Wednesday, Jun 19, 2019

‘मौकापरस्त सियासत’ का शिकार मुस्लिम समाज के सामने सही उम्मीदवार चुनने की चुनौती

  • Updated on 4/15/2019

नई दिल्ली/रिजवान अंसारी। मौजूदा लोकसभा चुनावों (Lok Sabha elections,) में जहां बुनियादी मुद्दे गायब हैं वहीं मुस्लिम समाज (Muslim society) की भी अपनी समस्या है। न तो मुस्लिमों की सियासत में कोई खास भागीदारी है और न ही इनकी बुनियादी समस्याओं को कोई सुनने वाला है।

गौर करें तो, आजादी के बाद से मुस्लिमों में कोई भी बड़ा राजनीतिक नेतृत्व विकसित नहीं हो सका है। मुस्लिमों के साथ न कोई राजनीतिक दल और न ही कोई नेता मजबूती के साथ खड़ा हो सका। नतीजतन, मुस्लिम समाज प्रारंभ से ही सियासी दलों की ‘मौकापरस्त सियासत’ का शिकार रहा है। नाना प्रकार के वादे के साथ राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय दल मुसलमानों का इस्तेमाल एक वोट बैंक (vote bank) की तरह करते रहे हैं। इसी कारण सिलसिलेवार ढंग से मुस्लिमों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति खराब होती चली गई।

इतना ही नहीं, ये राजनीतिक भागीदारी में भी पिछड़ते चले गए। सशक्तिकरण के सबसे बड़े क्षेत्र राजनीति में मुसलमान इस कदर पिछड़े हैं कि 16वीं लोकसभा में महज 22 मुस्लिम सांसद ही संसद की दहलीज पर पहुंच सके, यानी प्रतिनिधित्व के लिहाज से बेहद निचले स्तर पर। जबकि देश के 46 लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं जिसमें 30 फीसदी या उससे अधिक मुस्लिम मतदाता हैं। 14.2 फीसदी आबादी वाले इस समुदाय का राजनीति में प्रतिनिधित्व महज चार फीसदी होना बेहद चौंकाता है।
ऐसे में बड़ा सवाल है कि मुस्लिमों की इस दयनीय स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार हैं?

बात राजनीतिक दलों की करें तो, खुद को सेक्युलर कहने वाले दलों ने मुस्लिमों के साथ सबसे ज्यादा नाइंसाफी की है।राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस (Congress), उत्तर-प्रदेश (UP) में सपा-बसपा (SP-BSP), बिहार (Bihar) में जदयू-राजद (JDU-RJD) ने मुस्लिमों की राजनीति कर सत्ता का सुख भोगा। चाहे लालू प्रसाद (Lalu Prasad) का मुस्लिम-यादव समीकरण हो या नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की मुस्लिमों में दलित वाली राजनीति, दोनों ही ने इसके सहारे सत्ता हासिल की। ये दोनों ही आज तक ‘न्याय के साथ विकास’ का दम तो भर रहे हैं, लेकिन पूरा लब्बोलुआब यह है कि मुसलमानों को अब भी न्याय का इंतजार है।

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इधर उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा भी मुस्लिमों का हिमायती बनने का दम भरते रहे हैं। मुस्लिमों के उत्थान के लिए दावे खूब किए जाते रहे। हालांकि, स्थिति थोड़ी सुधरी जरूर है, लेकिन ऐसा मालूम पड़ता है कि अगर पूरी ईमानदारी से कोशिश की गई होती तो स्थिति और बेहतर हो सकती थी। सच कहा जाए तो मुसलमानों को इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नजर नहीं आता। इसे और भी स्पष्ट तौर पर कहें तो मुस्लिम मतदाता हमेशा ही भाजपा को हराने के लिए वोट करते रहे हैं।

लिहाजा, मुस्लिमों की दयनीय स्थिति के पीछे वजह यह है कि मुस्लिम समुदाय ने कभी भी शिक्षा (Education), स्वास्थ्य (health), आर्थिक खुशहाली (economic prosperity) इत्यादि के लिए वोट किया ही नहीं, बल्कि हमेशा ही भाजपा (BJP) को हराने के लिए वोट किया। इसी का फायदा तथाकथित सेक्युलर पार्टियां उठाती रहीं और जानबूझ कर मुस्लिमों को हाशिए पर रखा। कड़वा सच है कि मुस्लिम समुदाय ने जानबूझ कर भाजपा को हराने और गैर-भाजपा दलों को जिताने के लिए वोट करना प्रारंभ कर दिया है। इस सोच की वजह है- मुस्लिम समुदाय और भाजपा के बीच की दूरियां और इस दूरी की वजह है- भाजपा की विचारधारा।

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भाजपा को भी समझना होगा कि हिंदुत्व की विचारधारा के साथ वह मुस्लिमों का साथ नहीं पा सकेगी। ऐसी विचारधारा, जिसमें मुस्लिम कहीं भी फिट नहीं बैठते, के साथ मुस्लिम नहीं जाना चाहते। मुस्लिम समाज चाहता है कि एक ऐसी विचारधारा हो जिसमें वाकई ‘सबका साथ सबका विकास’ की नीयत हो। वाकई एक ऐसी विचारधारा हो जिससे धर्मनिरपेक्षता जैसी भावना परावर्तित हो रही हो। दूसरे शब्दों में कहें तो भाजपा को मुस्लिमों का साथ पाने के लिए वाकई एक सेक्युलर पार्टी की तरह सामने आना होगा। ऐसे में सवाल है कि क्या सबको साथ लाने के लिए भाजपा राजनीति करने के तरीके में बदलाव ला पाएगी?

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