Tuesday, Nov 19, 2019
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मोदी के आलोचकों के तीन डर

  • Updated on 6/24/2019

जब से नरेन्द्र मोदी ब्रांड को हर मतदाता के मन में बसाकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भाजपा को अप्रत्याशित विजय दिलाई है, तब से मोदी जी के आलोचकों और विपक्षी दलों को एक भय सता रहा है कि अब मोदी यथाशीघ्र भारत को राष्ट्रपति प्रणाली की तरफ  ले जाएंगे। उन्हें दूसरा डर इस बात का है कि अब मोदी जी खुल्लमखुल्ला अधिनायकवाद की स्थापना करेंगे। उनका यह भी कहना है कि भाजपा के जीते हुए सांसद यह मानते हैं कि उनकी विजय उनके अपने कृतित्व के कारण नहीं बल्कि मोदी जी के नाम के कारण हुई है। इसलिए उनका तीसरा भय इस बात का है कि ये सभी सांसद संसद में केवल हाथ उठाएंगे या नारे लगाएंगे। इनसे संसद की बहसों को कोई गरिमा प्रदान नहीं होगी। इस तरह संसद का स्तर लगातार गिरता जाएगा। हम इन तीनों मुद्दों का विवेचन करेंगे।

जहां तक देश को राष्ट्रपति प्रणाली की ओर ले जाने की बात है, तो यह कोई गलत विचार नहीं है। दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देशों में राष्ट्रपति प्रणाली है और कुछ अपवादों को छोड़कर ठीक-ठाक काम कर रही है। आयाराम-गयाराम की संस्कृति में सांसदों की खरीद-फरोख्त से बनी सरकारें ब्लैकमेल का शिकार होती हैं। छोटे-छोटे  दल अल्पमत की सरकार को समर्थन देने की एवज में कमाऊ मंत्री पद हड़पना चाहते हैं। कैबिनेट की  सामूहिक जिम्मेदारी की बजाय हर सहयोगी दल अपने क्षेत्रीय दल, नेता व क्षेत्र के लिए ही सक्रिय रहता है। बाकी देश के प्रति गंभीर नहीं रहता। ‘हवाला कांड’ के बाद राजनीति में भ्रष्टाचार और अपराधीकरण को लेकर पूरी रात संसद का अधिवेशन चला, पर आज तक कुछ भी नहीं बदला। जिन दलों और लोगों को आज मोदी जी की मंशा पर संदेह है, उन्होंने पिछले 23 वर्षों में राजनीति की दशा सुधारने के लिए कितने गंभीर प्रयास किए, जब वह ढर्रा देश 72 साल तक ढोता रहा, तो अब एक बार अगर मोदी जी राष्ट्रपति प्रणाली लाकर नया प्रयोग करना चाहें, तो इससे इतनी घबराहट क्यों होनी चाहिए?

राष्ट्रपति प्रणाली के लाभ
राष्ट्रपति प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि पूरे देश की जनता अपनी पसंद के नेता को 5 साल के लिए देश की बागडोर सौंप देती है। ऐसे चुना गया राष्ट्रपति बिना किसी दबाव के अपने मंत्रिमंडल का गठन कर सकता है। जाहिरन तब वह अपनी पसंद के और अनुभवी लोगों को किसी भी क्षेत्र से उठाकर मंत्री बना सकता है। जैसा इस बार मोदी जी ने विदेश मंत्री के संदर्भ में प्रयोग किया। फिर वह व्यक्ति चाहे प्रोफैसर हो, वैज्ञानिक हो, उद्योगपति हो,  पत्रकार हो, समाजसेवी हो या रणनीति विशेषज्ञ हो। अमरीका में आज ऐसा ही होता है। इससे कैबिनेट की योग्यता, कार्यक्षमता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता बढ़ जाती है। हां एक नुक्सान हो सकता है। अगर राष्ट्रपति अहंकारी हो, अनैतिक आचरण वाला हो या लालची हो, तो वह देश को मटियामेट भी कर सकता है। पर जिसे पूरा देश अपने विवेक से चुनेगा, उससे ऐसे आचरण की उम्मीद कम ही की जा सकती है।

मोदी जी के आलोचकों को डर है कि वे हिटलर या मुसोलिनी की तरह धीरे-धीरे अधिनायकवाद की ओर बढ़ रहे हैं। चुनाव के दौरान व्हाट्सअप  समूहों में हिटलर की आदतों को लेकर ऐसे कई संदेश प्रचारित किए गए, जिनमें मोदी जी की तुलना हिटलर से की गई। यहां एक बुनियादी फर्क है। हिटलर प्रजाति के  अहंकार से ग्रस्त एक गैर आध्यात्मिक व्यक्ति था। जिसकी मंशा विश्व विजेता बनने की थी। जबकि मोदी जी ने योग को विश्वस्तर पर मान दिलाकर, राष्ट्राध्यक्षों को श्रीमद् भगवदगीता भेंटकर और देश के सभी प्रमुख देवालयों में पूजा-अर्चना कर अपने सनातनी होने का प्रमाण दिया है। निश्चित तौर पर उन्होंने श्रीमद् भगवदगीता के राजा रहुगण व जड़भरत संवाद को पढ़ा होगा। जो कल राजा था, वह आज पालकी उठाने वाला बन गया और जो आज सड़क के पत्थर तोड़ता है वह कल भारत का राष्ट्रपति बन सकता है। जिसने वैदिक दर्शन के इस मूल सिद्धांत को समझ लिया, वह राजा अधिनायकवादी नहीं, राजॢष बनेगा। अब यह तो समय ही बताएगा कि मोदी जी स्वान्त: सुखाय अधिनायकवादी बनेंगे या बहुजन हिताय?

मोदी जी से शिकायत
मोदी जी की एक शिकायत आम है, जो उनके आलोचक नहीं, बल्कि चाहने वालों के बीच है। उनका नौकरशाही पर ज्यादा से ज्यादा निर्भर होना। जबकि इस देश के तमाम ईमानदार और चरित्रवान व उच्च पदासीन  रहे नौकरशाहों ने अपने स्मरणों में बार-बार इस बात पर दुख प्रकट किया है कि नौकरशाही के तंत्र में उलझ कर वे कुछ भी ठोस और सार्थक नहीं कर पाए। एक घिसीपिटी मशीन का पुर्जा बनकर रह गए। यह पीड़ा मेरी भी है। गत 5 वर्षों से बार-बार स्मरण दिलाने के बावजूद प्रधानमंत्री कार्यालय में ब्रज को लेकर मेरी अनुभवजन्य व स्वयंसिद्ध उपलब्धियों पर आधारित ङ्क्षचताओं पर ध्यान नहीं दिया और आज भी ब्रज का विकास नये-पुराने नौकरशाहों पर छोड़ दिया है, जो 5 वर्ष में एक भी काम उल्लेखनीय या प्रशंसनीय नहीं कर पाए। अमरीका की प्रगति के पीछे सबसे बड़ा  कारण वहां मिलने वाला वह सम्मान है, जो अमरीकी सरकार और समाज हर उस व्यक्ति को देता है, जो अपनी योग्यता सिद्ध कर देता है।

रही बात संसद की। यह सही है कि भाजपा के अधिकतर सांसद अपने काम और नाम की बजाय मोदी जी के नाम पर जीतकर आए हैं। पर इसका अर्थ ये नहीं कि वो किसी गडरिए की भेड़ें हैं। लाखों लोगों ने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना है। उनकी बहुत अपेक्षाएं हैं। जनता से जुड़ाव के बिना कोई नेता बहुत लंबी दूरी तक नहीं चल सकता। न सिर्फ स्थानीय मुद्दों पर पकड़ जरूरी है बल्कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर भी हस्तक्षेप करने की अपेक्षा देशवासी हर सांसद से करते हैं। ‘‘ङ्क्षनदक नियरे राखिये’’ वाले सिद्धांत में आस्था रखते हुए मोदी जी को चाहिए कि वे अपने सांसदों को यह निर्देश और शिक्षा दें कि वे संसद की बहसों में सक्रिय रहकर अपना योगदान करें और जहां आवश्यक हो, अपनी ही सरकार की कमियों की ओर इशारा करने से न चूकें। इससे सरकार की विश्वसनीयता व लोकप्रियता दोनों बढ़ती है। आशा की जानी चाहिए कि मोदी जी अपने आलोचकों की शंकाओं के विरुद्ध एक मजबूत राष्ट्र के निर्माण की तरफ कदम बढ़ाएंगे।
-विनीत नारायण

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