Thursday, May 13, 2021
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चमोली त्रासदी: जानिए क्यों टूटते हैं ग्लेशियर, जिससे मचती है भारी तबाही

  • Updated on 2/8/2021

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने (Glacier burst) से भारी तबाही हुई है। अब तक मिली जानकारी के अनुसार चमोली के रेणी गांव से सटे ग्लेशियर की चपेट में आने से 170 लोग को बहने की खबर है। ग्लेशियर के टूटने से जलस्तर के तेज बहाव से होने वाली तबाही का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी चपेट में आने से कई पुल टूट गए और कई गावों का शहरों से संपर्क टूट गया। ऐसे में बताना जरूरी हो जाता है कि आखिर ग्लेशियर टूटते कैसे हैं?

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पर्यावरण से छेड़खानी और ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा
दरअसल, उत्तराखंड से सटी हिमालयी पट्टी पर पर्यावरण से छेड़खानी और ग्लोबल वार्मिंग का ही नतीजा है कि ग्लेशियर टूटने की ये घटना सामने आई है। उत्तराखंड के ग्लेशियरों पर हुए आज तक के शोध यही बताते हैं कि यहां पर कमजोर होते ग्लेशियर भविष्य में और अधिक तबाही ला सकते हैं।

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दो तरह के प्रदूषण की जद में हिमालय
वरिष्ठ भू वैज्ञानिक डॉ. पी. एस. नेगी बताते हैं कि इस समय हिमालय में दो तरह का प्रदूषण पहुंच रहा है। एक है बायो मास प्रदूषण ( कार्बन डाईऑक्साइड) और दूसरा है एलिमेंट पोल्यूशन (तत्व आधारित प्रदूषण) जो कार्बन मोनोऑक्साइड उत्पन्न करता है। ये दोनों ही तरह के प्रदूषण ब्लैक कार्बन बनाते हैं, जो ग्लेशियर के लिए खतरनाक होते हैं। अब तक यह माना जाता रहा था कि हिमालयी जंगलों में लगने वाली आग के चलते ग्लेशियरों में ब्लैक कार्बन जमता है, यही कारण है कि ग्लेशियर तेज रफ्तार से पिघल रहे हैं, और उनके टूटने की खबरे आने लगी हैं।

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जानें कितने ग्लेशियर हैं उत्तराखंड में
राज्य सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड के आसपास 1834 ग्लेशियर और 75 वर्ग किलोमीटर पर 127 ग्लेशियर झीलों का बसेरा है। हिमालय पर जमा हो रही ब्लैक कार्बन और पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान के कारण यह ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, शोधकर्ता यहां तक अनुमान लगा चुके हैं कि तापमान में वृद्धि की यही रफ्तार रही तो 2100 तक सभी ग्लेशियर पिघल जाएंगे और पूरी पृथ्वी पानी में डूब जाएगी।

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