Saturday, Jan 22, 2022
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संक्रांतियों में सबसे महत्वपूर्ण है मकर संक्रांति, जानें क्यों

  • Updated on 1/14/2021

नई दिल्ली/ डा. हनुमान प्रसाद उत्तम। संक्रांति को सूर्य की गति का प्रतीक और सामथ्र्य माना गया है। जब पौष तथा माघ में सूर्य मकर राशि में आ जाता है तब उस दिन और उस समय को संक्रांति का प्रवेश काल कहा जाता है। यही संक्रांति मकर संक्रांति के नाम से जानी जाती है। अंग्रेजी महीनों में यह प्रतिवर्ष चौदह जनवरी को ही मनाया जाता है।

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विभिन्न राशियों में प्रवेश करता है सूर्य
बारह स्वरूप धारण कर आराध्य देव भगवान सूर्य बारह मासों में बारह राशियों मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन का संक्रमण करते हैं। उनके संक्रमण से ही संक्रांति होती है। संक्रांति को सूर्य की गति का प्रतीक और सामर्थ्य माना गया है। सूर्य का सामर्थ्य सात देवी मंदा, मंदाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, मंदोदरी, राक्षसी और मिश्रा के नाम से जानी जाती है। विभिन्न राशियों में सूर्य के प्रवेश को विभिन्न नामों से जाना जाता है।

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क्यों है मकर संक्रांति का विशेष महत्व?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 12 राशियां होती हैं। धनु, मिथुन, मीन और कन्या राशि की संक्रांति 'षड्शीति' कही जाती है। जब मेष और तुला राशि में सूर्य जाता है तो 'विषुवत संक्रांति' के नाम से जाना जाता है। कर्क संक्रांति को 'यामायन' और मकर संक्रांति को संक्रांति कहते हैं जो जनवरी में आता है। पुराणों के अनुसार षड्शीति (धनु, मिथुन, मीन और कन्या राशि की संक्रांति को षड्शीति कहते हैं) संक्रांति में किए गए पुण्य कर्म का फल छियासी हजार गुना, विष्णुपदी में लाख गुना और उत्तरायण या दक्षिणायन प्रारंभ होने के दिन कोटि-कोटि गुना ज्यादा होता है। समस्त संक्रांतियों में मकर संक्रांति का विशेष महत्व है क्योंकि तब सूर्य देव उत्तरायण में होते हैं।

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शायद उत्तरायण की इस महत्ता के कारण ही महाभारत में कौरव-पांडव युद्ध के दौरान भीष्म पितामह घायल होकर बाणों की शैय्या पर लेटे हुए अपनी मृत्यु का इंतजार कर रहे थे। भीष्म ने मकर संक्रांति अर्थात उत्तरायण की स्थिति आने पर ही माघ शुक्ल अष्टमी को अपने प्राण त्यागे। विद्वानों ने इस काल को शुभ बताते हुए उसे देवदान कहा है। सूर्य के उत्तरायण की महत्ता को छांदोग्योपनिषद में भी कहा गया है। जब पौष तथा माघ में सूर्य मकर राशि में आ जाता है तब उस दिन और उस समय को संक्रांति का प्रवेश काल कहा जाता है। यही संक्रांति मकर संक्रांति के नाम से जानी जाती है। अंग्रेजी महीनों में यह प्रतिवर्ष चौदह जनवरी को ही मनाया जाता है।

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दिन के समय में होती है बढ़ोतरी
भारतीय ज्योतिष में मकर राशि का प्रतिरूप घडिय़ाल को माना जाता है जिसका सिर हिरण जैसा होता है लेकिन पाश्चात्य ज्योतिर्विद मकर राशि का प्रति रूप बकरी को मानते हैं। हिन्दू धर्म में मकर (घड़ियाल) को एक पवित्र जीव माना जाता है।
मकर संक्रांति के दिन सूर्य की कक्षा में हुए बदलाव को अंधकार से प्रकाश की तरफ हुआ बदलाव माना जाता है। मकर संक्रांति से ही दिन के समय में बढ़ोतरी होती है। इसलिए भारतीय ज्योतिष की गणनानुसार मकर संक्रांति ही बड़ा दिन है। इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर प्रस्थान करता है और कांपते, ठिठुरते शीत पर धूप की विजय यात्रा आरंभ होती है। इस भांति प्रकाश में बढ़ौतरी होती है। लोगों को कामकाज के लिए अधिक समय मिलने लगता है। इसी पर एक कहावत प्रसिद्ध है : 

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भारत में कहते हैं 'खिचड़ी पर्व'
बहुरा के दिन लहुरा, खिचड़ी के दिन जेठ यानि भादों कृष्ण पक्ष चौथ (बहुरा चौथ) से दिन छोटा होने लगता है तथा मकर संक्रांति से दिन बड़ा होने लगता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति को पूरे भारत वर्ष में त्यौहार के रूप में मनाते हैं।
यह त्यौहार पूरे भारत वर्ष में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे 'खिचड़ी पर्व' कहते हैं। मकर संक्रांति के मौके पर गंगा-यमुना या पवित्र सरोवरों, नदियों में स्नान कर तिल-गुड़ के लड्डू एवं खिचड़ी देने और खाने की रीति रही है।

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इस दिन पतंग उड़ाना भी शुभ
लड़की वाले अपनी कन्या के ससुराल में मकर संक्रांति पर मिठाई, रेवड़ी, गजक और वस्त्रादि भेजते हैं। उत्तर भारत में नववधू को पहली संक्रांति पर मायके से वस्त्र, मीठा तथा बर्तन आदि भेजने का रिवाज है। गुजरात में संक्रांति के दिन तिल गुड़ खाने की परम्परा है साथ ही पतंगबाजी भी यहां खूब प्रचलित है। पतंग उड़ाना भी शुभ मानते हैं। गुजरात में प्रति वर्ष इस समय पतंग उत्सव का भी आयोजन किया जाता है।

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'पोंगल' मकर संक्रांति का ही प्रतीक
असम में 'भोगाली बिहू' तो तमिल लोग इसे 'पोंगल' के रूप में मानते हैं। सुख सम्पत्ति और संतान की कामना हेतु मनाया जाने वाला तमिलनाडु का त्यौहार 'पोंगल' मकर संक्रांति का ही प्रतीक है। लोगों के सांस्कृतिक जीवन के साथ पारंपरिक रूप से जुड़ा पोंगल ही एक ऐसा त्यौहार है जिसे मद्रास या चेन्नई (तमिलनाडु) के सभी वर्गों के लोग धूमधाम से मनाते हैं। उड़ीसा और बंगाल में इसे 'बिशु' कहते हैं तो उत्तराखंड में 'घुघुतिया' या 'पुसुडिया' के नाम से जाना जाता है।

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'प्रथम गंगा स्नान और द्वितीय दान'
सूर्य अर्चना के लिए मकर संक्रांति के दिन की और सारे माघ महीने की खास उपयोगिता है। त्यौहार धार्मिक आस्था के जीवंत प्रतीक होते हैं। इस पर्व पर दो बातें अत्यधिक उपयोगी होती हैं। प्रथम गंगा स्नान और द्वितीय दान। कहते हैं 'राजा हर्षवर्धन' प्रत्येक वर्ष इसी दिन अपनी महारानी के साथ गंगा तट पर जाते तथा अपना सब दान कर देते थे। इस दिन इलाहाबाद में 'संगम' पश्चिम बंगाल में 'गंगा सागर' और हरिद्वार में 'हर की पौड़ी' पर स्नान करने का विशेष महत्व है।

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भिक्षुओं को दान देने का रिवाज
शिव रहस्य शास्त्र में मकर संक्रांति पर तिल और सरसों के दान का उल्लेख विस्तार से मिलता है। अंगारों पर तिल चटकाना, तिल तथा तिल से बनी वस्तुएं दान करना इस अवसर पर शुभ माना जाता है। कई जगह इस पर्व को 'तिल संक्रांति' भी कहा जाता है। दाल और आटे के साथ काले तिल के लड्डुओं पर दक्षिणा रख कर ब्राह्मणों को दी जाती है। इसके साथ ही दाल और चावल की खिचड़ी में सब्जी पैसा तथा तिल के लड्डू डाल कर भिक्षुओं को भी दान देने का रिवाज है। मकर संक्रांति के दिन तुला दान और शैय्या दान दोनों को ही अक्षय फल देने वाला बताया गया है। माघ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को ‘मन्वंतर तिथि’ कहते हैं। उस दिन किया गया दान भी अक्षय होता है।

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