Sunday, Oct 21, 2018

कर्नाटकः BJP-JDS के दावे के बाद जानिए राज्यपाल के पास क्या है विकल्प

  • Updated on 5/16/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। कर्नाटक में नतीजें आने के बाद से घमासान जोरों पर है। पल पल राज्य में राजनीतिक घटनाक्रम बदल रहा है। राज्य में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस और जेडीएस ने जहां एक दूसरे का हाथ थामा है वहीं बीजेपी फिलहाल अकेले ही जद्दोजहद कर रही है। फिलहाल बीजडेपी विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद येदियुरप्पा के साथ पार्टियों के विधायक राजभवन जाकर गवर्नर से मुलाकात की। राज्य में 104 सीटें हासिल कर बीजेपी ने पार्टी बनाने का दावा पेश कर दिया है। अब फैसला गवर्नर वीजूभाई वाला को करना है की बीजेपी या जेडीएस और कांग्रेस में किसकी सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं। 


विशेषज्ञों की क्या है राय 

विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे गौवा और मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभर कर आई जिसके बाद कांग्रेस ने सरकार बनाने की पेशकश की थी , बीजेपी को भी वैसे ही तर्क पेश करने चाहिए। हालांकि दोनों राज्यों में बीजेपी से ज्यागा वोट हासिल करने के बाद भी बीजेपी ने क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। 

पूर्व अटनी जनरल सोली सोराबजी का कहना है कि सबसे पहला निमंत्रण उसी पार्टी को मिलना चाहिए जो बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। सदन में वो 7 से 10 में अपना बहुमत साबित करे। यदि वो पार्टी बहुमत साबित करने में विफल रहती है तो दूसरे नंबर की पार्टी या गठबंधन को मौका दिया जाना चाहिए। इसके बाद अगर वो भी बहुमत हासिल नहीं कर पाए तो ऐसे में राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए। 


राज्यपाल पर सबकी निर्भर 
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार बनाने का अधिकार राज्यपाल को उनके विवेक के आधार पर दिया है। लोकसभा के पूर्व सुभाष कश्यप का कहना है कि राज्यपाल को किसी भी  पार्टी चुनाव से पहले या बाद में बने गठबंधन को न्योता देना होता है। उनका कहना है कि राज्यपाल का फैसला गलत भी हो सकता है लेकिन फिर भी उनका अधिकार छीना नहीं जा सकता। हालांकि बहुमत सदन में ही साबित करनी होती है। 

कर्नाटक में क्या किया जा सकता है 

कर्नाटक की स्थिती में कश्यप ने कहा कि अगर पहले के उदाहरणों को देखा जाए तो संभावनाओं को समझा जा सकता है। सबसे बड़ी पार्टी के नेता को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है या चुनाव के बाद गठबंधन होने पर उसके किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। इस बार भी राज्यपाल अपने धैर्य से फैसला कर सकते है। क्योंकि हमारे संविधान में ये नहीं बताया गया है कि राज्यपाल संविधान में जोड़ जोड़ कर सरकार बनने पर राज्यपाल को कैसे मुख्यमंत्री की नियुक्ति  करनी है।

जब कोर्ट ने तय किए थे राज्यपाल के अधिकार

पांच जजों की बेंच ने कहा था कि अगर दो पार्टियों के विचार एक सामान है तो चुनाव के बाद भी जोड़ तोड़ करने में कोई गलती नहीं है। बता दें कि 2006 में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने बिहार असेंबली को भंग करने की सिफारिश की थी क्योंकि उन्हें लगा था कि चुनाव से पहले बीजेपी और जनतादल यूनाइटेड का गठबंधन (92 सीटें) राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी (75+29 सीटें) को बहुमत का आंकड़ा बनाने से रोकने की कोशिश कर रहा है। सिंह के फैसले कोर्ट में रामेश्वर प्रसाद ने चुनौती दी थी। कोर्ट ने बूटी सिंह को फटकार लगाते हुए राज्यपाल की ताकतों के बारे में फैसला दिया था। 

उस वक्त जब कोर्ट के सामने यह बात रखी गई थी तो दोबारा चुनाव कराने चाहिए तो तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया वाई के सबरवाल ने कहा था कि इस प्रस्ताव को मानने से सदन के विघटन के रास्ते आसान हो जाएंगे जिसके दूरगामी, चिंताजनक परिणआम हो सकते हैं।     

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