Monday, Oct 25, 2021
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 जाने कैसे जयपुर के राजा ने दी बंगला साहिब के लिए जमीन

  • Updated on 9/19/2021

नई दिल्ली। अनामिका सिंह। गुरू बिन ज्ञान कहां से आवै, गुरू ही है जो ब्रह्म दिखावें। सच गुरू नाम के आगे हर नाम फीका है। गुरूओं के ज्ञान का थाह लेना आसान नहीं और वो चाहें तो पानी से भी दवा बना सकते हैं। ऐसा ही साल 1721 में दिल्ली के लोगों ने करिश्मा देखा जोकि इतिहास में दर्ज है। इस करिश्में ने ही दिल्ली में नींव रखी बंगला साहिब गुरूद्वारे की। यहां बने पवित्र सरोवर का जल आज भी लोगों में सकारात्मकता का संचार ही नहीं करता बल्कि लोगों को भरोसा है कि वो इस जल में नहाने से कई प्रकार की बीमारियों व परेशानियों से मुक्त हो जाएंगे। तो आइए जानते हैं बंगला साहिब गुरूद्वारे से जुडा इतिहास।
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औरंगजेब था रामराय पर मेहरबान, गुरू हरिकिशन को बुलाया था दिल्ली
इतिहासकार बताते हैं कि इस स्थान पर अम्बेर के राजा जयसिंह का महल हुआ करता था। गुरू हरराय ने अपने बडे लडके रामराय से नाखुश होकर अपने छोटे बेटे गुरू हरिकिशन को गद्दी का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। दरअसल रामराय अपने मार्ग से भटक गया था और औरंगजेब से काफी प्रभावित हो गया था। इस बात से रामराय की तमाम योजनाएं बेकार हो गईं और उन्होंने मुगल बादशाह औरंगजेब के सामने जाकर गुरू हरिकिशन के खिलाफ मुकदमा कर दिया। औरंगजेब पहले से ही रामराय पर काफी मेहरबान था, जिससे उसने रामराय व गुरू हरिकिशन सिंह को दिल्ली बुलाया। लेकिन हरिकिशन ने दिल्ली आगमन के लिए बादशाह को साफ इंकार कर दिया क्योंकि उनके पिता ने उन्हें बादशाह से मिलने के लिए मना किया था।
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राजा जयसिंह ने अपने महल पर दिया निमंत्रण
जब गुरू हरिकिशन सिंह ने बादशाह के निमंत्रण को ठुकरा दिया तब राजा जयसिंह ने उन्हें अपने महल में आने का निमंत्रण दिया। जोकि रायसीना की पहाडियों पर ठीक वहीं बनाया गया था जहां आज बंगला साहिब गुरूद्वारा स्थापित है। जयसिंह के निमंत्रण को उन्होंने स्वीकार कर लिया। उस वक्त गुरू हरिकिशन सिंह की उम्र महज 8 साल की थी।
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बादशाह ने ली गुरू हरिकिशन की परीक्षा
बादशाह ने गुरू हरिकिशन की परीक्षा लेनी चाही। उसने जयसिंह के महल की सभी महिलाओं से उन्हें घेरवा दिया, जिनमें बांदियों ने रानियों का लिबास पहन रखा था। अब गुरू से कहा गया कि वो महारानी कौन है ये बताएं। गुरू हरिकिशन ने महिलाओं के चेहरे की ओर देखा और तुरंत ही महारानी को पहचान लिया। बादशाह ने यह देखकर फैसला किया कि गुरू बनने के काबिल हरिकिशन राय ही हैं रामराय नहीं।
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शहर में फैला हैजा, रक्षक बने गुरू हरिकिशन
जिस समय गुरू हरिकिशन, महाराज जयसिंह के महल में ठहरे हुए थे, उस समय शहर में हैजा फैल गया था। बहुत से लोग गुरू महाराज का आशीर्वाद लेने आ पहुंचे, इस दौरान उन्होंने महल के कुएं से पानी निकालकर लोगों को दिया और लोग सही होने लगे। इसी पवित्र सरोवर को आज चैबच्चा साहब के नाम से जाना जाता है। जैसे ही यह घटना महाराजा को पता चली उन्होंने इस जगह को गुरू हरिकिशन को दे दिया।
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करीब 5 एकड की भूमि पर बना है गुरूद्वारा
राजा जयसिंह ने इस जगह को खाली कर दिया। गुरू हरिकिशन यहां रहे और आज भी उनके नाम का प्रकाश यहां फैला हुआ है। करीब 5 एकड में गुरूद्वारा बंगला साहिब का निर्माण किया गया है। डेढ एकड में गुरूद्वारा व बाकी साढे तीन एकड में अन्य इमारतें हैं व स्कूल है। मौजूदा इमारत का निर्माण साल 1954 में पूरा हुआ है।
 

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