Wednesday, Oct 16, 2019
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बढ़ती हिंसा के दौर में गांधी के विचारों को आत्मसात करने की कितनी जरूरत

  • Updated on 10/2/2019

आर्थिक और तकनीकी विकास के पीछे भागती दुनिया और बढ़ती हिंसा के दौर में महात्मा गांधी के विचारों की विरासत को संजोए रखने की जिम्मेदारी कौन ले रहा है? बम धमाकों और मॉबलिंचिंग की घटनाओं से भरे अखबारों में गांधी के विचारों से प्रभावित किसी सकारात्मक खबर की खोज करना आज समय बर्बाद करने जैसा लगने लगा है। आज जब हम गांधी जी की 150वीं वर्षगांठ मना रहे तो क्या केवल उनके विचारों को महज दोहरा लेना पर्याप्त है या आज की और आने वाली पीढ़ी के लिए गांधी के विकास का मॉडल और अहिंसक प्रवृति को भी देश/ दुनिया के लोगों को अपनाना चाहिए।

प्रश्न बहुत बड़ा है, लेकिन उत्तर कौन देगा? कहां से मिलेगा? जिस महात्मा के नाम पर भारत देश को पूरी दुनिया में सम्मान मिलता है उन्हीं के देश में आज हिंसा, अपराध, धोखा, घोटाले रोज अखबारों और टीवी चैनलों की शोभा बढ़ा रहे हैं। गांधी के विचारों पर मंथन करने के साथ उनके विचारों को प्रत्येक को अपने जीवन में आत्मसात करने की उतनी ही जरूरत है जितनी बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण को रोकने और स्वच्छता अभियान चलाने की।

हमारे देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्वच्छता अभियान चलाने के लिए गेट्स फाउंडेशन ने ग्लोबल गोलकीपर अवार्ड से सम्मानित किया। ये पूरे देश के लिए गर्व की बात है। सफाई सिर्फ बाहर फैली गंदगी की ही नहीं, व्यक्ति के अंदर समाए बुरे विचारों की भी हो, तभी देश प्रगति कर सकता है। इस बात को भी समझना होगा। हमारे देश के बुद्धिजीवी आज आर्थिक मंदी और बढ़ते प्रदूषण पर चिंतन कर रहे हैं। अगर गांधी के विचारों का अनुसरण करते हुए खुद को राष्ट्रवादी और सच्चा देशभक्त कहने वाले नेताओं और सरकारी अधिकारियों ने विकास कार्य किए होते तो आज संकट थोड़ा कम होता या ये भी हो सकता है कि होता ही नहीं। इस बात को जितनी जल्दी इस मुल्क के रहबर समझ लें उनती जल्दी ये देश गरीबी, बेरोजगारी, बढ़ती हिंसा, अपराध से निजात पा जाएगा और तेजी से विकास करेगा।

गांधी के विचार आज ही नहीं जब तक इस दुनिया का अस्तित्व कायम है तब तक प्रासंगिक रहेंगे। इस बात को ये देश उनके विचारों और काम करने के तीरके का अनुसरण करके भी सिद्ध कर सकता है। यदि नहीं भी करता तो पूरी दुनिया के समक्ष एक दिन समय सिद्ध करेगा कि गांधी के विचारों का अनुसरण किया होता तो दुनिया तबाही की कगार पर खड़ी न होती।

भारत की विविधता इसकी पहचान है। विविधता में एकता का सबसे बड़ा उदहारण हुआ करता था ये भारत देश। मैने क्यों लिखा कि हुआ करता था, इस बात को सिद्ध आज के अखबार और टीवी चैनल करते हैं जो सांप्रदयिकता से भरी खबरों से आबाद हैं। जात-पात, धर्मांधता को दूर करने के लिए आजीवन प्रयासरत रहे गांधी के देश में आज उनके विचारों की विरासत को लोकतंत्र के मंदिर से तार-तार किया जा रहा है।

देश की संसद से चुने हुए नेता सांप्रदायिक नारे लगा रहे हैं। दिन भर उनके मूखर्तापूर्ण बयानों पर टीवी में डीबेट चल रही है। तो फिर आप इस देश के युवा से क्या उम्मीद कर रहे हैं, कि वो गांधी के विचारों पर चलेगा। आखिर कौन सी मिसाल आप लोगों ने उनके सामने रखी है कि वो गांधी के विचारों का अनुसरण करें? जिस देश में गांधी के हत्यारे को सम्मान दिया जाता हो, चुने हुए नेता ही गोडसे को देश भक्त बताए तो फिर गांधी जयंति मना कर क्या कर लेंगे आप? किसी भी हत्यारे का बचाव किस प्रकार किया जा सकता है? आत्मरक्षा में तो गोडसे ने गांधी को नहीं मारा था। निहत्थे अहिंसावादी राष्ट्रभक्त जिसने आजीवन देश की सेवा की हो उसके हत्यारे को कैसे सही साबित करेंगे आप?  और अगर आप ऐसा कर रहे हैं तो गांधी के नाम पर दुनिया से सम्मान बटोरना बंद कीजिए। 

लेखिका: कामिनी बिष्ट

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है। 

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