ऐसे ही नहीं कांग्रेस को प्रियंका पर भरोसा, पहली बार चुनावी मैदान में उतरते ही पलट दी थी बाजी

  • Updated on 2/11/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल।  लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सभी पार्टियां जोर शोर से राजनीतिक नीति बना रही है। बीजेपी को टक्कर देने के लिए एक और जहां सपा और बसपा ने गठबंधन कर लिया है वहीं बाकी विपक्षी पार्टी एकजुट हो रही है। काग्रेस ने भी ब्रह्मास्त्र चलते हुए प्रियंका गांधी की आधिकारिक तौर पर राजनीति में एंट्री करवा दी है। प्रियंका को कांग्रेस का महासचिव बनाकर उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई है। पिछले तीन दशकों से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति बेहद खराब रही है। 

अब राजनीतिक पंंड़ित ये कयास लगाने लगे है कि प्रियंका के सहारे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कितनी चमात्कार कर पाएगी। ये तो हमे चुनावी नतीजे आने के बाद ही पता चल पाएगा। लेकिन एक नजर डाल लेते है इससे पहले जब भी गांधी परिवार का कोई सदस्य चुनाव में उतरा है तो क्या असर हुआ।

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1989 के बाद से उत्तर प्रदेश में कमजोर होती गई कांग्रेस 
1989 में हुए चुनाव के बाद से ही कांग्रेस का प्रदर्शन उत्तर प्रदेश में उभर नहीं पाया है। 1998 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी। हालांकि इससे पहले 1977 के चुनाव के वक्त भी कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपना खाता नहीं खोल पाई थी।

इसके बाद भी तब कांग्रेस का वोट 25 फिसदी था, लेकिन 1998 में हुआ चुनाव में कांग्रेस को वोट प्रतिशत महज 6 फीसदी ही था और 69 सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई थी। इसके एक साल बाद ही 1999 के लोकसभा चुनाव में पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस के प्रदर्शन में काफी सुधार आया। पार्टी ने ना केवल 10 सीटें जीती बल्कि वोट में भी तकरीबन 9 फीसदी का इजाफा हुआ। 

1999 के चुनाव में ऐसा क्या हुआ जो कांग्रेस ने पल्टी बाजी
अब सवाल ये उठता है कि 1999 के चुनाव में ऐसा क्या हुआ कि लगातार गिरती कांग्रेस ने वापसी कर ली। दरअसल उस बार कांग्रेस ने बहुत बड़ा राजनीतिक परिवर्तन किया था। 1999 में ही तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी रायबरेली में चुनाव के लिए उतरी और अमेठी सीट से चुनाव लड़ सांसद बनी थी। 

जब प्रियंका ने पहली बार किया कांग्रेस के लिए प्रचार
1999 में ही पहली बार प्रियंका गांधी को कांग्रेस ने प्रियंका गांधई से अमेठी और रायबरेली में प्रचार करवाया था। इसी चुनाव में कांग्रेस ने बीजेपी से रायबरेली और अमेठी की सीट छीन ली थी। 

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एक बार फिर कांग्रेस के लिए उतरी प्रियंका कर पाएंगी कितना चमत्कार
एक बार फिर कांग्रेस के सामने वही स्थिति है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सिर्फ 2 सीटों तक सिमट गई थी। साथ ही पार्टी का वोट गिरकर 8 फीसदी पर आ गया है। इस बार प्रियंका को अमेठी और रायबरेली के अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान दी गई है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रियंका अमेठी और रायबरेली से आगे कांग्रेस को बढ़ाने में कामयाब होंगी?क्या वो मोदी और योगी को चुनौती दे पाएंगी?

1989 से लगातार घट रहा कांग्रेस का वोट शेयर 
1989 से लेकर 1998 तक लगातार कांग्रेस के वोट शेयर में गिरावट आई है। वहीं बीजेपी के वोट शेयर में लगातार चुनाव दर चुनाव इजाफा हुआ है। ये सिलसिला 1999 में बदला क्योंकि तब कांग्रेस को वोट प्रतिशत में इजाफा हुआ और बीजेपी को 8 प्रतिशत वोट का नुकसान। 2014 के चुनाव में कांग्रेस के वोट में 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई तो दूसरी ओर बीजेपी के वोट में 25 फीसदी की अप्रत्यशित बढ़ोतरी हुई। 2019 के चुनाव में बीजेपी के लिए बढ़त को कायम रखना थोड़ी मुश्किल होगा यदि बीजेपी के वोट बैंक में गिरावट आई तो इसका बड़ा हिस्सा कांग्रेस के दामन में चला जाएगा।

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