Friday, Jun 21, 2019

नहीं रही मोदी की 2014 वाली अपील

  • Updated on 4/25/2019

भाजपा ने शायद अपनी सारी उम्मीदें  राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर टिका रखी हैं। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से 2014  के वायदों से दूरी बना ली है, उसे सभी जानते हैं। समझदार मतदाता जानते हैं कि 2014 के वायदों को पूरा करने में असफल रहने के कारण मोदी ने पड़ोसी देश को लेकर नए मुद्दों को उछाला है ताकि लोगों का ध्यान बांटा जा सके। 

इसके बावजूद कुछ ‘खतरे’ हैं जिनका हम आज सामना कर रहे हैं।  हमें उन खतरों के फर्क को समझना होगा जो लोगों को सहन करने पड़ते हैं और एक खतरा वह है जो सत्ताधारी नेताओं को सताता रहता है। मोदी एंड कम्पनी यह चाहती है कि हम यह विश्वास कर लें कि ये खतरे एक समान हैं जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। 

मोदी को जो ‘खतरा’ है वह मतदाताओं से है, यह खतरा सत्ता में बने रहने को लेकर है। तनाव के संकेत नजर आ रहे हैं। यही कारण है कि मोदी को महाराष्ट्र में शिवसेना और असम में अगप जैसे दलों के साथ चुनाव पूर्ण गठबंधन करना पड़ा जिनके साथ  वह सहज नहीं थे।

यदि मोदी को हार का खतरा न होता तो वह अपने विरोधियों के खिलाफ सी.बी.आई., ई.डी. और इंकम टैक्स जैसी एजैंसियों का इस्तेमाल क्यों करते? हमें यह विश्वास दिलाने की कोशिश की जाती है कि आॢथक अपराधी केवल राजनीतिक विरोधियों में ही पाए जाते हैं। बिहार में मोदी ने 22 सीटों, जिन पर इस समय भाजपा का कब्जा है, में से 5 जद (यू) के लिए क्यों छोड़ीं? यहां भी निश्चित तौर पर असुरक्षा की भावना है जिस कारण वह जद (यू) को अपने साथ रखना चाहते थे। 

इसके अलावा सुरक्षा संबंधी खतरे हैं जिनका सामना समाज के विभिन्न वर्ग विशेष तौर पर किसान, बेरोजगारी व छोटे व्यापारी, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक कर रहे हैं। हमारे अस्तित्व को खतरे से बड़ी कोई असुरक्षा नहीं हो सकती। आत्महत्या करना असुरक्षा का सबसे स्पष्ट संकेत है।

 मोदी को इस बात का जवाब देना चाहिए कि 2014 के बाद किसानों की आत्महत्याएं घटने की बजाय बढ़ क्यों गई हैं? किसानों की आय दोगुनी करने की उनकी बात से यह कैसे मेल खाता है? इसके बाद भारत के  पढ़े-लिखे और कुशल नौजवान असुरक्षित हैं। 

और अंत में सीमा पार से खतरा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारा पड़ोसी गैर जिम्मेदार है लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। पिछली सभी सरकारों को इस सिरदर्द का सामना करना पड़ा है। देश की प्रत्येक सरकार के कत्र्तव्य का यह अभिन्न हिस्सा है। यदि इससे ठीक प्रकार से निपटा जाता है तो माहौल में सुधार होता है अन्यथा यह और बिगड़ जाता है। जैसा कि पिछले 5 वर्ष में हुआ।

ऐसी स्थिति में समझदार मतदाता कुछ सवाल पूछेंगे : ऐसा क्यों है कि चुनाव के समय सीमा पर तनाव बढ़ जाता है। ऐसा क्यों है कि सैन्य कार्रवाई को सार्वजनिक मामलों में घसीटा जाता है जबकि लोकतंत्र में नागरिकों को  इसे अपने तौर पर आंकने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। 

विपक्षी दल-विशेषकर कांग्रेस-जनता से संबंधित असली मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित कर देश की सेवा कर रही है। एक निष्पक्ष राजनीतिक पर्यवेक्षक और सामाजिक कार्यकत्र्ता होने के नाते मुझे इस बात पर संतोष है कि 2019 के चुनाव ग्रामीण और किसान संकट, अभूतपूर्व बेरोजगारी,  सामाजिक और साम्प्रदायिक तनाव,  आॢथक और औद्योगिक अनिश्चितता जैसे मुद्दों पर लड़े जा रहे हैं तथा वे  कुछ दलों के दुष्प्रचार से प्रभावित नहीं हैं। 

जो लोग चुनावी माहौल को नजदीक से देख रहे हैं वे जानते हैं कि मोदी की 2014 वाली करिश्माई अपील समाप्त हो चुकी है। अब मोदी की रैलियों में टी.वी. चैनल भी भीड़ की तरफ कैमरा घुमाने से परहेज करते हैं क्योंकि ‘मोदी-मोदी’ की आवाजें  अब मंद हो गई हैं।                                                                                                   ---स्वामी अग्रिवेश

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