चुनाव प्रचार में नेताओं की भाषा चिंता का विषय

  • Updated on 12/4/2018

पिछले दिनों देश में पांच राज्यों में हो रहे चुनावों में, जो अभी भी राजस्थान और तेलंगाना में होने बाकी हैं, चुनाव प्रचार के दौरान राजनेताओं की जिस तरह की भाषा और मंतव्य को सुना, उसे देखकर यह चिंता होना लाजिमी है कि जब आम चुनाव 2019 में होंगे, तब क्या होगा?

चुनावों में माता-पिता पर कटाक्ष हुए तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सहानुभूति के लिए अपने भाषण में इन बातों को भी शामिल कर लिया। एक जगह उन्होंने कहा कि मुझसे नहीं लड़ा जाता तो मेरी मां, जिसे राजनीति का ‘क’ भी नहीं पता, उन्हें घसीट लाए। किसी नेता ने उनके पिता के बारे में कोई बात कही तो एक सभा में उन्होंने कहा कि अब ये लोग मुझे व मेरी मां के बाद मेरे पिता को भी घसीट लाए।

इस तरह चुनाव में तेरी मां-मेरी मां जैसी बातें चलीं, जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए निहायत ही गलत है। राजनीति में आज के समय में सिद्धांत गायब हो गए हैं। राजनीति में विचार और विकास कम, व्यक्तिगत हमले, धर्मोन्माद आदि चीजें हावी हो गई हैं।

छुटभैये नेताओं में गाली-गलौच हो तो समझा जा सकता है कि उनमें परिपक्वता की कमी है, मगर बड़े स्तर पर नेताओं में नाम ले-लेकर इस तरह की बातें हों व चुनाव प्रचार में उनका सहानुभूति के लिए इस्तेमाल हो तो इस बारे में क्या कह सकते हैं।

हम सब जानते हैं कि वर्तमान में राजनीति के स्तर पर उच्च नेताओं में गंभीरता की बजाय सीधे टकराव की भावना बढ़ी है। यह सब लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता। क्योंकि हर दल के, हर नेता के आलोचक भी होते हैं और प्रशंसक भी जो इन बातों से आपस में भिड़ भी सकते हैं। इससे नेताओं की गरिमा भी गिरती है तथा आम आदमी को सोचने पर मजबूर भी कर देती है। 

यह सब केवल पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा के चुनाव में हमें देखने-सुनने को मिला है। आम चुनाव 2019 में होंगे तो क्या होगा, इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है जब एक से बढ़कर एक महारथी चुनाव मैदान में होंगे। हम जैसे अधेड़ उम्र के लोग तो कम से कम यह सोचेंगे कि पहले जो सुचिता राजनीति में थी वह अब नहीं रही, मगर नई पीढ़ी के युवा जो सिर्फ इसी समय के नेताओं को देख-सुन रहे हैं, वे क्या सोचेंगे कि यही सब राजनीति है, क्या यही लोकतंत्र है? मैं समझता हूं कि नेताओं को कम से कम इन हदों को पार करने से बचना चाहिए।

सोचिए यदि किसी नेता ने प्रधानमंत्री के माता-पिता को लेकर कोई बात कही, भले ही कहने का उद्देश्य कुछ और रहा हो, प्रधानमंत्री को पद की गरिमा और स्वस्थ राजनीति के लिए जनता के सामने इन बातों को नहीं रखना चाहिए था। इससे टिप्पणी करने वाले नेता को स्वयं एहसास होता कि उसने ऐसा कुछ कहा जो नहीं कहना चाहिए था। मगर प्रधानमंत्री जी कितने महान हैं कि उन्होंने उक्त बात को महत्व नहीं दिया।

पहले तो इस तरह की व्यक्तिगत टिप्पणियों से बचना ही बेहतर है। यदि कोई ऐसी टिप्पणी करता है तो फिर सामने वाले को अपनी गरिमा के लिए उस बात को अपने भाषण में जनता को नहीं सुनाना चाहिए। नेताओं को जनता की परेशानी और जनता के विकास, इन सब पर लडऩा चाहिए। लोगों की बढ़ी हुई दुश्वारियां, परेशानियां, जिनसे निजात पाने को वे नेताओं की ओर टकटकी लगाकर देखते हैं, उन्हीं पर राजनीति हो तो अच्छा होगा।

किसी को ऊंचा और नीचा दिखाने, धर्म के नाम पर राजनीति, जातियों को लड़ाने, इन सबसे तात्कालिक लाभ तो मिल सकता है लेकिन लोकतंत्र की जड़ें खोखली हो जाती हैं। ज्यादा समय इन बातों में न लगाकर नेतागण देश की ओर ध्यान दें तभी हम 2019 में एक स्वस्थ लोकतंत्र में स्वस्थ चुनाव होता देखेंगे।                                                 ---वकील अहमद

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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