Thursday, Oct 28, 2021
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काम में झलकती थी IITian की योग्यता, भुलाया नहीं जा सकता सैन्य सर्विसेज के लिए पर्रिकर का योगदान

  • Updated on 3/18/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। मनोहर पर्रिकर एक ऐसा संवेदनशील और सरल व्यक्तित्व थे, जो जूनियर से भी जूनियर और सीनियर से भी सीनियर व्यक्ति की बात बड़े ध्यान से सुनते थे। बतौर रक्षा मंत्री जब उन्होंने पद भार संभाला तो सबसे ज्यादा सेना में मानव संसाधन विभाग पर ध्यान दिया।

कर्मचारियों और पूर्व सैन्य कर्मियों की समस्याओं के समाधान पर जोर दिया। उनकी हर कोशिश होती कि जो व्यक्ति, कर्मचारी उनसे मिलने आया है, उसकी समस्या का तत्काल समाधान हो। तत्काल समाधान निकलने की गुंजाईश नहीं है तो वह तरीका वे ढूढ़ते जिससे जितनी जल्दी हो सके, उस व्यक्ति को राहत मिल जाए, ताकि उसे दफ्तरों का चक्कर न काटना पड़े। 

पर्रिकर की दूरदर्शिता और मेहनत ही थी जो पूर्व सैन्य कर्मियों को वन रैंक, वन पेंशन (ओआरओपी) मिल सका। उन्होंने इसके लिए दिन-रात काम किया। आज ओआरओपी को केंद्र की मोदी सरकार अपनी उपलब्धि के रूप में गिनाती है। इसके लिए रक्षा मंत्रालय के मानव संसाधन विभाग के साथ पर्रिकर ने कई कई दौर की बैठकें की। बैंक वालों को बुलाते और उनके साथ बैठकें करते। पूर्व सैनिकों और सैनिकों की विधवाओं की पेंशन की समस्या को खत्म कराया। आज पेंशन संबंधी समस्या लगभग न के बराबर है। पहले पेंशन बनवाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काट काट कर सैनिक परिवार थक जाया करता था। सैन्य सर्विसेज के लिए उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

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नेशनल वार मेमोरियल वर्षों से लंबित था, उसे स्वरूप देने का काम पर्रिकर के ही कार्यकाल में शुरू हुआ। 2014 से 2016 के बीच उन्होंने इस प्रोजेक्ट को पूरा कराने में अहम भूमिका निभाई। हाल ही में नेशनल वार मेमोरियल का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। रक्षा सर्विसेज में उनका सबसे अहम काम सर्विस से जुड़े कोर्ट केस को कम करने या खत्म करने को लेकर था। उनका कहना था कि सर्विसेस संबंधी लिटिगेशन खत्म किए जाएं।

कोर्ट तक केस जाने की बजाए विभागीय स्तर पर उनका समाधान किया जाए। उन्होंने अपने रहते अधिकांश लिटिगेशन खत्म कराने की कोशिश की और कर्मचारियों की मदद की। छोटे से छोटे स्तर के कर्मचारी से मिलने में उन्होंने कभी कोई हिचक नहीं महसूस की। वे बार्डर पर सैनिकों के बीच जाते और उन्हें उत्साहित करते। उनकी समस्याओं को सुनते और उनकी जरूरतों को पूरा कराने की व्यवस्था बनाते। 

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एक आईआईटियन होने के चलते उनके कामकाज में भी उनकी यह योग्यता झलकती। वे किसी भी विषय की गहराई में जाते थे और तकनीकी सोच के साथ उसमें सुधार करने का सुझाव देते। एम्पलाईज कांट्रीब्यूशन फंड उन्हीं का इनीसिएटिव था। यह फंड आज पूर्व सैनिकों और उनकी विधवाओं या डिपेंडेंट के लिए एक अहम मददगार बन चुका है। पहली बार पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक के वक्त भी पर्रिकर जी ही रक्षा मंत्री थे। उस रात वे इसकी पूरी निगरानी करते रहे थे। लेकिन इसके पहले सेना के उस अभियान के बारे में उन्होंने गहराई से जानकारी ली। उनकी कोशिश यही रही कि अभियान को पूरा करने के बाद हर सैनिक सकुशल वापस लौटे।                                                                                

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