#BabasahebAmbedkar :जानिए बाबा साहब के जीवन से जुड़ी खास बातें, लग चुका है ये बड़ा आरोप

  • Updated on 12/6/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। संविधान के रचियता, दलितों के मसीहा, भारत रत्न डॉ भीमराव आंबेडकर को आखिर कौन नहीं जानता। आज उनके 63 वीं पुण्यतिथि है। इसके मौके पर पूरा देश उन्हें याद और नमन कर रहा है। आंबेडकर की मृत्यु 6 दिसंबर 1956 को हुई थी। जिसकी पुण्यतिथि पर आज  राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

भीमराव अंबेडकर के विचार इतने प्रभावित हुआ करते थे कि आज भी आधुनिक भारत में उनके विचारों का जिक्र किया जाता है। आप को जानकर हैरानी होगी कि अपने जीवन में अंबेडकर एक भी चुनाव नहीं जीत पाए थे। लेकिन आज देखे तो लोग उनके नाम पर वोट मांगते है। आजकल देश में राष्ट्रवाद का दौर चल रहा है। जिससे देखों राष्ट्रवाद की नई परिभाषा गढ़ने में लगा है। लेकिन अंबेडकर का मानना था कि  बिना जाति-व्यवस्था का खात्मा किए भारत को एक राष्ट्र बनाना असंभव है। 

एक समय था जब देश में उनका खूब विरोध हुआ था। लेकिन ये उनके विचारों की ही ताकत है कि आज खुलेआम कम ही लोग उनका विरोध करने की हिम्मत जुटा पाते है। उस समय में अंबेडकर ने भी किसी दल को बख्शा नहीं था। गांधी और कांग्रेस के साथ उनका जो विरोध था वो तो जगजाहिर ही है। अंबेडकर ने देश के लिए इतने काम किए है कि उनके बारे में एक लेख में बता पाना मुश्किल है तो चलिए बात करते है उनसे जुड़ी कुछ बाते। 

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2 सितंबर 1953 राज्यसभा जब संविधान को जलाना को लेकर बोले थे बाबा साहेब

सुन्ने में आपको अजीब लगेगा लेकिन 23 सितंबर सन् 1953 को राज्यसभा में भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि छोटे समुदायों और छोटे लोगों को हमेशा ये डर सताता है कि बहुसंख्यक उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं। मेरे मित्र मुझसे कहता हैं कि मैंने संविधान बनाया है। लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूं कि इसे जलाने वाला पहला व्यकति भी मैं ही होंगा। मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है क्योंकि ये किसी के लिए भी अच्छा नहीं है। हालांकि हमारे लोग इसे लेकर आगे बढ़ना चाहते है लेकिन हमे याद रखना होगा कि एक तरफ बहुसंख्यक है और एक तरफ अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक यह नहीं बोल सकते नहीं नहीं हम अल्पसंख्यकों को महत्व नहीं दे सकते क्योंकि इससे लेकतंत्र को नुकसान होगा। मुझे कहन चाहिए कि अल्पसंख्यक को नुकसान पहुंचाना सबसे नुकसानदेह होगा। 

अंबेडकर पर लगा था ये बड़ा आरोप 

अंबेडकर पर आरोप लगाया गया था कि वो अंग्रेजों के समर्थक थे और कभी भी स्वाधीनता आंदोलन में उन्होंने भाग नहीं लिया। हालांकि ये बात सही है कि उन्होंने कभी आजादी के आंदोलन में शिरकत नहीं की लेकिन इसके पीछे ये कारण था कि कांग्रेस उस वक्त स्वतंत्र भारत में दलितों की स्थिति पर अपना रुख साफ नहीं कर रही थी। अंबेडकर के लिए दलितों की आजादी पहली प्राथमिकता थी।

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लेकिन जो लोग अंबेडकर पर आरोप लगाते है कि वो अंग्रजों का समर्थन करते थे। उन लोगों को अंबेड़कर ने 1930 के गोलमेज सम्मेलन में जो बात कही थी उसे ध्यान में रखना चाहिए। उस सम्मेलन में अंबेडकर ने भारत के स्वराज की मांग करते हुए कहा था कि  ‘हमें ऐसी सरकार चाहिए जिसमें सत्ता पक्ष देश के सर्वाधिक हित में अपनी निष्ठा रखेगा। हमें ऐसी सरकार चाहिए जिसमें सत्ता पक्ष यह समझता हो कि कब आज्ञाकारिता समाप्त हो जाएगी और कब प्रतिरोध शुरू हो जाएगा और तब तक वह जीवन की सामाजिक और आर्थिक कानूनों में ऐसे संशोधन करने से कभी नहीं डरेगा जो न्याय और औचित्य की दृष्टि से तुरंत किए जाने जरूरी होंगे। यह भूमिका ब्रिटिश सरकार कभी नहीं निभा पाएगी। यह कार्य वही सरकार कर सकती है जो जनता की हो, जो जनता के लिए हो और जनता के द्वारा चुनी गई हो।

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जानें, बाबा साहब से जुड़ी कुछ अन्य खास बाते  

- बाबा साहब अकेले ऐसे भारतीय है जिनकी प्रतिमा लंदन संग्राहलय में कार्ल मार्क्स के साथ लगाई गई है। इतना ही नहीं उन्हें देश विदेश में कई प्रतिष्ठित सम्मान भी मिले है। 1956 में मधुमेह बीमारी के चलते उनके निधन के 34 साल बाद 1990 में जनता दल की वी.पी सिंह सरकार ने इन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारतरत्न से सम्मानित किया। 

- भीमराव आंबेडकर के पास कुल 32 डिग्री थी। वो विदेश जाकर अर्थशास्त्र में पीएचडी करने वाले पहले भारतीय थे। नोबेल प्राइज जीतने वाले अमर्त्य सेन इन्हें अपने पिता मानते थे। पेशे से बाबा साहेब वकील थे। 

- हमारे देश के झंडे में अशोक चक्र लगावाने वाले भी वहीं थे। 

- जब भीमराव आंबेडकर को लगा की वो जातिप्रथा दूर नहीं कर सकते तो उन्होंने गुस्से में बोला था कि मैं हिंदू पैदा हुआ था लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं।   
 

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