Thursday, Apr 02, 2020
manmohan singh  economy narendra modi nirmala sitharaman congress

मनमोहन का मोदी सरकार पर हमला, बोले- सरकार 'मंदी' शब्द को नहीं करती स्वीकार

  • Updated on 2/19/2020

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। अर्थव्यवस्था (Economy) की स्थिति को लेकर मोदी सरकार (Modi Government) को सवालों के घेरे में लते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह (Manmohan singh) ने बुधवार को कहा कि मौजूदा सरकार 'मंदी' शब्द को स्वीकार ही नहीं करती और वास्तविक खतरा यह है कि यदि समस्याओं की पहचान नहीं की गयी तो सुधारात्मक कार्रवाई के लिए विश्वसनीय हल का पता लगाए जाने की संभावना नहीं है।        
कोरोना वायरसः चीन के कपड़ा उद्योग पर पड़ा असर, भारत उठाएं फायदाःकपड़ा सचिव

पुस्तक विमोचन में कही बात
मोंटेक सिंह अहलूवालिया की पुस्तक  'बैकस्टेज' (Backstage)  के लोकार्पण के मौके पर लोगों को संबोधित करते हुए, सिंह ने कहा कि योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष ने संप्रग सरकार के अच्छे बिंदुओं के साथ ही उसकी कमजोरियों के बारे में भी लिखा है। पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा, मुझे लगता है कि इन मुद्दों पर बहस होगी और इस पर चर्चा होनी चाहिए क्योंकि आज ऐसी सरकार है जो मंदी जैसे किसी शब्द को स्वीकार नहीं करती है। मुझे लगता है कि यह हमारे देश के लिए अच्छा नहीं है। 
ट्रंप के स्वागत के लिए क्रिकेट स्टेडियम तैयार, PM मोदी के साथ करेंगे जनसभा को संबोधित

हल मिलने की है संभावना
उन्होंने कहा, ‘यदि आप उन समस्याओं की पहचान नहीं करते जिनका सामना आप कर रहे हैं, तो आपको सुधारात्मक कार्रवाई के लिए विश्वसनीय हल मिलने की संभावना नहीं है। यह असली खतरा है। सिंह ने कहा कि यह पुस्तक देश के विकास के लिए बहुत मददगार होगी।    
महाराष्ट्र: सहकारी बैंक में हुआ घोटाला, 512 करोड़ का हुआ हेर-फेर

पूर्व सरकारों की सराहना की
सिंह ने 1990 के दशक में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण में उन्हें समर्थन देने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव (P. V. Narasimha Rao) , पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम और अहलूवालिया द्वारा निभाई गई भूमिका की सराहना की और वह विभिन्न तबकों के प्रतिरोध के बावजूद सुधारों को पूरा करने में सफल हो सके।    

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करें।हर पल अपडेट रहने के लिए NT APP डाउनलोड करें। ANDROID लिंक और iOS लिंक।
comments

.
.
.
.
.