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राहुल गांधी की राजनीतिक चूक! BSP ने कांग्रेस को छोड़ थामा नए पार्टनर का दामन

  • Updated on 9/21/2018

नई दिल्ली/ आयुषि त्यागी। लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने से पहले ही तीन राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर पल-पल सियासत समीकरण बदल रहे है। एक ओर जहां कांग्रेस विपक्षी पार्टियों को एकजुट कर बीजेपी को मात देने का सपना देख रही है इसी बीच बसपा ने कांग्रेस को ठेंगा दिखाते हुए छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से बगावत कर अलग पार्टी बनाने वाले अजीत जोगी के साथ बसपा ने गठजोड़ कर लिया है।

बसपा ने मध्य प्रदेश में भी अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान करते हुए अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी है, साथ ही राजस्थान में भी बिना किसी गठबंधन के चुनाव लड़ने का संकेत दिया है। बसपा के इस कदम को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की राजनीतिक अदूरदर्शिता का परिणाम भी माना जा रहा है। पिछले कुछ दिनों से मायावती ऐसे संकेत दे रही थी जिसे समझने में राहुल असफल रहे।  

बसपा ने बदले तेवर, बीजेपी को मिली राहत  
बसपा के इस फैसले से साफ है कि कांग्रेस के साथ अब वो गठबंधन करने के मूड में नहीं है। बसपा के इस कदम से बीजेपी को थोड़ी राहत जरुर मिलेगी क्योंकि अब बसपा और कांग्रेस के साथ ना आने से बीजेपी को अपनी सत्ता बचाए रखने की आस नजर आ रही है। अब कांग्रेस का तीन राज्यों के चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का बनता समीकरण बिगड़ता नजर आ रहा है। 

कांग्रेस के मंसूबों पर फेरा पानी 
इसी साल मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने वाले हैं। इन तीनों राज्यों में ही बीजेपी की सरकारें हैं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी 15 साल से सत्ता में है। इन दोनों राज्यों नेता बसपा के साथ गठबंधन करने की जुगत में थे लेतिन मायावती ने पासा पलटते हुए कांग्रेस की खेल बिगाड़ दिया।   

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बीजेपी, कांग्रेस और छत्तीसगढ़ 
रमन सिंह के नेतृत्व में बीजेपी तीन बार छत्तीसगढ़ में सत्ता हासिल कर चूकी हैं। यहां कांग्रेस और बीजेपी के बीच महज एक फीसदी का अंतर है। वहीं बात करे बसपा की तो पिछले चुनावों में पार्टी को महज 4.5 फीसदी वोट मिले थे। 2013 के चुनाव में राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से बीजेपी ने 49 सीटें जीती थीं। जबकि कांग्रेस को 39 औप बसपा के खाते में महज ेक सीट आई थी।

बसपा- कांग्रेस से अलग होते नतीजे 
संभावना थी कि अगर कांग्रेस और बसपा एक साथ मिलकर चुनाव लड़ते है तो राज्य की राजनीतिक तस्वीर बदल जाएगी। 2013 में बसपा और कांग्रेस एक साथ मिलकर उतरते तो नतीजे अलह होते। बीजेपी को 11 सीटों का नुकसान उठाना पड़ताऔर महज 38 सीटें मिलती। जबकि कांग्रेस बसपा गठबंधन 51 सीटों के साथ राज्य की सत्ता हासिल कर लेती। इसी वजह से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष लगातार बसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहते थे।

मायावती और जोगी का सीटों का गठबंधन 
बसपा प्रमुख मायावती और जोगी के बीच जो गठबंधन हुआ है उसके मुताबिक 35 सीटें बसपा के खाते में आई हैं और 55 सीटे जोगी जनता कांग्रेस को मिली है। जोगी के पास जहां आदिवासी वोट है वहीं बसपा के पास दलित मतदाताओं पर अच्छी पकड़ है। कांग्रेस नेताओं के भी अच्छे से पता है कि राज्य में दो जर्जन सीटें ऐसी है जहां बसपा के सात ना होने से उन्हें मुकसान उठाना पड़ सकता है। 

2013 में मध्यप्रदेश में बीएसपी ने 230 सीटों पर 227 अपने उम्मीदवार उतारे थे। तब ब,पा यहा 6.42 फीसदी वोट के साथ चार सीटें जीतने में सफल रही थी। राज्य में 75 से 80 सीटों पर बसपा प्रत्याशियों ने 10 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए थे। वहीं बीजेपी और कांग्रेस के बीच 8.4 फीसदी वोट शेयर के अंतर था।,  बीजेपी ने 165 सीटें और कांग्रेस ने 58 सीटें अपने नाम की थी। 

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कांग्रस और बसपा का एक साथ ना आना शिवराज के लिए अच्छे संकेत 
माना जा रहा है कि कांग्रेस और बसपा के एक साथ ना आने से विपक्षी एकता तो तगड़ा झटका मिला है। इसी मद्देनजर कांग्रेस बसपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसे पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की कोशिश कर रही थी। अब आने वाले लोकसभा चुनाव में भी बसपा कांग्रेस का साथ देगी या नहीं ये कहना थोड़ा मुश्किल है।

अब यदि बसपा इसी तरह 2019 में भी इसी तरह अलग होकर चुनाव लड़ती है तो कांग्रेस को कई राज्यों में दलित मतों का नुकसान झेलना पड़ सकता है। 

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