Monday, Jan 21, 2019

लारों की धुंध में ‘आशा-किरण’ की तलाश

  • Updated on 1/5/2019

लाखो लोगों की यह आशा आज की नहीं बल्कि तब से ही उनके मन में करवटें ले रही है जब भारत का विभाजन हुआ था। विभाजन से बने पाकिस्तान में हिंदुओं तथा सिखों के बहुत से ऐतिहासिक महान धार्मिक स्थल रह गए थे।

इनके दर्शनों की अभिलाषा तो सारे दुनिया में बसते दोनों भाईचारों के अनगिनत लोगों के मनों में हिलोरें मारती रहती है लेकिन जो पाकिस्तान से उजड़ कर भारत आ गए थे उनको तो इन पवित्र स्थानों से बिछडऩे का गम भी तड़पाता रहता है।

लोगों को अपनी जन्मभूमि से दूर होने की जितनी पीड़ा थी उससे कहीं अधिक गहरी टीस अपने गुरुओं, देवताओं के चरण स्पर्श वाली धरती से तोड़ दिए जाने की थी। उनको लगता था कि जैसे पूजनीय धर्म स्थल उनसे छीन लिए गए हों। इसी कारण लोगों के मनो से हूक उठती थी-‘साथों बाबा खो लेया तेरा ननकाना’।

गिनती के भारतीय ङ्क्षहदू-सिख हर वर्ष खास अवसरों पर वीजे लेकर पाकिस्तान में सजदा करने जाते हैं, गुरु घरों में नतमस्तक होते हैं तथा अरदास भी करते हैं कि परमात्मा ‘बिछड़े अस्थानों’ की सेवा-सम्भाल तथा दर्शनों का दान उन्हें बख्शें।

पिछले दिनों अजनाला के नजदीकी गांव बोहलियां में जरूरतमंदों को 489वें  ट्रक की राहत सामग्री बांटने के लिए ‘पंजाब केसरी’ समूह की टीम गई थी। उस दौरान क्षेत्र के बहुत से गांवों से गुजरने तथा उन्हें देखने का अवसर मिला। इस दौरान ही डेरा बाबा नानक तथा रावी दरिया के बांध पर जाने का मौका भी मिला, जहां नजदीक ही पाकिस्तान में श्री गुरु नानक देव जी से संबंधित गुरुद्वारा करतारपुर साहिब स्थित है।

जब इस गुरुद्वारा साहिब के दर्शनों के लिए ‘गलियारा’ खोले जाने की बातें पिछले दिनों छिड़ीं तो दोनों तरफ कुछ हलचल भी हुई तथा रंग-बिरंगे ‘बयान तथा लारे’ भी परोसे गए तो नानक नाम लेवा संगतों के मनों में दर्शनों हेतु मचलती इच्छा और बलवान हो गई। वे लारों की इस धुंध में ही ‘आशा-किरण’ की तलाश करने लगे।  

उल्लेखनीय बात यह भी है कि इन संगतों में केवल सिख ही नहीं, बड़ी गिनती में हिंदू तथा मुसलमान भी शामिल हैं जो पूरे सम्मान के साथ गुरु नानक साहिब के फलसफे को सिर झुकाते हैं। 

‘नदियों पार माही दा डेरा’
डेरा बाबा नानक की दीवारों के साथ बहती है रावी तथा उसके पार है वह अस्थान जहां श्री गुरु नानक देव जी ने देशों-विदेशों में 4 उदासियां करने के पश्चात 1522 में चरण रखे थे और फिर चोला त्यागने तक लगभग साढ़े 17 साल यहीं रहे। गुरु साहिब ने इस समय के दौरान खेती की और यहीं नाम जपने, किरत करने तथा बांट कर छकने (खाने) का संदेश दिया। 

प्श्न यह है कि क्या सचमुच यह गलियारा खुल जाएगा और संगतें गुरु घर के सामान्य की तरह दर्शन-दीदार कर सकेंगी? इस प्रश्न का उत्तर तो कहीं ‘लारों की धुंध’ में ही छुपा हुआ है। सीमा के दूसरी ओर वाले लोगों के बयान आपस में नहीं मिलते, वैसे मिलते इस ओर के लोगों के भी नहीं।

इसी से वे संदेह उपजते हैं जो लारों की धुंध को और घना ही कर रहे हैं। ऐसी हालत में लोगों की आशाओं को फल कब पड़ेगा और वे कब गुरुधामों के दीदार कर सकेंगे, इसका जवाब ‘धुंध’ में खोजना जरा कठिन है। 

रावी के बांध से ही होता है सजदा 
गलियारा कब खुलेगा, इस प्रश्न  के उत्तर की ङ्क्षचता किए बगैर लाखों संगतें रावी के बांध पर पहुंचती हैं और वहीं से गुरुद्वारा श्री करतारपुर साहिब को सजदा करके लौट जाती हैं। यहां बी.एस.एफ. वालों का कड़ा पहरा है, जो रावी अथवा गुरुद्वारा साहिब की फोटो खींचने या वीडियो बनाने से भी इंकार करते हैं।

बांध से पीछे स्थित क्षेत्र में संगतों के लिए एक विश्राम घर भी बना हुआ है, जहां 40-50 लोग बैठ सकते हैं और एक छोटा सा गुरुद्वारा भी है, जहां हर समय लंगर चलता रहता है। वहां घूम रहे एक निहंग सिख ने बताया कि जब भी समय मिले, वह बांध पर पहुंच कर दूर से ही गुरुद्वारा साहिब के दर्शन कर लेता है। सामान्य दिनों में हजार के करीब लोग इस जगह को देखने के लिए पहुंचते हैं, जबकि छुट्टी वाले दिन गिनती दोगुनी-तिगुनी हो जाती  है। 

डेरा बाबा नानक से रावी के बांध तक एक साधारण-सी सड़क बनी हुई है जिस पर संगतों द्वारा एक स्वागती गेट बनाया गया है। सरकारी स्तर पर इस स्थान पर किया गया कोई प्रबंध या हलचल कहीं नजर नहीं आती। केवल संगतों का उत्साह ही दिखाई देता है। हां, यह जरूर सुनने में आया है कि पाकिस्तान की ओर सड़क बनाने के लिए कुछ प्रयास किए गए हैं। इसके अतिरिक्त दोनों ओर चर्चाओं का बाजार जरूर गर्म है। 

मिट्टी में नसीब ढूंढते लोग
पाकिस्तान के साथ लगती सीमा के किनारे पंजाब के सैंकड़ों गांव स्थित  हैं और यहां रहते लोग लोगों का मुख्य धंधा खेतीबाड़ी ही है। गांवों में बहुगिनती किसानों तथा खेत मजदूरों की है। इनमें से कुछ युवक ही अच्छे पढ़े-लिखे हैं, बाकी तो कालेज के दरवाजे से पीछे ही रह गए।

अजनाला से डेरा बाबा नानक तक सभी सीमांत गांवों की तथा खेतों में फसलों की स्थिति लगभग एक जैसी ही है। कृषि अधिकतर गेहूं-धान के फसली चक्र तक सीमित है। किसी-किसी खेत में सरसों के पीले फूल तथा गन्ने दिखाई देते हैं। 

फसलों के मामले में एक बात अवश्य हैरानीजनक थी कि सीमांत पट्टी का क्षेत्र होने के बावजूद अधिकतर खेतों में किसानों ने धान की पराली को आग लगाए बिना गेहूं तथा अन्य फसलें बीजी हुई थीं।

यह एक अच्छा रुझान है तथा यदि पंजाब के सभी किसान यह राह अपना लें तो कई समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है। शेष पंजाब के मुकाबले कुछ पिछड़े हुए इस क्षेत्र के सर्वपक्षीय विकास के लिए सरकारों को खास प्रयास करने चाहिएं। 

                                                                                                                                         ---जोगिन्द्र संधू 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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