बदल देता है तो यह जनादेश के विरुद्ध है। 

पार्टी बदलना राजनीति का हिस्सा है किन्तु हमें सिद्धान्त और सिद्धान्तविहीन राजनीति में अंतर करना होगा। वर्तमान कानून दलबदल तथा धन-बल या पद के लालच के प्रभाव को कम करने में विफल रहा है। इसलिए विधायी सुधार किए जाने चाहिएं और दलबदल रोधी कानून को मजबूत बनाया जाना चाहिए। हालांकि यह एक राजनीतिक समस्या के समाधान के लिए कानूनी समाधान लागू करने के समान होगा। कुल मिलाकर दलबदल और विभाजन की समस्या का प्रभावी ढंग से निराकरण किया जाना चाहिए। विशेषकर इसलिए कि हम भारतीय दलबदल करने के लिए कुख्यात हैं। गद्दी और गद्दारी साथ-साथ नहीं चलनी चाहिए। क्या हम सिद्धान्तों की राजनीति अपनाने और राजनीतिक वेश्यावृत्ति के अंत की आशा कर सकते हैं? 

पूनम आई. कौशिश
pk@infapublications.com

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