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‘कारगिल युद्ध’ के सबक और पुनरावृत्ति की संभावनाएं

  • Updated on 7/26/2019

आज  कारगिल युद्ध विजय की 20वीं वर्षगांठ है। यह भी संयोग (Coincidence) ही है कि जब हम सभी इस गौरवपूर्ण क्षण का स्मरण कर युद्ध में अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सपूतों को नमन कर रहे हैं, तब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने स्वयं अपने देश की उस काली सच्चाई को सार्वजनिक किया है, जिसका खुलासा भारत बीते कई वर्षों से साक्ष्यों के साथ बार-बार शेष विश्व के समक्ष कर रहा है। 

हाल ही में इमरान खान अमरीका (America) दौरे पर रहे, जहां उन्होंने एक कार्यक्रम में स्वीकार करते हुए कहा, ‘पाकिस्तान के भीतर आज भी 30-40 हजार आतंकी (Terrorist) मौजूद हैं। इनमें से कुछ प्रशिक्षित आतंकी कश्मीर और अफगानिस्तान में लड़ रहे हैं। एक वक्त देश में 40 आतंकी संगठन सक्रिय थे लेकिन पिछले 15 वर्षों में पाकिस्तानी सरकारों ने यह बात अमरीका से छिपाई।’ अब इस अभिस्वीकृति से स्पष्ट है कि पाकिस्तान के वैचारिक और राजनीतिक अधिष्ठान की वास्तविक नीयत क्या है और क्यों किसी भी परिस्थिति में इस कपटी देश पर विश्वास करना हिमालयी भूल करने के समान है। 

यूं तो दोनों ही देश परमाणु संपन्न हैं, किंतु सतह पर भारत की आॢथक, सामरिक और कूटनीतिक ताकत के समक्ष पाकिस्तान बौना ही नजर आता है। ऐसे में कारगिल विजय की 20वीं वर्षगांठ के अवसर पर इस बात का आकलन करना भी स्वाभाविक है कि क्या दूसरा कारगिल संभव है? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें कारगिल युद्ध के इतिहास को खंगालना होगा। 

नवाज शरीफ की योजना
वर्ष 1997 में जब नवाज शरीफ पुन: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने, तब वह अपनी चिरपरिचित नीति के अंतर्गत सरकार और पाकिस्तानी सेना के बीच समन्वय को और मजबूत करना चाहते थे। इस कड़ी में उन्होंने पहले वर्ष 1998 में तत्कालीन सेनाध्यक्ष जहांगीर करामात को इस्तीफे के लिए विवश किया और इस नीयत के साथ अपने करीबी परवेज मुशर्रफ (मुहाजिर) को सैन्य कमान सौंप दी कि जब वह भारत के साथ संबंध सुधारने का प्रयास करेंगे, तब सेना पर उनका और उनकी सरकार का नियंत्रण रहेगा। क्या ऐसा हुआ?

यह अकाट्य सत्य है कि भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल में पाकिस्तान से मित्रता बढ़ाने के सच्चे प्रयास किए थे, जिसमें फरवरी 1999 में उनका बस द्वारा पंजाब के अमृतसर से लाहौर जाना ऐतिहासिक है। किंतु उसी कालखंड में पाकिस्तानी सेना ने खराब मौसम का लाभ उठाकर नियंत्रण रेखा पार करके खाली पड़ी भारतीय चौकियों पर कब्जा कर लिया। उसी वर्ष 3 मई को एक चरवाहे ने भारतीय सेना को कारगिल में पाकिस्तान सैनिकों के घुसपैठ कर कब्जा जमा लेने की सूचना दी थी। जब भारतीय सेना की एक छोटी टुकड़ी जानकारी लेने कारगिल पहुंची, तो शत्रु देश की सेना ने उन्हें पकड़ लिया और 5 की निर्मम हत्या कर दी। उस समय कारगिल की 18 हजार फीट की ऊंचाई में 5 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने घुसपैठ करके भारतीय चौकियों पर कब्जा जमा लिया था और वहां स्थित भारतीय सेना के गोला-बारूद भंडारण को नष्ट कर दिया था। 

इस पूरे घटनाक्रम से देश की राजनीति में उबाल आ गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी से विपक्षी दलों ने संसद में पूछ लिया, ‘आप तो दोस्ती का हाथ बढ़ाने गए थे, मगर क्या हुआ? आपके मित्र ने तो पीठ में छुरा घोंप दिया।’ इस पर अटल जी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, ‘कोई यह न समझे कि मैं हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाऊंगा। मित्रता मेरे देश की संस्कृति है, इसलिए प्रयास किए थे किंतु मेरी संस्कृति साम, दाम के साथ दंड और भेद भी सिखाती है।’ अटल जी के इस वक्तव्य के बाद कारगिल में जो कुछ हुआ, उससे इस्लामाबाद, रावलपिंडी आदि ही नहीं, पेइङ्क्षचग और वाशिंगटन तक में हड़कम्प मच गया। 

तत्कालीन राजग सरकार के निर्देश पर भारतीय थलसेना के बाद वायुसेना ने भी अपनी कार्रवाई प्रारम्भ कर दी। मिराज, मिग-27 और मिग-29 लड़ाकू जहाजों ने पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा कब्जाए क्षेत्र पर जमकर बमबारी की और आर-77 मिसाइलों से हमला किया। युद्ध में बड़ी संख्या में रॉकेट और बम का उपयोग किया गया था। एक आंकड़े के अनुसार, कारगिल युद्ध में करीब 2 लाख 50 हजार गोले दागे गए, 5 हजार बम दागने के लिए 300 से अधिक मोर्टार, तोपों और रॉकेट का इस्तेमाल किया गया था। बताया जाता है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद यही एक ऐसा युद्ध था, जिसमें दुश्मन देश की सेना पर इतनी बड़ी मात्रा में बमबारी की गई थी। 

पाकिस्तान घुसपैठ में मुजाहिद्दीन होने का दावा कर शेष विश्व की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास कर रहा था। किंतु भारतीय खुफिया अधिकारियों के सराहनीय कार्य के कारण पेइङ्क्षचग में बैठे तत्कालीन पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख परवेज मुशर्रफ और उच्च अधिकारी अजीज खान के बीच जिस प्रकार का रिकॉॢडड दूरभाषीय संवाद सामने आया, उसने स्पष्ट कर दिया कि घुसपैठ करने वाले कोई आतंकवादी नहीं, अपितु उसके अपने सैनिक थे, जिन्हें शीर्ष सैन्य नेतृत्व से आदेश मिल रहे थे।

पाक की चाल नाकाम 
पाकिस्तान चाहता था कि उस समय अमरीका जैसी बड़ी शक्तियां इस युद्ध को रोकने के लिए भारत पर संघर्ष विराम करने का दबाव बनाएं, ताकि कब्जाए क्षेत्रों पर उसकी सेना का नियंत्रण बरकरार रह सके। किंतु तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और भारतीय नेतृत्व की कूटनीति के समक्ष सब धराशायी हो गया। सबसे पहले मदद मांगने हेतु पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ  पेइङ्क्षचग पहुंचे, किंतु वहां उन्हें कोई सहारा नहीं मिला। अंतत: उन्होंने अमरीका की ओर रुख किया और 4 जुलाई 1999 को वाशिंगटन में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बिल किं्लटन से मिले और वह शांतिदूत बनने को राजी हो गए। किं्लटन युद्ध खत्म कराने का श्रेय बटोरना चाहते थे, इसलिए उन्होंने वाजपेयी को समाधान निकालने के लिए वाशिंगटन बुलाया, किंतु अटल जी ने न्यौता ठुकरा दिया। अमरीका ने दबाव के सारे उपाय अपना लिए, किंतु अटल जी अपने नाम के अनुरूप अटल रहे और अंतत: किं्लटन को नवाज को पीछे हटने के लिए दो टूक कहना पड़ा। 

जहां एक ओर भारतीय कूटनीति ऑडियो टेप और अन्य साक्ष्यों के साथ पाकिस्तान का असली चेहरा शेष विश्व के सामने ला रही थी, वहीं भारतीय सेना की मुंहतोड़ जवाबी कार्रवाई से घबराए पाकिस्तानी सैनिकों के पास कब्जाए क्षेत्रों से भागने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा था। भारतीय सपूतों के शौर्य, साहस और बलिदान से 14 जुलाई 1999 तक द्रास, टाइगर हिल, बालटिक, तोलोङ्क्षलग आदि क्षेत्र पुन: भारत के नियंत्रण में आ गए। तत्कालीन भारतीय नेतृत्व के कड़े रुख के कारण पाकिस्तान को किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मंच से भी कोई सहायता नहीं मिली। अंततोगत्वा पाकिस्तान को अढ़ाई माह चले युद्ध के बाद पीछे हटना पड़ा। 

हरकत नई नहीं थी
पाकिस्तान की यह हरकत नई नहीं थी। भारत के रक्तरंजित विभाजन के 2 महीने बाद अक्तूूबर 1947 और 1965 में भी वह भारत और ङ्क्षहदुओं के प्रति अपनी वैचारिक घृणा और अपनी जेहादी मानसिकता के अनुरूप कश्मीर पर हमला कर चुका था, जिसमें भी उसे मुंह की ही खानी पड़ी थी। यदि 1947 में तत्कालीन भारतीय नेतृत्व, कारगिल घटनाक्रम की भांति दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते और दूरदर्शी नीति अपनाते हुए कश्मीर से कबाइलियों के भेष में घुसे पाकिस्तानी सैनिकों को चुन-चुनकर सीमा से पूरी तरह बाहर निकाल देता, तो न ही कोई गुलाम कश्मीर (पी.ओ.के.) होता और न ही कश्मीर से संबंधित कोई समस्या होती। क्या सत्य नहीं कि 1947-48 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने अपने घोर साम्प्रदायिक मित्र शेख अब्दुल्ला के सुझाव पर बढ़ती हुई विजयी सेना को रोककर संघर्ष विराम की घोषणा कर दी थी? 

अब इस कॉलम के मूल प्रश्न की ओर लौटते हैं- क्या वर्तमान समय में कारगिल जैसा घटनाक्रम संभव है? यह सत्य है कि 1999 में तत्कालीन राजग-1 सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के कारण और प्रोटोकॉल के भंवर में फंसकर भारतीय जवानों और उनकी भावना को बांधकर रखा था और कारगिल युद्ध से सबक लेते हुए पाकिस्तान ने ‘युद्ध लडऩे के नए अवधारणा’ (एन.सी.डब्ल्यू.एफ.) सिद्धांत को अंगीकार किया है। किंतु एक अकाट्य सत्य तो यह भी है कि वर्तमान समय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत वाली भाजपा नीत राजग सरकार ने राष्ट्रहित, राष्ट्रीय सुरक्षा और सम्प्रभुता को लेकर वे अमिट लकीरें खींच दी हैं, जिनके उल्लंघन पर न केवल उचित जवाब दिया जाएगा, साथ ही आवश्यकता पडऩे पर दुश्मन की मांद में घुसकर उसे वांछित उत्तर देने से भी गुरेज नहीं किया जाएगा। पिछले 5 वर्षों के दौरान कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ ‘ऑप्रेशन ऑलआऊट’ के साथ बालाकोट में एयर स्ट्राइक और गुलाम कश्मीर में सॢजकल स्ट्राइक इसका मूर्तरूप है। 
स्वाभाविक रूप से पूरी दुनिया के साथ-साथ पाकिस्तान और उसके अधिष्ठान को भी ‘नए भारत’ का ज्ञान हो गया है कि यदि दूसरे कारगिल का दुस्साहस हुआ, तो आॢथक तंगी से बदहाल पाकिस्तान के लिए एक सीमित युद्ध का परिणाम भी 1947, 1965, 1971 और 1999 से कहीं अधिक घातक और भयावह होगा।

बलबीर पुंज
punjbalbir@gmail.com 

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