Tuesday, Jun 22, 2021
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जानिए आस्था और भक्ति के समागम के कुंभ मेले का रहस्य

  • Updated on 4/7/2021

नई दिल्ली/ सुनील दत्त थपलियाल। कुंभ मेले का आयोजन इस बार तीर्थ नगरी हरिद्वार में हो रहा है। वैसे तो कुंभ मेला हर 12 वर्ष में लगता है लेकिन हरिद्वार में इस बार 11वें वर्ष में ही आयोजित किया जा रहा है। दरअसल ज्योतिष गणनाओं के कारण ऐसा हो रहा है। बृहस्पति ग्रह कुंभ राशि में नहीं होंगे इसलिए 11वें साल में ही कुंभ मेले का आयोजन हरिद्वार में किया जा रहा है।

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वैसे यह भी मान्यता है कि पौराणिक काल में कुंभ मेले का प्रारंभ तीर्थ नगरी हरिद्वार से ही हुआ था। कई ऐतिहासिक पुरातात्विक और पौराणिक ग्रंथों से यह प्रमाणित होता है हमारी सनातन संस्कृति और सभ्यता का विकास गंगा, यमुना  और सरस्वती नदी के किनारे ही हुआ था। बाद में इस सनातन सभ्यता का विकास सिंधु घाटी तक हो गया था।

मान्यता है कि पौराणिक काल में कुंभ मेले का प्रारंभ तीर्थ नगरी हरिद्वार से ही हुआ था। कई ऐतिहासिक पुरातात्विक और पौराणिक ग्रंथों से यह प्रमाणित होता है हमारी सनातन संस्कृति और सभ्यता का विकास गंगा, यमुना और सरस्वती नदी के किनारे ही हुआ था।

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आयोजन 12 वर्ष बाद क्यों
मान्यता है कि अमृत कलश की प्राप्ति के लिए देवताओं और राक्षसों में 12 दिन तक निरंतर युद्ध चला था। हिन्दू पंचांग के अनुसार देवताओं के 12 दिन अर्थात मनुष्य के 12 वर्ष माने गए हैं इसलिए कुंभ का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष में होता है। अद्र्ध कुंभ मेला प्रत्येक 6 वर्ष में हरिद्वार तथा प्रयागराज में लगता है जबकि पूर्ण कुंभ बारह वर्ष बाद प्रयागराज में ही लगता है और बारह महाकुंभ मेलों के बाद 144 वर्ष बाद महाकुंभ मेला भी प्रयागराज में ही लगता है।

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धर्म नगरी हरिद्वार में कुंभ का आयोजन पौराणिक ज्योतिष विश्वास और ज्योतिष गणना के अनुसार बृहस्पति के कुंभ और सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने के कारण होता है। ये भी सनातन संस्कृति के वाहक हैं जो विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन और सनातन धर्म के सबसे बड़े पर्व कुंभ में आस्था का प्रतीक बनते हैं। सनातन हिंदू धर्म में कुंभ मेले का महत्व है। वेदज्ञों के अनुसार यही एकमात्र कुंभ मेला, त्यौहार व उत्सव है, जिसे सभी हिन्दुओं को मिल कर मनाना चाहिए।

धार्मिक सम्मेलनों की यह परंपरा भारत में वैदिक युग से चली आ रही है। जब ऋषि और मुनि किसी नदी के किनारे जमा होकर धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक रहस्यों पर विचार-विमर्श करते थे। यह परंपरा आज भी जारी है। कुंभ मेले के आयोजन के पीछे बहुत बड़ा विज्ञान है। जब-जब इस मेले के आयोजन का प्रारंभ होता है, सूर्य पर हो रहे विस्फोट बढ़ जाते हैं और इसका असर धरती पर बहुत भयानक रूप में होता है। देखा गया है कि प्रत्येक 11 से 12 वर्ष के बीच सूर्य पर परिवर्तन होते हैं।

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कुंभ को विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन या मेला माना जाता है। इतनी बड़ी संख्या में आयोजन सिर्फ सनातन धर्म में ही होता है। कुंभ, जो प्रत्येक 12 वर्ष में आयोजित होता है, एकत्रित लोगों को जोडऩे का एक माध्यम है। कुंभ का आयोजन प्रत्येक तीन वर्ष में चार अलग-अलग स्थानों पर भी होता है। अद्र्ध कुंभ मेला प्रत्येक 6 वर्ष में हरिद्वार और प्रयाग में लगता है जबकि पूर्ण कुंभ हर बारह साल बाद प्रयाग में ही लगता है। 12 कुंभ मेलों के बाद महाकुंभ मेला भी हर 144 साल बाद केवल प्रयागराज (इलाहाबाद) में ही लगता है।

माना जाता है कि समुद्र मंथन से जो अमृत कलश निकला था, उसमें से देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध के दौरान धरती पर अमृत छलक गया। जहां-जहां उसकी अमृत की बूंदें गिरीं वहां प्रत्येक 12 वर्ष में एक बार कुंभ का आयोजन किया जाता है। इस कुंभ को पूर्ण कुंभ कहा जाता है।

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कुंभ आयोजन के स्थान
हिन्दू धर्म के अनुसार इंद्र के बेटे जयंत के घड़े से अमृत की बूंदें चार जगहों पर गिरीं। हरिद्वार में गंगा नदी, उज्जैन में क्षिप्रा नदी, नासिक में गोदावरी और प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थान पर। धार्मिक मान्यता के अनुसार कुंभ में श्रद्धापूर्वक स्नान करने वाले लोगों के सभी पाप कट जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। कुंभ मेला और ग्रहों का आपस में गहरा संबंध है। दरअसल, कुंभ मेला तभी आयोजित होता है जबकि ग्रहों की वैसी ही स्थिति निर्मित हो रही हो जैसे अमृत छलकने पर हुई थी।

मान्यता है कि बूंदें गिरने के दौरान अमृत और अमृत कलश की रक्षा करने में सूर्य, चंद्र, बृहस्पति और शनि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चंद्र ने कलश की प्रश्रवण होने से, गुरु ने अपहरण होने और शनि ने देवेंद्र के भय से रक्षा की, सूर्य ने अमृत कलश को फूटने से बचाया। इसलिए पौराणिकों व ज्योतिषियों के अनुसार जिस वर्ष जिस राशि में सूर्य, चंद्र और बृहस्पति या शनि का संयोग होता है उसी वर्ष उसी राशि के योग में जहां-जहां अमृत की बूंदें गिरी थीं वहां कुंभ पर्व आयोजित होता है।

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तिथियों से बढ़ गया महत्व 
इस बार हरिद्वार में कुंभ का आयोजन  उस समय हो रहा है जबकि मकर संक्रांति का योग भी बन गया है साथ ही दूसरे दिन सूर्य ग्रहण है। इसके अलावा भी कई और महत्वपूर्ण दिनों में स्नान करने की तिथि है। इस सदी के कारण इस बार का कुंभ स्नान महाफल देने वाला माना जा रहा है।

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