Monday, Dec 06, 2021
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B'day Special: क्रिकेट के मैदान से मोहब्बत की गलियों तक कुछ ऐसा रहा 'टाइगर पटौदी' का सफर

  • Updated on 1/4/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। सैफ अली खान के बेटे तैमूर आएदिन सुर्खियों में बने रहते हैं, लेकिन आज हम तैमूर की नहीं बल्कि उनके दादा महान क्रिकेटर मंसूर अली खान पटौदी की बात करेंगे, जिनका आज जन्मदिन है। 5 जनवरी 1941 को भोपाल में जन्मे मंसूर अली खान पटौदी भारत के उन चंद क्रिकेटरों में से एक थे जिनके मैदान पर आते ही विपक्षी टीम के पसीने छूटने शुरू हो जाते थे। उन्हें भारत के सबसे सफलतम कप्तानों में गिना जाता है।

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एक आंख के बावजूद चौके छक्कों की करते थे बरसात
पटौदी के एक शानदार और आक्रामक बल्लेबाज होने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक आंख(बाईं) से दिखाई देने के बावजूद वह मैदान पर चौके-छक्कों की बरसात कर देते थे। बेहद कम उम्र में ही उनकी एक आंख की रोशनी चली गई थी।

  • महज 21 साल में वह भारतीय टीम के कप्तान बन गए थे।
  • मैदान पर केवल आक्रामक शैली में खेलना उनकी पहचान थी।
  • प्यार से लोग उन्हे टाइगर पटौदी कहकर बुलाते थे।
  • उनकी अगुवाई में टीम इंडिया ने 1967 में न्यूजीलैंड को टेस्ट सीरीज में उसी की धरती पर हराया था। साल 1961 में उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ अपना टेस्ट डेब्यू किया था।
  • टेस्ट डेब्यू से महज 6 माह पहले उनकी आंख एक हादसे की वजह से खराब हो गई थी, लेकिन उनके हौंसले बुलद थे जिसकी वजह से उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट डेब्यू किया।
  • उन्होंने कुल मिलाकर 46 टेस्ट मैच खेले और 6 शतकों की मदद से कुल मिलाकर 2,793 रन बनाए।

पहली मुलाकात में ही शर्मिला के हो गए थे पटौदी

खेल से इतर पटौती की लव लाइफ कुछ कम रोचक नहीं थी। उनकी शादी अभिनेत्री शर्मिला टैगोर से हुई थी। पटौदी ने माना था कि दिल्ली में हुई पहली मुलाकात में ही वो शर्मिला को अपना दिल दे बैठे थे। शर्मिला के दिल में मोहब्बत का बीच बोने के बावजूद उनकी आगे की राह कांटों से भरी थी। क्योंकि दोनों के धर्म अलग थे।

Navodayatimesलेकिन मोहब्बत तो मोहब्बत होती है जनाब भले चाहे इसके लिए कोई भी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े। तमाम दीवानों की तरह शर्मिला को भी पटौदी के लिए कुर्बानी देनी पड़ी। पटौदी से शादी करने के लिए उन्हें अपना धर्म बदलना पड़ा था और साल 1969 में दोनों एक दूजे के हो गये।

राजनीति में भी आजमाया हाथ
पटौदी ने अपनी शर्तों पर जीवन जिया। उन्होंने राजनीति में भी हाथ आजमाया लेकिन यहां वह असफल रहे। उन्होंने कांग्रेस की तरफ से भोपाल से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए।

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जाते-जाते अपनी आंख दान कर गए पटौदी
अपनी एक आंख गवांने वाले पटौदी इस बात से बखूबी वाकिफ थे कि आंख न होने की वजह से व्यक्ति को किन हालातों से गुजरना पड़ता है। शायद इसी वजह से उन्होंने दुनिया से विदा लेते समय अपनी आंख दान करने का फैसला किया। 22 सितंबर 2011 ही वो दिन था जब टाइगर पटौदी ने फेफड़ों में संक्रमण की वजह से इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 

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