Saturday, Jul 21, 2018

क्या है Section 377, क्यों समाज का एक खास वर्ग चाहता है इसमें बदलाव

  • Updated on 7/11/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखने वाली आईपीसी की धारा 377 पर बड़ी सुनवाई शुरू हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा इसे चार हफ्तों तक टालने की अपील को सुप्रीम कोर्ट द्वारा ठुकरा दिया गया। 

समलैंगिकता को एलजीबीटी क्यू के रूप में जाना जाता है। जिसमें L-लेस्बियन, G-गे,B-बी-बाईसेक्सुअल और T-ट्रांसजेंडर, Q-क्व‍ियर। इसे क्व‍ियर समुदाय का नाम भी दिया गया है। क्व‍ियर का मतलब अजीब और विचित्र होता है और इस अजीब और विचित्र होने पर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इसी मुद्दे पर पूरे देश में बहस चल रही है। 

क्या कहती है धारा 377

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ये धारा अप्रकृतिक यौन संबंधों को गैरकानूनी ठहराती है। इस धारा को ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों द्वारा 1862 में लागू किया था। सेक्शन 377 के तहत  अगर कोई स्‍त्री-पुरुष आपसी सहमति से भी अप्राकृतिक यौन संबंध बनाते हैं तो इस धारा के तहत 10 साल की सजा व जुर्माने का प्रावधान है। किसी जानवर के साथ संबंध बनाने पर इस कानून के तहत उम्रकैद या 10 साल की सजा एवं जुर्माने का प्रावधान है। इस कानून के तहत गिरफ्तारी के लिए किसी वारंट की जरूरत नहीं होती। शक के अधार पर या गुप्त सूचना के आधार पर पुलिस गिरफ्तारी कर सकती है।

2009 में दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला

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जुलाई 2009, में दिल्ली हाई कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को गैर-कानूनी करार दिया था जिसके बाद देश में इसके खिलाफ हलचल पैदा हो गई और सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया।

2013 में सुप्रीम कोर्ट ने पलटा फैसला 

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2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए समलैंगिक संबंधों को अवैध ठहराया। हालांकि अब LGBTQ समुदाय के अधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाले संगठनों की तरफ से दायर पुनर्विचार याचिका को लेकर दोबारा सुनवाई शुरू हो गई।

एलजीबीटी समुदाय की राय

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एलजीबीटी समुदाय का कहना है कि समलैंगिक संबंध कहीं से भी अप्राकृतिक नहीं हैं। यह कई जानवरों की तरह इंसानों में भी एक आम स्वभाव है। लेकिन कई धार्मिक कारणों और भावनाओं का हवाला देते हुए इसे गैर कानूनी बनाए रखने की मांग जारी है। 2009 के बाद इस समुदाय के लिए खुशी का वक्त था जो ज्यादा समय तक नहीं टिक पाया।

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