Thursday, Apr 15, 2021
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maharaj became the ruler of power in madhya pradesh i do not know when he fell albsnt

मध्यप्रदेश में सत्ता का माझी बने 'महाराज', पता नहीं कब गिरे किस पर गाज!

  • Updated on 7/2/2020

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर। अक्सर राजनीति को शह- मात का खेल कहा जाता है। एक तरफ महाराज और दूसरी तरफ शिवराज जब एक खेमे में हो जाए तो मध्यप्रदेश की राजनीति दिलचस्प हो जाती है। आज उसी मध्यप्रदेश (Madhyapradesh) की बात कर रहे है जहां 15 साल तक वनवास के बाद जब कांग्रेस पार्टी पूरे दमखम के बाद वापस लौटी और कमलनाथ के लिए तख्त सजाया गया।

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सिंधिया के कंधों पर सवार हुई बीजेपी

लेकिन उस समय मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया के कंधों पर सवार होकर ही कांग्रेस ने सत्ता तक छलांग लगाई। हालांकि जब रेवड़ियां बांटी गई तो महाराज के बढ़ते कद को भांप कर उसके पर को कतरने की चाल चली गई। ताकि गांधी परिवार के युवराज को महाराज भविष्य में टक्कर न दे सकें। कमलनाथ बहुत धूमधाम से सीएम भी बने। इस उम्मीद से अगले 5 साल तक वे ही राज्य के खेवनहार रहेंगे। हालांकि सिंधिया का भी इसके लिये मान- मनौव्वल किया गया। आखिर महाराज मान तो गए लेकिन भीतर-भीतर इसे अपने खिलाफ एक बड़ी साजिश को समझने में देर नहीं की।

Jyotiraditya Scindia

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कमलनाथ सरकार को गिराने में अहम भूमिका

लेकिन मध्यप्रदेश में सत्ता पलट चुकी है। कमलनाथ का तख्त कब धूल-धुसिरत हो चुका है। इसके भी नायक वहीं महाराज ही बने है जो कल तक बीजेपी के लिये किसी खलनायक की तरह सत्ता हाथ से छीन ली। इत्तेफाक कहिये कि कांग्रेस हो या बीजेपी सत्ता की सीढ़ी तक चढ़ने में सिंधिया के वजूद का ही इस्तेमाल किया। यह राजनीतिक घटनाक्रम दर्शाता है कि मध्यप्रदेश में जादू अगर किसी का चलता है तो वो सिंधिया का ही चलता है। वे इस पार रहे या उस पार मांझी तो महाराज ही रहेंगे।

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जब खेली जा रही थी होली कि...

जब देश रंगों से सरोबार था और कोरोना का साया अभी-अभी देश में बढ़ ही रहा था कि तभी मध्यप्रदेश की राजनीति में धमाका हुआ। देश भर में बीजेपी नेताओं से कार्यकर्ता तक झूम उठे। लेकिन कांग्रेस में मायूसी थी। हो भी क्यों न-उस दिन कांग्रेस से विदा ले रहे थे उसके महाराज- ज्योतिरादित्य सिंधिया जो बीजेपी में शामिल हो गए। हालांकि यह सच है कि मध्यप्रदेश में मची उठापटक में ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने खोने के लिये कुछ भी नहीं था। दरअसल जीत और हार तो बीजेपी और कांग्रेस की तय हो रही थी।

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सिंधिया की क्रिकेट में भी है रुचि

पार्टी के तौर पर दोनों राष्ट्रीय पार्टियों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई थी। इसलिये क्रिकेट में रुचि रखने वाले सिंधिया को पता था वे सिर्फ पिच पर जाएंगे और आक्रमाक होकर खेलेंगे तो वीरेंद्र सहवाग की तरह तिहरा शतक लगा सकते है। उन्होंने बस यहीं रणनीति बनाई कि पिच धीमा हो या तेज वे रक्षात्मक नीति अपनाते हुए सिर्फ अपना विकेट नहीं बचाएंगे बल्कि जब बारगेनिंग का समय आएगा तो सामने कोई भी दल हो खीर का पहला भोग तो उन्हें ही लगाना है। आखिर महाराज जो ठहरे।

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महाराज के सामने सब नतमस्तक

ठीक महाराज के जिद्द के सामने नतमस्तक होते हुए शिवराज ने जब कैबिनेट की विस्तार की तो चाहते हुए भी सिंधिया को आउट नहीं कर सकें। हालांकि उन्होंने भोपाल से लेकर दिल्ली तक खूब दौड़ लगाई लेकिन महाराज के शर्तों के आधार पर ही उन्हें सरकार चलाने की हरी झंडी भी केंद्रीय नेतृत्व से मिली। अब देखना है कि लंबे अर्से से चुप्पी साधे सिंधिया जब दिल्ली की राजनीति में फिर से एक बार प्रवेश करेंगे तो सामने दिग्गी राजा से लेकर युवराज को कितना जवाब देंगे? अब वैसे भी राज्य में उनकी पकड़ मजबूत हो चुकी है,अपने समर्थकों को कुर्सी पर बैठा चुके है तो अब मोदी-शाह के करीब कितने पहुंच पाते है- यह देखना दिलचस्प होगा।   
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