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चुनाव आयोग की बदइंतजामी का शिकार हैं बेचारे पोलिंग कर्मचारी, कोई नहीं सुनता

  • Updated on 5/14/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। लोकसभा चुनाव के छठे चरण में 12 मई को दिल्ली में हुई वोटिंग पोलिंग कर्मियों के लिए वाकई अग्नि परीक्षा से कम नहीं थी। खास बात यह है कि इस बार के चुनाव में पोलिंग स्टाफ चुनाव आयोग की बदइंतजामी का कुछ ज्यादा ही शिकार रहा। हैरानी की बात यह है कि कोई भी पोलिंग स्टाफ की तकलीफों को सुनने को तैयार नहीं होता है। उनकी जायज तकलीफों पर भी गौर नहीं किया जाता है। 

नवोदय टाइम्स ने पोलिंग से पहले और पोलिंग के दौरान चुनाव का इसका जायजा लिया और पोलिंग स्टाफ की दिक्कतों को समझने का प्रयास किया। गौर करने की बात यह है कि चुनाव के ऐलान के साथ ही टीचिंग स्टाफ के तो हाथ-पैर फूल जाते हैं। इसकी वजह है कि उन्हें ही चुनाव में सबसे पहले याद किया जाता है। स्कूल के प्रेशर के साथ चुनाव का जिम्मा उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ना की तरह होता है। महिलाएं और रिटायरमेंट के करीब पहुंच रहे कर्मचारियों की दिक्कतें तो चुनाव में कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती हैं। 

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नवोदय टाइम्स ने पोलिंग स्टाफ से बात की तो उन्होंने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर अपनी तकलीफों और वेदनाओं को जाहिर किया। दिल्ली स्कूल में महिला टीचर, जिन्होंने इस चुनाव में प्रिसाइडिंग ऑफिसर के तौर पर काम किया, ने बताया कि इस बार के चुनाव सबसे ज्यादा बदइंजामी के शिकार रहे। इसकी वजह है कि पोलिंग स्टाफ की ड्यूटी सुबह तड़के 4 बजे से लेकर देर रात के 4 बजे तक रही। कई कर्मचारियों को तो अगले दिन भी बुलाया गया। 

ऑफिसर ने बताया कि चुनाव से एक दिन पहले सवा लाख कर्मचारियों के सुबह दस बजे अक्षरधाम स्थित स्पोर्टस कॉम्पेक्स में बुलाया गया, लेकिन बदइंजामी का आलम यह था कि पार्किंग की सुविधा नहीं होने पर लोग घंटों ट्रेफिक में फंसे रहे। लोगों को अक्षरधाम मेट्रो के बाहर मैन रोड पर अपनी गाड़ी पार्क करनी पड़ी। 

एक अन्य स्फाफ का कहना है कि बात यहीं खत्म नहीं होती है। पोलिंग वाले दिन पोलिंग स्टाफ को सुबह तीन बजे से ही अपनी तैयारी करनी पड़ती है। कई लोग तो एनसीआर में रहते हैं, ऐसे में वे एक दिन पहले ही पोलिंग स्टेशन में रहने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में पोलिंग स्टाफ अपनी नींद भी पूरी नहीं कर पाता है। 

स्टाफ को सुबह चार बजे पोलिंग स्टेशन में पहुंचना होता है। ईवीएम-वीवीपैट लगाने के साथ अन्य तैयारियां भी करनी होती है। 6 बजे तक मॉक पोलिंग होती है। इसके बाद मतदान शुरू होता है और पोलिंग स्टाफ को बिल्कुल भी फुर्सत नहीं मिलती है। अभिनव (नाम पर्रिवर्तित) बताते हैं कि मतदान को दौरान हम लोगों का काम वीवीपैट की वजह से पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है।

इसकी वजह है कि ईवीएम मशीनों के साथ वीवीपैट भी आ गई है। ऐसे में जब वीवीपैट में कोई दिक्कत आती है तो दूसरी मशीन का जिम्मा भी पोलिंग स्टाफ पर आ जाता है। सफेद थेले के साथ ईवीएम-वीवीपैट का भार सोचने पर ही हालत खराब कर देता है। 

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पोलिंग स्टाफ में कार्यरत सविता (बदला हुआ नाम) का कहना है, चुनाव में महिला और बीमार कर्मचारियों की कोई नहीं सुनता है। इससे उनकी तकलीफें ज्यादा बढ़ जाती है। कोई भी उनकी जायज मांगों और तकलीफों पर गौर नहीं करता है। मजबूरन उन्हें अपनी रिश्तेदारों का सहारा लेकर काम करना पड़ता है। 

कंवेंस की सुविधा नहीं
चुनाव आयोग ने पोलिंग के दिन सुबह चार बजे बस और मेट्रो चलवा दी थी, लेकिन देर रात तक कोई सुविधा नहीं दी गई। अब पोलिंग स्टाफ या तो अपने वाहन या रिश्तेदारों या टैक्सी-ऑटो पर निर्भर रहे। टैक्सी-ऑटो तो मिलती ही नहीं थी। ऐसे में स्टाफ बेहद परेशान रहा। महिला कर्मचारी तो कंवेंस के लिए सबसे ज्यादा परेशान दिखीं। उन्हें अपने रिश्तेदारों पर ही निर्भर रहना पड़ा। 

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सामान जमा कराने में परेशानी
पोलिंग स्टाफ को सबसे ज्यादा दिक्कत चुनाव का सामना जमा करने में फेस करनी पड़ी। ईवीएम-वीवीपैट को जमा करने से पहले उसका कुपन लो, इसके लिए भी लंबी लाइन। फिर इसे जमा करने लिए अलग लाइन। इतना ही नहीं, अन्य दास्तवेजी सामान को जमा करने के लिए अलग लाइन। करीबन चार पांच लाइनों के बाद ही आप घर जाने लिए फ्री हो सकते हैं। इस बार हालात यह थे कि सुबह चार बजे तक भी लोग अपना सामान जमा करा रहे थे। कई स्टाफ को तो अगले दिन भी बुलाया गया।

मेडिकल सुविधा नहीं
हैरानी की बात यह है कि पोलिंग वाले दिन पोलिंग स्टाफ को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कई लोग बीमार और चोटिल भी हुए। पोलिंग स्टाफ को ईवीएम और वीवीपैट अक्षरधाम मेट्रो स्टेशन से पैदल ढोकर लानी पड़ी। इसकी वजह थी कि अंदर पार्किंग नहीं, बाहर ट्रेफिंग जाम। ऐसे में एक कर्मचारी तो मुंह के बल ईवीएम मशीनों के साथ सड़क पर ही गिर गया। चोट लगी, लेकिन मेडिकल सुविधा नहीं मिली। इसी तरह एक महिला कर्मचारी भी जल्दबाजी में मोंच का शिकार हो गई। 

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खाने की क्वालिटी खराब
चुनाव आयोग ने पोलिंग स्टाफ के लिए खाने का इंतजाम किया था, लेकिन इसकी क्वालिटी बेहद खराब थी। रोटी ठंडी रबड़ की तरह। चावल, दाल, कड़ी से ही लोगों को गुजारा करना पड़ा। कई कर्मचारी तो बिना खाए ही अपने घर को रवाना हो गए। देर रात तक काम में लगे स्टाफ को बासी खाने पर ही निर्भर रहना पड़ा। 

कविताओं में बयां हो रही वेदनाएं 
हैरानी की बात यह है कि पोलिंग स्टाफ की परेशानियों से चुनाव आयोग भी वाकिफ है, लेकिन करता कुछ भी नहीं है। यही वजह है कि पोलिंग स्टाफ खास तौर पर टीचिंग स्टाफ अपनी वेदनाओं और तकलीफों को टीचरों के वॉट्सऐप ग्रुप में तरह-तरह से शेयर कर रहे हैं। कोई कहानी के रूप में तो कोई कविता में। गौर करने वाली बात यह है कि पोलिंग स्टाफ की दिक्कतें राजधानी दिल्ली में जब अपार हैं, तो देश के दूर-दराज में क्या हाल होगा?

शिक्षक बनाम चुनाव-----------------

वो जो धीमे धीमे हाथ में सफ़ेद थैला लिए जा रहा है 
लोकतंत्र की रक्षा का भार कंधे पर धरे जा रहा है....

उसी पर तो इन दिनों सरकार का पूर्ण भरोसा है
वो कभी कोई ग़लती नहीं करेगा,उसीसे ये आशा है...

सरकारी महकमों में यही कौम गाय सरीख़ी होती है
किसी और महकमे की क़ौम मिर्च सी तीखी होती है

उन पर तो सरकार मजबूरी में ही हाथ डालती है
क्योंकि वो तो फ़ाइलों को भी कल पर टालती है

शिक्षक की कॉपी डायरी सब अप टू डेट रहती है
तब भी ये क़ौम अधिकारियों के ताने ही सहती है..

उसी सहनशक्ति की परीक्षा चुनावी ड्यूटी होती है
शिक्षक के कंधे पर बोझ रख राजनीती चैन से सोती है..

चुनावी घोषणा होते ही हमारा दिल ज़ोर से धड़कने लगा

बायीं या दायीं आँख का पता नहीं,अंग अंग फड़कने लगा

सुबह और शाम की पूजा में ये प्रार्थना भी शामिल हो गयी
स्कूल पहुँच के ड्यूटी पायी तो ये आस भी धूमिल हो गयी

कोई हमारी नहीं सुनता ,ये तो जग ज़ाहिर है
पर ये भगवान भी हमे धोखा देने में माहिर है!

ड्यूटी न आने की प्रार्थना पर कैसे मुस्काता था
भगवान तब तेरा वो रूप हमें कितना भाता था

जो प्रिंसिपल दारुण दुःख में भी छुट्टी नहीं देता है
चुनाव आयोग के सामने कितना बेबस होता है

अब तो शिक्षक सिर्फ़ फ़ोन पर सन्देश दिखाते हैं
उसी प्रिंसिपल से 'अभी जाओ' का आदेश पाते हैं

दुःख तो होता है ड्यूटी का , फिर भी धीरज धरते हैं
' चलो सबकी ड्यूटी आई है' सोच गहरी साँस भरते हैं

पहुँचे जब पंडाल में तो एक बिछड़ा साथी मिल गया
चुनाव आयोग से मेरा बैर कुछ क्षण को टल गया

एक दूसरे के सुख दुःख पूछते ट्रेनिंग भी हो गयी
मित्र की छोटी बच्ची उसकी गोद में ही सो गयी

'अक्कड़ बक्कड़'खेल कर पोलिंग पार्टी बनायीं गयी
किसी तरह'भानुमति' के कुनबे की ईंटें जुटाई गयी

यूँ हर कोई एक दूजे के लिए अजनबी था,अनजान था
पर अब तो एक टीम थे ,और सामने बिखरा सामान था

ज़मीन पर बैठ कर सामान की गिनती कर रहे थे
कुछ रह ना जाये, प्रिसाइडिंग इसी फ़िक्र में मर रहे थे

पोलिंग अफ़सर दो और तीन तो निरे बेफ़िक्रे थे
ये सब तो पोलिंग एक और पीठासीन के ठीकरे थे

सबसे ज़्यादा एक दूजे के लिए वही फिक्रमंद थे
वे दोनों मानो एक ही गीत के तुकांत छंद थे

दोनों मनाते थे कि सामने वाला समझदार हो
चुनाव के दिन का उसी पर दारोमदार हो...

सुबह चार बजे जब घर से शिक्षक बाहर निकलता है
उसकी बेबसी पर गली का कुत्ता भी नहीं भौंकता है

अँधेरी सड़कों पर पोस्टमॉर्टम से सफ़ेद थैले चमक रहे हैं
लोकतंत्र बचाने के स्तंभ, शिक्षकों के चेहरे दमक रहे हैं

राह चलते वो गाड़ी रोक औरों को लिफ़्ट देता है
इस तरह मानव दूजे को मानवीयता का गिफ़्ट देता है 

पोलिंग बूथ को बच्चे के घरौंदे-सा मनोयोग से सजाता है
कर्तव्यनिष्ठा में वो गुरु,शिष्य को भी लजाता है...

चौदह घंटे एक सीट पर भूखा प्यासा बैठा रहता है
तब भी मुस्कुराता है जब कोई मतदाता ऐंठा रहता है

मशीन जमा करवाने के लिए,बसों में ठूंसा जाता है
रहा सहा ख़ून भी जमा करवाते वक़्त चूसा जाता है

इस तरह शिक्षकों का चुनावी मेला हो ख़त्म होता है
उधर छह बजे के बाद नेताओं के घरों में जश्न होता है....

नेताओं के भक्त उनकी ज़ोरशोर से जै जैकार कर रहे हैं
उन्हें कोई नहीं जानता,जो इनके लिए24 घंटे से मर रहे हैं

अपना काम निकालने के बाद,सब वादे तोड़ देते हैं
चुनाव करानेवालों को आधी रात सड़क पर छोड़ देते हैं

इनके लिए रात्रि में कोई बस या मैट्रो सेवा नहीं चलती है
इस क़ौम को सरकार काम निकालने हेतु यूँ ही छलती है

रात के डेढ़ बजे हैं और मैं मदर्स डे के सन्देश पढ़ रही हूँ
कई मदर्स अभी भी सड़कों पर हैं,ये सोच शर्म से गढ़ रही हूँ
 

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