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धरतीवासियों को आकर्षित करता मंगल

  • Updated on 7/29/2019

पिछले  हफ्ते हमने चंद्रयान-2 (Chandrayaan-2) को देखा और उसी दौरान मैंने मंगल ग्रह के बारे में भी चर्चा की थी। मैंने सोचा  कि पाठकों के लिए यह जानना रुचिकर होगा कि इस मामले में दुनिया के बाकी हिस्सों में क्या हो रहा है। अगले वर्ष मंगल ग्रह पर विभिन्न एजैंसियों द्वारा 4 मिशनों की योजना है। इतने सारे एक साथ क्यों? इसका कारण यह है कि मंगल और पृथ्वी 26 महीने में एक बार सबसे अधिक नजदीक आ जाते हैं क्योंकि दोनों अलग-अलग कक्षाओं में सूर्य के इर्द-गिर्द घूमते हैं, मंगल कई बार हमसे 40 करोड़ किलोमीटर तक दूर होता है।  नजदीक आने पर यह 4 करोड़ किलोमीटर से भी कम दूरी पर होता है। जाहिर तौर पर यही वह संवेदनशील समय होता है जब इस ग्रह की ओर रॉकेट लांच किया जा सकता है और इस तरह का अगला समय जुलाई 2020 में आ रहा है।

 17 जुलाई को अमरीका (America) का कार के साइज का मार्स रोवर उड़ान भरेगा। उसके 8 दिन बाद रूसी-यूरोपियन मिशन जिसका नाम अंग्रेज कैमिस्ट के नाम पर रोसालिंड फ्रैंकलिन रखा गया है, उड़ान भरेगा। ये दोनों संभवत: फरवरी 2021 में मंगल ग्रह पर उतरेंगे। ये वहां पर प्रयोग करेंगे और जीवन की संभावनाएं तलाशेंगे। 

चीन भी इसी समय एक आर्बिटर (अर्थात ऐसा सैटेलाइट जो मंगल की परिक्रमा करे) तथा एक रोवर, अर्थात एक ऐसा यंत्र जो वहां उतरेगा, लांच करेगा। इस समय 6 आर्बिटर हैं जिनमें से तीन अमरीका के नासा के,  2 यूरोप के तथा एक भारतीय आर्बिटर है। इसके अलावा मंगल पर 2 आप्रेशनल रोवर  हैं जोकि नासा से हैं। चौथा मिशन संयुक्त अरब अमीरात का है और वह इसे मंगल पर ले जाने के लिए जापानी रॉकेट (Rocket) का इस्तेमाल करेगा। 

मंगल में रुचि का कारण
मंगल को लेकर इंसान की रुचि सिर्फ वैज्ञानिक (Scientist) नहीं है। वर्तमान में कुछ ऐसे लोग हैं जो मंगल ग्रह पर स्थायी बस्ती बसाना चाहते हैं। इसके पीछे तर्क है कि जलवायु के मामले में मंगल धरती से काफी मिलता-जुलता है। इसका अपना जलवायु है जोकि लगभग पूरी तरह से कार्बन डाईआक्साइड से बना है। यहां पर साढ़े 24 घंटे का दिन होता है जोकि लगभग धरती के दिन के बराबर है। यह धरती से लगभग आधा है और इसका गुरुत्वाकर्षण भी पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से लगभग आधा है जोकि धरती के इंसानों के लिए परिचित होगा। धरती पर 50 किलो भार वाले  व्यक्ति का भार मंगल पर 20 किलो से कम रह जाएगा। 

सौर प्रणाली (The Solar System) के अन्य ग्रह धरती (Earth)से बहुत भिन्न हैं। वे सूर्य से काफी दूर हैं और इसलिए काफी ठंडे हैं। बृहस्पति जैसे कुछ ग्रह बहुत बड़े तथा बहुत अधिक गुरुत्वाकर्षण शक्ति वाले हैं। कुछ ग्रहों का जलवायु जहरीला है। 
मंगल पर बर्फ के रूप में पानी मौजूद है और चूंकि यहां पर कार्बन डाईआक्साइड है इसलिए वहां पर उपलब्ध सामग्री से हाइड्रो कार्बन अर्थात प्लास्टिक बनाना संभव है। अंतरिक्ष यात्रा की एक अन्य समस्या ईंधन की है और अब ऐसे रॉकेट बनाए जा रहे हैं जो मीथेन और तरल ऑक्सीजन से ऊर्जा प्राप्त करेंगे जोकि दोनों मंगल पर पैदा की जा सकती हैं। 

कुछ ऐसे लोग भी हैं जो आज मंगल (Mars) को बसने योग्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि वे लोग इस ग्रह को धरती की तरह बनाने का प्रयास कर रहे हैं जिसकी जलवायु  हमारी तरह होगी और जिसके धरातल पर हरियाली होगी। यह इतना असंभव नहीं है जितना कि लगता है और बहुत से लोगों का मानना है कि यह ज्यादा मुश्किल बात नहीं है। हालांकि इसमें समय लगेगा। पौधों और सब्जियों को ज्यादातर सूर्य की रोशनी और कार्बन डाईआक्साइड (Co2) की जरूरत होती है और ये दोनों ही वहां पर उपलब्ध हैं। तीसरी जरूरी चीज  भूमि में न्यूट्रीएंटस का होना है जोकि आसानी से डाले जा सकते हैं। ऐसा करने से ऑक्सीजन पैदा होगी जोकि मानव के लिए जरूरी है। इन्हीं कारणों से मंगल हमेशा इंसान (Human) के आकर्षण का लक्ष्य रहा है तथा इसी कारण मंगल (Mars) पर गहरी रुचि दिखाते हुए वहां अनेक मिशन भेजे जाते हैं। 

स्पेस एक्स ने किए बड़े काम
नासा और इसरो के विपरीत स्पेस एक्स एक प्राइवेट कम्पनी है जोकि  मंगल पर पहुंचने और यहां पर बस्ती बसाने की योजना तथा महत्वाकांक्षा के मामले में काफी आगे है। यह कम्पनी केवल 17 साल पुरानी है लेकिन इसके बावजूद उपग्रह लांच करने में यह  दुनिया भर में सबसे आगे है। वर्तमान में यह मीथेन और तरल ऑक्सीजन से चलने वाले इंजनों का परीक्षण कर रही है और संभवत: अगले वर्ष (Next Year) तक यह इनका पूरा डिजाइन तैयार कर लेगी। इसके अलावा यह कम्पनी चीजों के दोबारा इस्तेमाल करने के मामले में भी अग्रणी है, अर्थात रॉकेट के वह हिस्से जिनमें ईंधन होता है और जो इसे कक्षा में ले जाते हैं तथा जिन्हें आमतौर पर छोड़ दिया जाता है। स्पेस एक्स दुनिया का एकमात्र ऐसा संगठन है जो इन्हें सुरक्षित वापस लांचिंग पैड (Launching Pad) पर उतार सकता है (आप उसके  कुछ हैरतअंगेज काम यू-ट्यूब पर देख सकते हैं) उन्होंने दुनिया में सर्वाधिक क्षमता वाले रॉकेट भी विकसित कर लिए हैं। उनकी रणनीति मंगल पर जहाज में 100 टन भार ले जाने की है। इसका अर्थ यह है कि अगस्त 2022 में और अधिक लांच देखने को मिलेंगे जो अधिक पेचीदा और बड़े होंगे तथा जिनका मकसद इंसान को मंगल पर भेजना होगा। 

बेशक यह सवाल सामने आता है कि मंगल पर किसका अधिकार है। देशों का अथवा कम्पनियों का या हम सब का। समय पर इन सब प्रश्नों का उत्तर देना होगा क्योंकि इस क्षेत्र में हो रही उन्नति रुकने वाली नहीं है। 
यह सब काफी उत्साहजनक है,  यह धरती को भी काफी हद तक बदल देगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि कोई व्यक्ति जब मंगल पर जाएगा और वहां से धरती को देखेगा तो उसे यह एक छोटे नीले बिंदू की तरह दिखाई देगी तब वह विभिन्न देशों तथा धर्मों के बारे में किस प्रकार की सोच रखेगा। पिछले वर्ष जब स्पेस एक्स ने एक विशाल रॉकेट लांच किया था तो इसके माध्यम से एक इलैक्ट्रिक कार मंगल की कक्षा में भेजी गई थी। शायद हजारों साल बाद कुछ एलियन प्रजातियों को यह कार मिलेगी। इस कार पर एक संदेश लिखा है, ‘धरती पर मानव द्वारा निर्मित।’                         -राहिल नोरा चोपड़ा

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