Sunday, Oct 17, 2021
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mamta will bring non-bjp parties on one platform: yashwant sinha musrnt

केंद्र में गैर भाजपा दलों को एक मंच पर लाएंगी ममताः यशवंत सिन्हा

  • Updated on 5/8/2021

नई दिल्ली /टीम डिजिटल। पश्चिम बंगाल में लगातार तीसरी बार ममता बनर्जी की सरकार बनवाने में अहम योगदान देने वाले तमाम लोगों में से एक चेहरा यशवंत सिन्हा का भी रहा। चुनाव से ठीक पहले उन्होंने तृणमूल कांग्रेस ज्वाइन की और अब पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का दायित्व निभा रहे हैं। चुनाव बाद पश्चिम बंगाल में शुरू हुई हिंसा की घटनाओं, ममता बनर्जी की भविष्य की राजनीति और बंगाल में विकास की नई दिशा की रणनीति पर नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी के अकु  श्रीवास्तव के साथ यशवंत सिन्हा ने विशेष बातचीत की। वे देश के वित्तमंत्री और विदेश मंत्री और भाजपा के बड़े नायक के रूप में रहे हैं। प्रस्तुत है बातचीत का प्रमुख अंश:-

ममता बनर्जी की इस जीत को किस तरह से देख रहे हैं?
पहली बात, पश्चिम बंगाल चुनाव के कुछ महीने पहले मैंने टीएमसी में शामिल होने का फैसला लिया और ममता जी से बात की। इसके बाद शामिल हुआ। इसके पीछे यह संदेश देने की मंशा थी कि पश्चिम बंगाल में लोग टीएमसी छोड़ ही नहीं रहे हैं, जुड़ भी रहे हैं। जैसा कि भाजपा वहां माहौल बना रही थी। वह यह हथकंडा दूसरे राज्यों में भी अपनाती रही है और चुनाव से ठीक पहले दूसरे दलों में तोडफ़ोड़ करती रही है। उसी प्रवाह को रोकने के लिए मैंने तय किया कि टीएमसी में रह कर योगदान करूं।

दूसरी बात, टीएमसी और ममता जी की जीत बहुत शानदार है। किसी ने भी इतनी बड़ी जीत की कल्पना नहीं की थी। किसी एक्जिट पोल ने भी नहीं बताया था। मेरा भी अनुमान था कि टीएमसी को 160 से 180 सीटों के बीच मिलेंगी। पिछले तीन महीने से बंगाल में आदर्श आचार संहिता लागू है, तो एक तरह से शासन, लॉ एंड ऑर्डर सब चुनाव आयोग के पास था। नतीजा आया लेकिन शपथ ग्रहण नहीं हुआ। एक तरह से यह संध्या काल की बेला थी। इसी दौरान हिंसा हुई। हिंसा नहीं होनी चाहिए। हम इसकी भत्र्सना करते हैं। शोर बहुत मचा कि टीएमसी के गुंडे भाजपा कार्यकर्ताओं को मार रहे हैं। जबकि जो वीडियो सामने आए, वे पहले के हैं और मौतें भी बढ़ा चढ़ा कर बताई गईं। सौगत राय को मैंने सुना कि चार भाजपा और तीन टीएमसी के लोग मारे गए। 

क्या यह संभव है कि विपक्ष के लोग सत्ता पक्ष के लोगों को मारें?
क्यों नहीं। यह हो सकता है। भाजपा वहां एक ताकत तो बन कर उभरी ही है। 77 सीटें जीती है। हिंसा हुई है इसलिए बार-बार जोर देकर कह रहा हूं कि इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। सच्चाई सामने आएगी। 2019 लोकसभा चुनाव में बड़ा झटका खाने के बाद ऐसी क्या रणनीति रही, जिसकी वजह से टीएमसी ने अप्रत्याशित जीत दर्ज की?

एक बात मैं कहूंगा कि भाजपा बहुत शोर मचाती है। देश का प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से कहता है कि दीदी हार गईं। पीएम और गृहमंत्री के पास केवल पार्टी से ही सूचना नहीं आती। उनके पास खुफिया विभाग से भी तो रिपोर्ट मिलती है। पीएम और होम मिनिस्टर को तो खुफिया विभाग सही रिपोर्ट दे रहा था। फिर भी शोर मचा रहे थे कि 200 से ज्यादा सीटें जीत रहे हैं। दीदी ओ दीदी....दीदी हार गईं... ऐसी तमाम बातें कही जा रही थीं। जो माहौल बनाया उसी का नतीजा रहा कि भाजपा तीन से 77 सीट तक पहुंची।

लेकिन जिस तरह का माहौल खड़ा किया गया, उसके आधार पर यह उनकी बुरी हार मानी जाएगी। दूसरी तरफ, ममता बनर्जी को पिछली बार 211 सीटें मिली थीं। इस बार 213 मिलीं। धु्रवीकरण हुआ। कुछ पॉकेट में इसका असर हुआ। भाजपा के उम्मीदवार जीते। लेकिन पश्चिम बंगाल के परिप्रेक्ष्य में देखें तो भाजपा की अपेक्षानुरूप धु्रवीकरण नहीं हुआ। लोगों ने बंगाली अस्मिता को तरजीह दी और टीएमसी को वोट किया।

ध्रुवीकरण के आरोप तो दीदी पर भी लगते रहे। उन्होंने मुस्लिमों को एक होने को कहा। कितनी सच्चाई देखते हैं?
 ध्रुवीकरण खूब चला। जय श्रीराम का नारा, हिंदू-मुसलमान किया गया। अल्पसंख्यकों के बीच में भी बहुत सी ताकतें थीं, जिन्हें विभाजित करने की कोशिश की गई। ममता ने अगर उस स्थिति में अल्पसंख्यकों को एकजुट होने की अपील की तो भाजपा के सामने इतना कहना जरूरी था कि वे अपना वोट बंटने नहीं दें। लगता है कि अल्पसंख्यकों ने इसे अच्छी तरह से समझा।
 

आखिर ऐसा क्या हुआ कि वामपंथियों का पूरा किला ध्वस्त हो गया?
यह आश्चर्यजनक है। प्रशांत किशोर ने कहा था कि भाजपा 100 के नीचे ही रहेगी। मैंने 53 का आकलन किया था। 77 सीटें आ गई तो 34 सीटों का अंतर आया। लेफ्ट और कांग्रेस को 20-25 सीटें मिल जाती तो भाजपा को 77 से कम सीटें आती। उनका सफाया होना ताज्जुब वाली स्थिति है।

केंद्र में विपक्ष के लिए दीदी कोई बड़ी जगह या स्थान बनाते दिख रही हैं? इसे लेकर क्या कोई रणनीति है?
मैं इस बात से सहमत हूं कि भारी जीत के बाद ममता जी पर राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी है। और उन्हें इसका निर्वहन करना चाहिए। यह कैसे होगा, इस पर काम करना होगा। अभी बहुत से राज्य हैं, जहां गैरभाजपा दलों की सत्ता है। केंद्र से उन्हें पर्याप्त सहयोग नहीं मिल रहा है। उसमें मुख्यमंत्रियों के स्तर पर एक अभियान चलाना चाहिए। दूसरा, राजनीतिक है, जिससे सभी गैरभाजपा दलों को साथ एक मंच पर लाने का काम करना होगा। न चाहते हुए भी ममता जी को यह करना 
ही होगा।

नया कोलकाता बनाने की दीदी की अब रणनीति क्या होगी?

इस विषय पर हमारी अभी ममता जी से विस्तार से बात नहीं हुई है। लेकिन जिस तरह का जनाधार मिला है तो उनका मकसद सभी को साथ लेकर चलने का होना चाहिए और विकास की ऐसी योजना बनानी होगी, जिसमें पूरा बंगाल समाहित हो सके। विकास की रणनीति बनाते समय यह ध्यान देना होगा कि हर क्षेत्र की भिन्न- भिन्न समस्या होती है। 

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